अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त-२७ देवता—अग्नि
बृहस्पते ब्रह्मणा याह्यर्वाङ् यज्ञो अयं स्वरिदं यजमानाय स्वाहा.. (१२)
हे अश्विनीकुमारो! तुम बृहस्पति देव एवं मंत्रों के साथ इस यज्ञ की वृद्धि करते हुए हमारे
सामने आओ. यह यज्ञ यजमान के हेतु कल्याण करने वाला हो. यह आहुति अश्विनीकुमारों
एवं बृहस्पति के हेतु उत्तम हो. (१२)
सूक्त-२७ देवता—अग्नि
ऊर्ध्वा अस्य समिधो भवन्त्यूर्ध्वा शुक्रा शोचींष्यग्नेः.
द्युमत्तमा सुप्रतीकः ससूनूस्तनूनपादसूरो भूरिपाणिः.. (१)
अग्नि की समिधाएं ऊंची और वीर्य तेजयुक्त होते हैं. यह अत्यंत प्रदीप्त, सुंदर एवं सूर्य
के समान है. प्राणदाता अग्नि का यज्ञों में बहुत सहयोग रहता है. (१)
देवो देवेषु देवः पथो अनक्ति मध्वा घृतेन.. (२)
अग्नि देव सभी देवों में श्रेष्ठ हैं और मधु से मार्गों का शोधन करते हैं. (२)
मध्वा यज्ञं नक्षति प्रैणानो नराशंसो अग्निः सुकृद् देवः सविता विश्ववारः.
(३)
सुंदर कर्म करने वाले तथा सभी मनुष्यों द्वारा प्रशंसनीय सविता देव तथा संसार के
द्वारा वरण करने योग्य अग्नि देव यज्ञ को मधुयुक्त करते हुए व्याप्त होते हैं. (३)
अच्छायमेति शवसा घृता चिदीडानो वह्निर्नमसा.. (४)
घृत एवं हव्य अन्न के सहित स्तुतियों को प्राप्त करने वाले अग्नि देव सामने से आते हैं.
(४)
अग्निः स्रुचो अध्वरेषु प्रयक्षु स यक्षदस्य महिमानमग्नेः.. (५)
यज्ञों में देवों की संगति करने वाले अग्नि देव इस यज्ञ की महिमा और स्रुवों को अपने से
युक्त करें. (५)
तरी मन्द्रासु प्रयक्षु वसवश्चातिष्ठन् वसुधातरश्च.. (६)
देवों की संगति करने वाले एवं हर्ष उत्पन्न करने वाले यज्ञों में तारक और धन को बढ़ाने
वाले वरुण देवता निवास करते हैं. (६)
द्वारो देवीरन्वस्य विश्वे व्रतं रक्षन्ति विश्वहा.. (७)
eBook converter DEMO Watermarks*
अग्नि की तेजस्विनी लपटें यजमान के व्रत की सभी प्रकार से रक्षा करती हैं. (७)
उरुव्यचसाग्नेर्धाम्ना पत्यमाने.
आ सुष्वयन्ती यजते उपाके उषासानक्तेमं यज्ञमवतामध्वरं न:.. (८)
महत्त्व वाले तथा गतिशील अग्नि देव इस यज्ञ में तेज को ऐश्वर्यपूर्ण एवं आहुति की
दीप्ति का संपादन करते हैं. (८)
दैवा होतार ऊर्ध्वमध्वरं नो ऽ ग्नेर्जिह्वयाभि गृणत गृणता नः स्विष्टये.
तिस्रो देवीर्बहिरेिदं सदन्तामिडा सरस्वती मही भारती गृणाना.. (९)
हे होताओ! यज्ञ की इस अग्नि की प्रशंसा करो. इस से हमारा कल्याण होगा. पृथ्वी,
अग्नि और सरस्वती—ये तीनों देवियां प्रशंसा करती हुई कुश पर विराजमान हों. (९)
तन्नस्तुरीपमद्भुतं पुरुक्षु.
देव त्वष्टा रायस्पोषं वि ष्य नाभिमस्य.. (१०)
हे त्वष्टा देव! हमारे जल, अन्न और धन की पुष्टि करते हुए तुम इस स्त्री की नाभि खोल
दो. (१०)
वनस्पते ऽ व सृजा रराणः. त्मना देवेभ्यो अग्निर्हव्यं शमिता स्वदयतु..
(११)
हे वनस्पति! तुम शब्द करती हुई अपनेआप को इस यज्ञ में छोड़ो तथा अग्नि इस हवि
को देवों के लिए स्वादिष्ट बनाएं. (११)
अग्ने स्वाहा कृणुहि जातवेदः.
इन्द्राय यज्ञं विश्वे देवा हविरिदं जुषन्ताम्.. (१२)
हे जन्म लेने वालों के ज्ञाता अग्नि देव! इंद्र के निमित्त इस यज्ञ को संपन्न करो. सभी देव
इस हवि को ग्रहण करें. (१२)
सूक्त-२८ देवता—त्रिवृत्त अग्नि
नव प्राणान्नवभिः सं मिमीते दीर्घायुत्वाय शतशारदाय.
हरिते त्रीणि रजते त्रीण्ययसि त्रीणि तपसाविष्ठितानि.. (१)
हम सौ वर्ष की आयु पाने के लिए नव प्राणों को इन तीन से संयुक्त करते हैं. इन नौ में
सोने, चांदी और लोहे के तीनतीन धागे अर्थात् तार हैं जो उष्णता लिए हुए हैं. (१)
अग्निः सूर्यश्चन्द्रमा भूमिरापो द्यौरन्तरिक्षं प्रदिशो दिशश्च.
ebook converter DEMO Watermarks*
आर्तवा ऋतुभिः संविदाना अनेन मा त्रिवृता पारयन्तु.. (२)
अग्नि, चंद्र, सूर्य, पृथ्वी, जल, आकाश, अंतरिक्ष, दिशाएं और उपदिशाएं इस त्रिवृत्त
अर्थात् नौ कर्मों से मुझे ऋतुओं सहित प्राप्त हो कर पार करें. इस में ऋतुओं के अंश भी
सहायता करें. (२)
त्रयः पोषास्त्रिवृति श्रयन्तामनक्तु पूषा पयसा घृतेन.
अन्नस्य भूमा पुरुषस्य भूमा भूमा पशूनां त इह श्रयन्ताम्.. (३)
तीन पुष्टिकारक इस त्रिवृत्त के आश्रित हों. उषा देवी दूध और घी से इस यज्ञ कर्म को
बढ़ाएं. इस के आश्रय में अन्न, पुरुषों और पशुओं की अधिकता रहे. (३)
इममादित्या वसुना समुक्षतेममग्ने वर्धय वावृधानः.
इममिन्द्र सं सृज वीर्येणास्मिन् त्रिवृच्छ्रयतां पोषयिष्णू.. (४)
आदित्य इस बालक को धन से पूर्ण करें. हे अग्नि, तुम स्वयं बढ़ते हुए इस बालक की
भी वृद्धि करो. हे इंद्र! तुम इसे वीर्य युक्त करो. पोषण करने वाला त्रिवृत्त इस का आश्रित हो.
(४)
भूमिष्ट्वा पातु हरितेन विश्वभृदग्निः पिपर्त्वयसा सजोषाः.
वीरुद्भिष्टे अर्जुनं संविदानं दक्षं दधातु सुमनस्यमानम्.. (५)
पृथ्वी स्वर्ग के द्वारा तेरी रक्षा करे. विश्व का भरणपोषण करने वाले अग्नि देव लोहे के
द्वारा तेरा पालन करें तथा तुझ में लताओं से प्राप्त जल के द्वारा बल धारण करें. (५)
त्रेधा जातं जन्मनेदं हिरण्यमग्नेरेकं प्रियतमं बभूव सोमस्यैकं हिंसितस्य
परापतत्.
अपामेकं वेधसां रेत आहुस्तत् ते हिरण्यं त्रिवृदस्त्वायुषे.. (६)
जन्म से ही यह स्वर्ण तीन प्रकार से उत्पन्न हुआ है. अग्नि को उस स्वर्ण का एक जन्म
प्रिय हुआ. वह सोम के पीड़ित होने पर गिरा. विद्वान् लोग एक को जलों का वीर्य कहते थे. हे
ब्रह्मचारी! वह स्वर्ण तेरी आयु वृद्धि के हेतु त्रिवृत्त अर्थात् तिगुना हो जाए. (६)
त्र्यायुषं जमदग्नेः कश्यपस्य त्र्यायुषम्.
त्रेधामृतस्य चक्षणं त्रीण्यायूंषि ते ऽ करम्.. (७)
जमदग्नि ऋषि की तीन आयु हैं—बचपन, यौवन और वृद्धावस्था. महर्षि कश्यप की भी
यही तीन अवस्थाएं हैं. अमृत के निदर्शन रूप में तीनों आयु मैं तुझे देता हूं. (७)
त्रयः सुपर्णास्त्रिवृता यदायन्नेकाक्षरमभिसंभूय शक्राः.
ebook converter DEMO Watermarks*
प्रत्यौहन्मृत्युममृतेन साकमन्तर्दधाना दुरितानि विश्वा.. (८)
त्रिवृत्त रूप से तीन समर्थ स्वर्ण एक अक्षर पर आकर शक्तिशाली बनते हैं. वे सभी
पापों को नष्ट कर के अमृत के द्वारा तेरी मृत्यु को समाप्त करें. (८)
दिवस्त्वा पातु हरितं मध्यात् त्वा पात्वर्जुनम्.
भूम्या अयस्मयं पातु प्रागाद् देवपुरा अयम्.. (९)
आकाश स्वर्ण के द्वारा तेरी रक्षा करे. मध्य लोक से रजत तेरी रक्षा करे. पृथ्वीलोक तेरी
रक्षा करे. ये तीनों देव नगरियों को प्राप्त होते हैं. (९)
इमास्तिस्रो देवपुरास्तास्त्वा रक्षन्तु सर्वतः.
तास्त्वं बिभ्रद् वर्चस्युत्तरो द्विषतां भव.. (१०)
ये देवताओं की जो तीन नगरियां हैं, वे सभी ओर से तेरी रक्षा करें. उन्हें धारण करता
हुआ तू अपने शत्रुओं की अपेक्षा अधिक तेजस्वी बन. (१०)
पुरं देवानामामृतं हिरण्यं य आबेधे प्रथमो देवो अग्रे.
तस्मै नमो दश प्राची: कृणोम्यनु मन्यतां त्रिवृदाबधे मे.. (११)
देवों के आगे प्रमुख देव ने स्वर्ण रूपी अमृत को बांधा था. मैं उस के लिए दस बार
नमस्कार करता हूं. वह देवता मुझे इस त्रिवृत्त को मांगने की आज्ञा दे. (११)
आ त्वा चृतत्वर्यमा पूषा बृहस्पतिः.
अहर्जातस्य यन्नाम तेन त्वाति चृतामसि.. (१२)
अर्यमा, पूषा और बृहस्पति तुझे भली प्रकार बांधें. दिन में उत्पन्न होने वाले का जो नाम
है, उस नाम से हम तुझे बांधते हैं. (१२)
ऋतुभिष्वार्तवैरायुषे वर्चसे त्वा.
संवत्सरस्य तेजसा तेन संहनु कृण्मसि.. (१३)
हे ब्रह्मचारी! आयु और तेज की प्राप्ति के लिए मैं तुझे ऋतुओं, मासों और संवत्सरों के
तेजरूप सूर्य से संबंधित करता हूं. (१३)
घृतादुल्लुप्तं मधुना समक्तं भूमिंदृंहमच्युतं पारयिष्णु.
भिन्दत् सपत्नानधरांश्च कृण्वदा मा रोह महते सौभगाय.. (१४)
घी से तर तथा शहद से सिंचा हुआ तू पृथ्वी के समान दृढ़ है. तू शत्रुओं को चीरता हुआ
एवं उन्हें तिरस्कृत करता हुआ महान सौभाग्य देने के लिए मुझ पर स्थित हो. (१४)
ebook converter DEMO Watermarks*