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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

सूक्त-१९ देवता—पृथिवी, पर्जन्य

सूक्त-१९ देवता—पृथिवी, पर्जन्य
प्र नभस्व पृथिवि भिन्द्धी ३ दं दिव्यं नभः.
उदनो दिव्यस्य नो धातरीशानो वि ष्या दृतिम्.. (१)
हे पृथ्वी! बादल फसल की वृद्धि के लिए तुझ पर महती वर्षा करेंगे. उस वर्षा के कारण
तू दृढ़ बन. आकाश में उत्पन्न होने वाला यह बादल पृथ्वी को विदीर्ण करे. हे धाता! आकाश
में होने वाले जल का भाग हमें प्रदान करो. तुम वर्षा प्रदान करने में समर्थ मेघरूपी जलपूर्ण
मशक को छोड़ो अर्थात् महती वर्षा करो. (१)
न घ्रंस्तताप न हिमो जघान प्र नभतां पृथिवी जीरदानुः.
आपश्चिदस्मै घृतमित् क्षरन्ति यत्र सोमः सदमित् तत्र भद्रम्.. (२)
ग्रीष्म ऋतु हमें संताप न दे और शीत ऋतु हमें कांपने की बाधा न पहुंचाए. अत्यधिक
दान देने वाली पृथ्वी वर्षा से भीग जाए. इस यजमान के लिए जल भी प्रसन्नता कारक हों.
जहां सोम नामक देव हैं, उस देश में सदा ही कल्याण होता है. (२)
सूक्त-२० देवता—प्रजापति, धाता
प्रजापतिर्जनयति प्रजा इमा धाता दधातु सुमनस्यमानः.
संजानानाः संमनसः सयोनयो मयि पुष्टं पुष्टपतिर्दधातु.. (१)
प्रजापति इस पुत्र, पौत्र आदि रूप प्रजा को उत्पन्न करें तथा अनुकूल मन वाले धाता
इस प्रजा का पोषण करें. ये प्रजाएं समान ज्ञान वाली, मिले हुए मन वाली और समान कारण
वाली हों. पुष्टपति नाम के देव मुझे प्रजा विषयक पोषण प्रदान करें. (१)
सूक्त-२१ देवता—अनुमति
अन्वद्य नो ऽ नुमतिर्यज्ञं देवेषु मन्यताम्.
अग्निश्च हव्यवाहनो भवतां दाशुषे मम.. (१)
सभी कर्मों की अनुमति देने वाली पौर्णमासी की देवी हमारा यज्ञ इस समय देवों को
बताएं. अग्नि देव भी मुझ यजमान की हवि देवों को प्राप्त कराने वाले हों. (१)
अन्विदनुमते त्वं मंससे शं च नस्कृधि.
जुषस्व हव्यमाहुतं प्रजां देवि ररास्व नः.. (२)
हे अनुमति नामक देवी! तुम हमें अनुमति दो तथा हमें सुख प्राप्त कराओ. तुम सामने
आ कर अग्नि में डाला हुआ हमारा हवि स्वीकार करो. हे देवि! पुत्र, पौत्र आदि रूप हमारी
प्रजा की रक्षा करो. (२)
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अनु मन्यतामनुमन्यमानः प्रजावन्तं रयिमक्षीयमाणम्.
तस्य वयं हेडसि मा ऽ पि भूम सुमृडीके अस्य सुमतौ स्याम.. (३)
हे अनुमति नामक देवी! मुझे पुत्र, पौत्र आदि से युक्त एवं कभी समाप्त न होने वाले धन
को प्राप्त कराओ. हम तेरे क्रोध के विषय न बनें. हम इस अनुमति देवी की सुख देने वाली
और अनुग्रह करने वाली बुद्धि में रहें. (३)
यत् ते नाम सुहवं सुप्रणीते ऽ नुमते अनुमतं सुदानु.
तेना नो यज्ञं पिपृहि विश्ववारे रयिं नो धेहि सुभगे सुवीरम्.. (४)
हे यजमानों को धन देने वाली सुप्रणीति देवी एवं हे अनुमति! हमारे यज्ञ को इस प्रकार
पूर्ण करो कि तुम्हारा हवन सिद्ध हो सके. यह प्रसन्न करने योग्य एवं अभिमत फल देने वाला
है. (४)
एमं यज्ञमनुमतिर्जगाम सुक्षेत्रतायै सुवीरतायै सुजातम्.
भद्रा ह्यस्याः प्रमतिर्बभूव सेमं यज्ञमवतु देवगोपा.. (५)
अनुमति देवी हमारे द्वारा दिए जाते हुए यज्ञ में आएं. वे हमें उत्तम फल देने वाली हों. हे
विश्वधारा तथा हे सुभगा अनुमति! हमें उत्तम संतान वाला धन प्रदान करो. (५)
अनुमतिः सर्वमिदं बभूव यत् तिष्ठति चरति यदु च विश्वमेजति.
तस्यास्ते देवि सुमतौ स्यामानुमते अनु हि मंससे नः.. (६)
अनुमति देवी ही यह सारा दिखाई देता हुआ संसार है. वह जगत् में स्थावर, जंगम
आदि के रूप में वर्तमान है एवं बिना विचारे ज्येष्ठता करती हैं. यह सारा संसार बुद्धिपूर्वक
चेष्टा करता है. हे अनुमति देवी! हम तेरी अनुग्रह बुद्धि में हों. हे अनुमति! तुम हमें अनुमति
दो. (६)
सूक्त-२२ देवता—आत्मा
समेत विश्वे वचसा पतिं दिव एको विभूरतिथिर्जनानाम्.
स पूर्व्यो नूतनमाविवासत् तं वर्तनिरनु वावृत एकमित् पुरु.. (१)
हे सब बांधवो! आकाश के स्वामी सूर्य की स्तुति मंत्रों के द्वारा करो. वे सूर्य प्राणियों के
मुख्य स्वामी एवं नित्य चलते रहने वाले हैं. वे पुरातन सूर्य इस नूतन पुरुष की सेवा करें. बहुत
से सत्कर्म उस एकमात्र सूर्य के मार्ग का अनुवर्तन करते हैं. (१)
सूक्त-२३ देवता—ब्रध्न
अयं सहस्रमा नो दृशे कवीनां मतिर्ज्योतिर्विधर्मणि.. (१)
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यह दिखाई देता हुआ सूर्य हजार वर्ष तक हमें दिखाई देता रहे. क्रांतदर्शी पुरुषों के द्वारा
मनन करने योग्य, सब को अपनेअपने कर्मों में लगाने वाले ये सूर्य हमें प्रतिदिन सत्कर्म करने
की प्रेरणा देते रहें. (१)
ब्रध्नः समीचीरुषसः समैरयन्.
अरेपसः सचेतसः स्वसरे मन्युमत्तमाश्रिते गोः.. (२)
पाप रहित, समान ज्ञान वाले एवं दिन के समय अतिशय दीप्तिशाली सूर्य हमें पूजा
आदि कर्मों में प्रेरित करें. (२)
सूक्त-२४ देवता—दुःस्वप्न विनाश
दौष्वप्न्यं दौर्जीवित्यं रक्षो अभवमराय्यः.
दुर्नाम्नीः सर्वा दुर्वाचस्ता अस्मन्नाशयामसि.. (१)
व्याधि दिखाने वाले बुरे सपने को, राक्षसों को, टोनेटोटके से उत्पन्न भीषण भय को,
पिशाचियों को तथा दरिद्रता को हम इस होने वाले टोटके से ग्रस्त पुरुष से दूर करते हैं. (१)
सूक्त-२५ देवता—सविता
यन्न इन्द्रो अखनद् यदग्निर्विश्वे देवा मरुतो यत् स्वर्काः.
तदस्मभ्यं सविता सत्यधर्मा प्रजापतिरनुमतिर्नि यच्छात्.. (१)
परम ऐश्वर्य वाले इंद्र देव ने हमारे लिए जो फल दिया तथा अग्नि, विश्वे देव, मरुद्गण
और स्वका नामक देवों ने हमारे लिए जो फल दिया. सब के प्रेरक सविता और यथार्थ नाम
वाले प्रजापति ने जिस फल की अनुमति दी. वह फल हमें प्राप्त हो. (१)
सूक्त-२६ देवता—विष्णु
ययोरोजसा स्कभिता रजांसि यौ वीर्यैर्वीरतमा शविष्ठा.
यौ पत्येते अप्रतीतौ सहोभिर्विष्णुमग्न् वरुणं पूर्वहूतिः.. (१)
जिन विष्णु और वरुण के बल के द्वारा पृथ्‍वी आदि स्थान दृढ़ किए गए हैं, जो विष्णु
और वरुण अपने वीरतापूर्ण कर्मों के द्वारा अतिशय शक्तिशाली ऐश्वर्य प्राप्त कर चुके हैं, उन
विष्णु और वरुण को सभी देवों से पहले किया गया आह्वान प्राप्त हो. (१)
यस्येदं प्रदिशि यद् विरोचते प्र चानति वि च चष्टे शचीभिः.
पुरा देवस्य धर्मणा सहोभिर्विष्णुमग्न् वरुणं पूर्वहूतिः.. (२)
विष्णु और वरुण की आज्ञा में यह जगत् विशेष रूप से दीप्त है, सांस लेता है और