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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

सूक्त-१०४ देवता—इंद्र

करते हैं. (३)
सूक्त-१०४ देवता—इंद्र
इमा उ त्वा पुरूवसो गिरो वर्धन्तु या मम.
पावकवर्णाः शुचयो विपश्चितो ऽ भि स्तोमैरनूषत.. (१)
हे इंद्र! तुम अपरिमित ऐश्वर्य वाले हो. अग्नि के समान पवित्र हमारी वाणियां तुम्हारी
वृद्धि करें. हे स्तोताओ! तुम इंद्र के लिए प्रशंसा मंत्रों का उच्चारण करो. (१)
अयं सहस्रमृषिभिः सहस्कृतः समुद्र इव पप्रथे.
सत्यः सो अस्य महिमा गृणे शवो यज्ञेषु विप्रराज्ये.. (२)
जल के द्वारा बढ़े हुए सागर के समान ये अग्नि ऋषियों द्वारा दी गई हवियों से हजार
गुना बढ़ते हैं. मैं इन अग्नि की महिमा का यथार्थ रूप में बखान कर रहा हूं. इन अग्नि का बल
यज्ञ में देखने योग्य होता है. (२)
आ नो विश्वासु हव्य इन्द्रः समत्सु भूषतु.
उप ब्रह्माणि सवनानि वृत्रहा परमज्या ऋचीषमः.. (३)
हे इंद्र! तुम हवि प्राप्त करने योग्य हो. तुम हमें सभी यज्ञों में सुशोभित करो. वृत्र राक्षस
को मारने वाले इंद्र ऋचाओं के अनुसार अपना रूप प्रकट करते हैं. वे इंद्र हमारे सूक्तों, हवियों
तथा मंत्रों को सुशोभित बनाएं. (३)
त्वं दाता प्रथमो राधसामस्यसि सत्य ईशानकृत्.
तुविद्युम्नस्य युज्या वृणीमहे पुत्रस्य शवसो महः.. (४)
हे धनों को देने वाले अग्नि! तुम सब को प्रभुता प्रदान करते हो. तुम जलों के पुत्र हो.
हम प्रदीप्त अग्नि का वरण करते हैं. (४)
सूक्त-१०५ देवता—इंद्र
त्वमिन्द्र प्रतूर्तिष्वभि विश्वा असि स्पृधः.
अशास्तिहा जनिता विश्वतूरसि त्वं तूर्य तरुष्यतः.. (१)
हे इंद्र! तुम अशक्ति के नाशक, कल्याणकारी तथा हिंसापूर्ण युद्धों में प्रतिस्पर्धा करने
वाले हो. तुम सब की अपेक्षा शीघ्रता करने वाले हो. (१)
अनु ते शुष्मं तुरयन्तमीयतुः क्षोणी शिशुं न मातरा.
विश्वास्ते स्पृधः श्रथयन्त मन्यवे वृत्रं यदिन्द्र तूर्वसि.. (२)
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हे इंद्र! तुम्हारे शीघ्रता करने वाले वज्र के पीछेपीछे आकाश और पृथ्वी उसी प्रकार
जाते हैं, जिस प्रकार पिता और माता पुत्र के पीछेपीछे चलते हैं. जब तुम वृत्र राक्षस का नाश
कर रहे थे, उस समय उस की द्वेष पूर्ण वृत्तियां तुम्हारे नाश की कामना कर रही थीं. (२)
इत ऊती वो अजरं प्रहेतारमप्रहितम्.
आशुं जेतारं हेतारं रथीतममतूर्तं तुग्र्यावृधम्.. (३)
जब तुम वृत्र का नाश कर रहे थे, उस समय यहां प्रेरित होने वाली रक्षक शक्तियां तुम्हें
अप्रतिहित में होने वाला, वृद्धावस्था से रहित, रथियों में उत्तम, शीघ्र विजय प्राप्त करने वाला,
अपराजेय एवं वृद्धि करने वाला बना रही थीं. (३)
यो राजा चर्षणीनां याता रथेभिरध्रिगुः.
विश्वासां तरुता पृतनानां ज्येष्ठो यो वृत्रहा गृणे.. (४)
जो इंद्र मनुष्यों के राजा, सेनाओं को पराजित करने वाले, वृत्र के हंता, ज्येष्ठ एवं रथों
के द्वारा मंत्रकर्ता के सामने जाने वाले हैं, मैं ऐसे इंद्र की स्तुति करता हूं. (४)
इन्द्रं तं शुम्भ पुरुहन्मन्नवसे यस्य द्विता विधर्तरि.
हस्ताय वज्रः प्रति धायि दर्शतो महो दिवे न सूर्यः.. (५)
हे पुरुहन्म ऋषि! इंद्र की सत्ता स्वर्ग और अंतरिक्ष में है. क्रीड़ा के लिए हाथ में लिया
हुआ इंद्र का वज्र सूर्य के समान दर्शनीय है. तुम इस यज्ञ में उन्हीं इंद्र को सुशोभित करो. (५)
सूक्त-१०६ देवता—इंद्र
तव त्यदिन्द्रियं बृहत् तव शुष्ममुत क्रतुम्. वज्रं शिशाति धिषणा वरेण्यम्..
(१)
हे इंद्र! तुम्हारा बल बुद्धि से वरण करने योग्य है. तुम्हारा बल कर्मरूपी वज्र को तीव्र
करता है. (१)
तव द्यौरिन्द्र पौंस्यं पृथिवी वर्धति श्रवः. त्वामापः पर्वतासश्च हिन्विरे.. (२)
हे इंद्र! आकाश तुम्हारा वीर्य है तथा जल और पर्वत तुम्हें प्रेरणा देते हैं. पृथ्वी तुम्हारे
द्वारा ही अन्न की वृद्धि करती है. (२)
त्वां विष्णुर्बृहन् क्षयो मित्रो गृणाति वरुणः. त्वां शर्धो मदत्यनु मारुतम्..
(३)
हे इंद्र! सूर्य, वरुण, यम और विष्णु तुम्हारे प्रशंसक हैं. वायु के पीछे चलने वाला दल
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