सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

सूक्त-२९ देवता—जातवेद

सूक्त-२९ देवता—जातवेद
पुरस्ताद् युक्तो वह जातवेदोऽग्ने विद्धि क्रियमाणं यथेदम्.
त्वं भिषग् भेषजस्यासि कर्ता त्वया गामश्वं पुरुषं सनेम.. (१)
हे सभी कर्मों में प्रथम नियुक्त होने वाले अग्नि देव! मेरे द्वारा किए गए इस कार्य का
भार वहन करो. तुम ओषधि प्रदान करने वाले वैद्य हो. हम तुम्हारे द्वारा गाय, अश्व एवं
मनुष्यों को रोग रहित दशा में प्राप्त करें. (१)
तथा तदग्ने कृणु जातवेदो विश्वेभिर्देवैः सह संविदानः.
यो नो दिदेव यतमो जघास यथा सो अस्य परिधिष्पताति.. (२)
हे जातवेद अग्नि देव! जो हमारे विरुद्ध खेल खेल रहा है तथा जो हमारा भक्षण करना
चाहता है, सभी देवों के साथ मिल कर उस का परकोटा गिरा दो. (२)
यथा सो अस्य परिधिष्पताति तथा तदग्ने कृणु जातवेदः.
विश्वेभिर्देवैः सह संविदानः.. (३)
हे अग्नि! तुम सभी देवों के साथ मिल कर ऐसा यत्न करो, जिस से उस का परकोटा
गिर जाए जो हमारे विरोध में खेल खेल रहा है और जो हमें खाना चाहता है. (३)
अक्ष्यौ ३ नि विध्य हृदयं नि विध्य जिह्वां नि तृन्द्धि प्र दतो मृणीहि.
पिशाचो अस्य यतमो जघासाग्ने यविष्ठ प्रति तं शृणीहि.. (४)
जो पिशाच हमें खाना चाहता है, तुम उस की आंखें फोड़ दो, जीभ काट डालो और
दांत तोड़ दो. इस प्रकार तुम उस का विनाश कर दो. (४)
यदस्य हृतं विहृतं यत् पराभृतमात्मनो जग्धं यतमत् पिशाचैः.
तदग्ने विद्वान् पुनरा भर त्वं शरीरे मांसमसुमेरयामः.. (५)
हे अग्नि देव! इस का जो मांस पिशाचों ने इस के शरीर से नोंच कर खा लिया है, उसे
इस के शरीर में पुनः स्थापित कर दो तथा मंत्र शक्ति से इस के शरीर में प्राणों का पुनः संचार
कर दो. (५)
आमे सुपक्वे शबले विपक्वे यो मा पिशाचो अशने ददम्भ.
तदात्मना प्रजया पिशाचा वि यातयन्तामगदोऽयमस्तु.. (६)
हे अग्नि! जो पिशाच कच्चे, पक्के और चितकबरे पात्र में विशेष रूप से पके हुए एवं
कच्चे, पक्के भोजन में इस पुरुष के मांस को घोल कर हमारे विनाश की इच्छा कर रहा है,
वह पिशाच अपनी संतान सहित कष्ट भोगे तथा यह पुरुष आरोग्य को प्राप्त करे. (६)
ebook converter DEMO Watermarks*

क्षीरे मा मन्थे यतमो ददम्भाकृष्टपच्ये अशने धान्ये ३ यः.
तदात्मना प्रजया पिशाचा वि यातयन्तामगदो ३ यमस्तु.. (७)
हे अग्नि! दूध में, मट्ठे में एवं कृषि द्वारा पके हुए अन्न में प्रविष्ट हो कर जो पिशाच इस
पुरुष को नष्ट करने की इच्छा कर रहा है, वह अपनी संतान के साथ कष्ट भोगे एवं यह पुरुष
रोग रहित हो जाए. (७)
अपां मा पाने यतमो ददम्भ क्रव्याद् यातूनां शयने शयानम्.
तदात्मना प्रजया पिशाचा वि यातयन्तामगदो ३ यमस्तु.. (८)
जिस पिशाच ने मुझे जल पीने में, यात्रा करने में तथा सोते समय पीड़ित किया है, हे
अग्नि! वह संतान के सहित इसी प्रकार का कष्ट भोगे एवं यह पुरुष रोग रहित हो जाए. (८)
दिवा मा नक्तं यतमो ददम्भ क्रव्याद् यातूनां शयने शयानम्.
तदात्मना प्रजया पिशाचा वि यातयन्तामगदो३यमस्तु.. (९)
हे अग्नि! मुझे रात और दिन में यात्रा करते समय और सोते समय जिस मांस भक्षी
पिशाच ने पीड़ित किया है, वह अपनी संतान सहित कष्ट भोगे तथा यह पुरुष नीरोग हो जाए.
(९)
क्रव्यादमग्ने रुधिरं पिशाचं मनोहनं जहि जातवेदः.
तमिन्द्रो वाजी वज्रेण हन्तु च्छिनत्तु सोमः शिरो अस्य धृष्णुः.. (१०)
हे अग्नि! तुम मांसभक्षी, रुधिर पीने वाले तथा मन को कष्ट देने वाले पिशाच को नष्ट
करो. अश्व के स्वामी इंद्र उसे अपने वज्र से मारें तथा सोम उस का शीश काट लें. (१०)
सनादग्ने मृणसि यातुधानान् न त्वा रक्षांसि पृतनासु जिग्युः.
सहमूराननु दह क्रव्यादो मा ते हेत्या मुक्षत दैव्यायाः.. (११)
हे अग्नि! तुम सदा से राक्षसों का मर्दन करते आए हो, राक्षस युद्ध में तुम्हें कभी नहीं
जीत सके हैं, तुम मांस भक्षियों को जला दो. ये तुम्हारे दिव्य अस्त्र से बच न सकें. (११)
समाहर जातवेदो यद्धृतं यत् पराभृतम्.
गात्राण्यस्य वर्धन्तामंशुरिवा प्यायतामयम्.. (१२)
हे अग्नि! इस मनुष्य का जो ज्ञान और मांस नष्ट हो गया है, उसे तुम पुनः इस के शरीर
में लाओ. यह सोमलता के अंकुर के समान पुष्ट हो तथा इस के अंगप्रत्यंग पूर्ण हों. (१२)
सोमस्येव जातवेदो अंशुरा प्यायतामयम्.
अग्ने विरप्शिन् मेध्यमयक्ष्मं कृणु जीवतु.. (१३)
ebook converter DEMO Watermarks*

हे अग्नि! सोमलता के अंकुर के समान पुष्ट होने के कारण इस पुरुष के अंगप्रत्यंग
पूर्णता को प्राप्त हों. इस गुणवान पुरुष को जीवित रहने के लिए नीरोग कीजिए. (१३)
एतास्ते अग्ने समिधः पिशाचजम्भनीः.
तास्त्वं जुषस्व प्रति चैना गृहाण जातवेदः.. (१४)
हे अग्नि! तुम्हारी ये समिधाएं पिशाचों को नष्ट करने वाली हैं. हे जातवेद! इन
समिधाओं को प्राप्त कर के तुम प्रसन्न बनो. (१४)
तार्ष्टाधीरग्ने समिधः प्रति गृह्णाह्यार्चिषा.
जहातु क्रव्याद्रूपं यो अस्य मांसं जिहीर्षति.. (१५)
हे अग्नि! तृषा शांत करने वाली इन समिधाओं को घी के साथ ग्रहण करो. जो राक्षस
इस पुरुष के मांस की इच्छा करता है, वह अपने कार्य से विमुख हो जाए. (१५)
सूक्त-३० देवता—आयु
आवतस्त आवतः परावतस्त आवतः.
इहैव भव मा नु गा मा पुर्वाननु गाः पितॄनसुं बध्नामि ते दृढम्.. (१)
मैं समीप के देश से और दूर के देश से तेरे प्राणों को दृढ़ता से बांधता हूं. तू यहीं रह
और अपने पूर्ववर्ती पितरों का अनुकरण मत कर. (१)
यत् त्वाभिचेरुः पुरुषः स्वो यदरणो जनः.
उन्मोचनप्रमोचने उभे वाचा वदामि ते.. (२)
पितृऋण को न चुकाने वाले जिस पुरुष ने तुझ पर अधिकार किया है, मैं उस से छूटने
का उपाय अपने मंत्र बल से तुझे बताता हूं. (२)
यद् दुद्रोहिथ शेपिषे स्त्रियै पुंसे अचित्या.
उन्मोचनप्रमोचने उभे वाचा वदामि ते.. (३)
तूने जिस स्त्री अथवा पुरुष के प्रति वैरभाव रखते हुए इस पापपूर्ण अभिचार का प्रयोग
किया है, मैं तुझे उस से मुक्त करने से संबंधित बात बताता हूं. (३)
यदेनसो मातृकृताच्छेषे पितृकृताच्च यत्.
उन्मोचनप्रमोचने उभे वाचा वदामि ते.. (४)
तू अपने पिता अथवा माता द्वारा किए गए पाप के कारण रोगी हो कर शय्या पर पड़ा
है. मैं अपनी वाणी से उस रोग से उन्मोचन और प्रमोचन की बात तुझे बताता हूं. (४)
ebook converter DEMO Watermarks*

यत् ते माता यत् ते पिता जामिर्भ्राता च सर्जतः.
प्रत्यक् सेवस्व भेषजं जरदष्टिं कृणोमि त्वा.. (५)
तेरी माता, तेरे पिता, तेरे भाई अथवा तेरी बहन ने जिस मंत्र अथवा ओषधि का प्रयोग
तेरे लिए निश्चित किया है, उसे भली प्रकार से सेवन कर. मैं तुझे वृद्धावस्था तक जीवित रहने
वाला बनाता हूं. (५)
इहैधि पुरुष सर्वेण मनसा सह.
दूतौ यमस्य मानु गा अधि जीवपुरा इहि.. (६)
हे पुरुष! तू यमराज के दूतों का अनुकरण मत कर अर्थात् मर मत. तू अपने समस्त
परिवार जनों के साथ यहां जीवित रह. (६)
अनूहूतः पुनरेहि विद्वानुदयनं पथः.
आरोहणमाक्रमणं जीवतोजीवतोऽयनम्.. (७)
तू उदय होने के मार्ग को जानने वाला है और इस यज्ञ कर्म के द्वारा बुलाया गया है.
उत्तरायण एवं दक्षिणायन तेरे जीवन में ही व्यतीत हों. (७)
मा बिभेर्न मरिष्यसि जरदष्टिं कृणोमि त्वा.
निर्वोचमहं यक्ष्ममङ्गेभ्यो अङ्ग़ज्वरं तव.. (८)
हे रोगी! तू भय त्याग दे, क्योंकि तू मरेगा नहीं. मैं तुझे वृद्धावस्था तक इस लोक में रहने
योग्य बनाता हूं. तेरे शरीर में से यक्ष्मा रोग और अस्थिगत ज्वर दूर हो चुका है. (८)
अङ्गभेदो अङ्ग़ज्वरो यश्च ते हृदयामयः.
यक्ष्मः श्येन इव प्रापप्तद् वाचा साढः परस्तराम्.. (९)
तेरे शरीर में व्याप्त ज्वर, तेरा हृदय रोग एवं यक्ष्मा रोग—ये सभी मेरे मंत्र रूपी बाणों से
तिरस्कृत हो कर उड़ने वाले बाज पक्षी के समान दूर जा कर गिरे हैं. (९)
ऋषी बोधप्रतीबोधावस्वप्नो यश्च जागृविः.
तौ ते प्राणस्य गोप्तारौ दिवा नक्तं च जागृताम्.. (१०)
जो बोध, प्रतिबोध, स्वप्न और जागृति नामक तेरे प्राणरक्षक ऋषि हैं, वे रातदिन जागते
रहें. (१०)
अयमग्निरुपसद्य इह सूर्य उदेतु ते.
उदेहि मृत्योर्गम्भीरात् कृष्णाच्चित् तमसस्परि.. (११)
यह अग्नि समीप रहने योग्य है. तेरे लिए सूर्य इसी लोक में उदय हो. तू गहरी, काली
ebook converter DEMO Watermarks*

और अंधकारपूर्ण मृत्यु से निकल कर जीवन को प्राप्त हो. (११)
नमो यमाय नमो अस्तु मृत्यवे नमः पितृभ्य उत ये नयन्ति.
उत्पारणस्य यो वेद तमग्निं पुरो दधे ऽ स्मा अरिष्टतातये.. (१२)
यमराज के लिए नमस्कार है. मृत्यु के लिए नमस्कार है. पितरों के लिए नमस्कार है. ये
तुझे ले जाने वाले हैं. जो अग्नि शरीर के पारण की विधि जानते हैं, वे तेरे कल्याण के लिए
आए हैं. मैं तुझे स्थापित करता हूं. (१२)
ऐतु प्राण ऐतु मन ऐतु चक्षुरथो बलम्.
शरीरमस्य सं विदां तत् पद्भ्यां प्रति तिष्ठतु.. (१३)
इस पुरुष को प्राण, नेत्र और बल प्राप्त हों. मैं ने इस के शरीर को मंत्र शक्ति के द्वारा
प्राण युक्त किया है. वह अपने पैरों पर खड़ा हो जाए. (१३)
प्राणेनाग्ने चक्षुषा सं सृजेमं समीरय तन्वा ३ सं बलेन.
वेत्थामृतस्य मा नु गान्मा नु भूमिगृहो भुवत्.. (१४)
हे अग्नि! तुम इस पुरुष को प्राण और चक्षु से युक्त करो तथा इस के शरीर में बल भर
दो. तुम अमृत के जानने वाले हो. यह इस लोक से प्रस्थान न करे और श्मशान इस का घर न
बने. (१४)
मा ते प्राण उप दसन्मो अपानो ऽ पि धायि ते.
सूर्यस्त्वाधिपतिर्मृत्योरुदायच्छतु रश्मिभिः.. (१५)
हे रोगी! तेरे प्राणों का क्षय न हो तथा तेरी अपान वायु भी तेरा त्याग न करे. सूर्य अपनी
किरणों द्वारा मृत्यु शय्या पर पड़े हुए तुझे उस से उठा दें. (१५)
इयमन्तर्वदति जिह्वा बद्धा पनिष्पदा.
त्वया यक्ष्मं निरवोचं शतं रोपीश्च तक्मनः.. (१६)
भीतर से हिलती हुई और मुख में बांधी हुई मेरी जीभ कहती है कि तुझे यक्ष्मा रोग ने
त्याग दिया है और तेरे ऊपर ज्वर का आक्रमण शांत हो गया है. (१६)
अयं लोकः प्रियतमो देवानामपराजितः.
यस्मै त्वमिह मृत्यवे दिष्टः पुरुष जज्ञिषे.
स च त्वांनु ह्वयामसि मा पुरा जरसो मृथाः.. (१७)
यह पराजित न होने वाला मृत्युलोक देवों को भी प्रिय है. इस लोक में तूने मृत्यु के लिए
ही जन्म लिया है. वह मृत्यु तेरा आह्वान करती है. तू वृद्धावस्था से पहले मृत्यु को प्राप्त न
ebook converter DEMO Watermarks*