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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

सूक्त-११७ देवता—इंद्र

अमन्महीदनाशवो ऽ नुग्रासश्च वृत्रहन्.
सकृत् सु ते महता शूर राधसा ऽ नु स्तोमं मुदीमहि.. (२)
हे वृत्रहंता इंद्र! हम तुम्हारी वृद्धि के द्वारा सुखी हों तथा अपने को नाश से रहित मानें.
(२)
सूक्त-११७ देवता—इंद्र
पिबा सोममिन्द्र मन्दतु त्वा यं ते सुषाव हर्यश्वाद्रिः.
सोतुर्बाहुभ्यां सुयतो नार्वा.. (१)
हे इंद्र! हम जिस सोमरस को पत्थरों के द्वारा संस्कारित करते हैं, वह तुम्हें तृप्त करे.
इस का संस्कार करने वाले के हाथ में पत्थर है. हे इंद्र! तुम इस सोमरस का पान करो. (१)
यस्ते मदो युज्यश्चारुरस्ति येन वृत्राणि हर्यश्व हंसि.
स त्वामिन्द्र प्रभूवसो ममत्तु.. (२)
हे हरि नाम वाले घोड़ों के स्वामी एवं समृद्धि प्रदान करने वाले इंद्र देव! जिस सोमरस
से प्राप्त हुए उत्साह के द्वारा आप असुरों का वध करते हैं, वह सोमरस आप को अत्यधिक
मादकता प्रदान करे. (२)
बोधा सु मे मघवन् वाचमेमां यां ते वसिष्ठो अर्चति प्रशस्तिम्.
इमा ब्रह्म सधमादे जुषस्व.. (३)
हे इंद्र! जिस प्रशंसा की वसिष्ठ पूजा करते हैं, उस मंत्र समूह वाली मेरी वाणी को यश
के साथ स्वीकार करो. (३)
सूक्त-११८ देवता—इंद्र
शग्ध्यू ३ षु शचीपत इन्द्र विश्वाभिरूतिभिः.
भगं न हि त्वा यशसं वसुविद्मनु शूर चरामसि.. (१)
हे इंद्र! मैं यह चाहता हूं कि मैं तुम्हारे सभी रक्षा साधनों के द्वारा यश और सौभाग्य
प्राप्त करने के हेतु तुम्हारा अनुयायी बनूं. (१)
पौरो अश्वस्य पुरुकृद् गवामस्युत्सो देव हिरण्ययः.
नकिर्हि दानं परिमर्धिषत् त्वे यद्यद्यामि तदा भर.. (२)
हे इंद्र! तुम नगरवासियों के लिए अश्व के समान हो तथा धन को अपरिमित बनाते हो.
तुम गायों की वृद्धि करने वाले तथा स्वर्ण से पूर्ण और मनचाहा दान देने वाले हो. मैं जिन
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वस्तुओं को पाने के लिए तुम्हारे आश्रय में आया हूं, उन वस्तुओं को मुझे प्रदान करो. (२)
इन्द्रमिद् देवतातय इन्द्रं प्रयत्य ध्वरे.
इन्द्रं समीके वनिनो हवामह इन्द्रं धनस्य सातये.. (३)
हम इंद्र की सेवा करने वाले हैं. संग्राम उपस्थित होने पर हम धन प्राप्ति के लिए इंद्र को
बुलाते हैं. (३)
इन्द्रो मह्ना रोदसी पप्रथच्छव इन्द्रः सूर्यमरोचयत्.
इन्द्रे ह विश्वा भुवनानि येमिरे इन्द्रे सुवानास इन्दवः.. (४)
इंद्र ने सूर्य को तेजोमय तथा आकाश और पृथ्वी को अपनी महिमा से विस्तृत किया है.
इन इंद्र ने सब भुवनों को अपने आश्रय में लिया है. ये सोमरस इंद्र के लिए निष्पन्न किए जाते
हैं. (४)
सूक्त-११९ देवता—इंद्र
अस्तावि मन्म पूर्व्यं ब्रह्मेन्द्राय वोचत.
पूर्वीर्ऋतस्य बृहतीरनूषत स्तोतुर्मेधा असृक्षत.. (१)
हे ऋत्विजो! मैं ने प्राचीन स्तोत्र के द्वारा इंद्र की स्तुति की है. अब तुम भी यज्ञ की
प्राचीन ऋचाओं से इन की स्तुति करो. स्तोताओं की बुद्धि मंत्रों से संपन्न हो गई है. (१)
तुरण्यवो मधुमन्तं घृतश्चुतं विप्रासो अर्कमानृचुः.
अस्मे रयिः पप्रथे वृष्ण्यं शवोऽस्मे सुवानास इन्दवः.. (२)
इस यजमान का धन बढ़ता है और इस के लिए बल प्राप्त होता है. इंद्र के लिए सोमरस
सिद्ध किया जाता है. शीघ्रता करने वाले ब्राह्मण पूजा संबंधी मंत्रों से इंद्र की प्रशंसा करते हैं.
(२)
सूक्त-१२० देवता—इंद्र
यदिन्द्र प्रागपागुदङन्य ग्वा हूयसे नृभिः.
सिमा पुरू नृषूतो अस्यानवे ऽ सि प्रशर्ध तुर्वशे.. (१)
हे इंद्र! तुम चारों दिशाओं में स्थित मनुष्यों के द्वारा बुलाए जाते हो. तुम शत्रुओं का पूर्ण
रूप से नाश कर देते हो. तुम इस यजमान के यज्ञ में आओ. (१)
यद्वा रुमे रुशमे श्यावके कृप इन्द्र मादयसे सचा.
कण्वासस्त्वा ब्रह्मभि स्तोमवाहस इन्द्रा यच्छन्त्या गहि.. (२)