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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

१६३ अकबर बीरबल विनोद

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१६३ अकबर बीरबल विनोद
बादशाह बाहर निकलने के दूसरे ही दिन सारे नगर
में अपने प्रगट होने का ढिंढोरा पिटवा दिया जिससे
प्रजावर्ग में आनन्द की वर्षा होने लगी और अत्याचार यानी
बगावत करने की इच्छा करने वालों को भय उत्पन्न होगया ।
दरबार के समय नगर के हर एक विभाग से दरबारी
गण और प्रजावर्ग के लोग आ आ कर दरबार को भरने लगे।
बादशाह क्रोधोन्मुख सिंहासन पर आ बिराजे । इतने दिनों
के पश्चात आज बादशाह को लोगों ने सिंहासन पर आरूढ़
देखा । लोग बादशाह को सलाम कर करीने से अपनी २
जगहों पर जा बैठे । बादशाह से रुख मिलाने की किसी
में शाहस न थी, सबका सिर नीचे को झुका हुआ था ।
इसी बीच सिपाही लोग गंग कवि को रात्रि वाली पोशाक में
बांधकर दरबार में ले आये । गंग को प्रोत्साहन देकर भेजने
वाले दीवान प्रभृत सभी दरबारियों ने गंग के निराले ढंग को
देखा । वे मनही मन ईश्वरसे उसकी खैर मनाते हुए सुअवसर
की प्रतीक्षा करने लगे । वे तन मन से उसकी जीवन रक्षा
करने के लिये तत्पर थे ।
बादशाह गंगको न पहचान कर बोले—"मैं क्या देख
रहा हूँ; क्या यह कोई प्रेत वा पिशाच तथा भूत तोनहीं है ?"
तब गंग कवि को सुअवसर मिला और वह बधा बँधा झुक
कर बादशाह को सलाम किया । सलाम करते समय उसकी
लम्बी टोपी जमीन पर गिर पड़ी जिससे उसका चेहरा
साफ साफ दिखाई पड़ने लगा । बादशाह गंग को देखकर
पहचान गये और बोले-"गंग ! तुमने किस अधिकार से
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अकबरबीरबल विनोद १६४
रात्रि के समय मेरे जनाने महल में प्रवेश किया था ?
तुम्हारा कसूर प्राण दण्ड पाने का है।" गंग लाचार था, उसने
अपने मुख से कुछ भी उत्तर न दिया। बादशाह की आज्ञा
पातेही वधिक उसे कतल करने के लिये म्यान से तलवार
निकाल कर सामने आये ।
गंग अपनी अन्तिम घड़ियाँ गिनने लगा; फिर उसका
ध्यान उन दरबारियों की तरफ गया जिनकी कृपा से वह
इस दशा को प्राप्त हुआ था। वह बारी बारी सबके मुख की
तरफ फिरकर देखा। इशारे से हरचन्द लोगों को अपनी
सहायता के लिये प्रोत्साहित किया; परन्तु प्राण जाने के भय से
सहायता करने की कौन कहे कोई सिर उठाकर उसकी तरफ
देखा तक नहीं। बादशाह गंगकी सारी हरकतों का मनोमन निरी-
क्षण कर रहे थे; आखिरकार उनसे न रहा गया और गंग
से बोले- "गंग ! तू आज यह कौन सा ढोंग निकाला है दरबार
है या तमाशे का घर । गंग से रहा न गया; कल की सभा के
परामर्श दाताओं की काली करतूत उसे सूल की तरह बेध
रही थी। अभी कल्ह तो वे उसे विमानारूढ़ कर सदेह स्वर्ग
पहुँचाने पर तुले हुए थे और आज किसी के मुख में छेद ही नहीं
दिखाई पड़ता। ऐसा प्रतीत होता है कि अगली बातों से इन्हें
कुछ भी परिचय नहीं है। जब मुझे काल के गाल में जाना
ही है तो इन्हें भी विश्वासघात का मजा चखाकर जाना
चाहिये ताकि सबको आगे के लिये मेरा सबक याद रहे।
कवि गंग दरबारियों की तरफ हाथ का इशारा करके
बोला- "पृथ्वीनाथ ! इन्हीं दरबारियों की काली करतूतों के

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१६५ अकबर बीरबलविनोद
कारण आज मैं इस दुर्गति को प्राप्त हुआ हूँ, इसमें इन सबों
का सारा अपराध है। फिर उसने सब के सामने प्राइवेट सभा
का होना और उसमें लोगों का उसे उभार कर भेजना
आदि २ बातें एक एक कर कहना शुरू किया ।
गंग कवि की बातों से बादशाह को बड़ा कौतूहल हो रहा
था, इस पर तो वे खिलखिला कर हँस पड़े जब कि गंग
द्वारा उसे मालूम हुआ कि दरबारी लोग कलह की सभामें उसे
बचाने का कस्ट करके अब मुँह से चूँ तक नहीं बोलते ।
बादशाह ज्यों ज्यों गंग कवि से उसकी कहानी सुनते
गये त्यों त्यों उनके क्रोध में कमी आती गई। अन्त में
वे प्रसन्न होकर गंग कवि के प्राणदण्ड की सजा रद्द करदी
और उसके कर्त्तव्यों को उपकार की दृष्टिसे किया जाना समझ
कर उसे अच्छी पारितोषिक प्रदान किये । बादशाह ने कहा-
“देखो कविवर ! मेरी बातें गठिया कर रखलो; जो लोग
मधुर भाषी होते हैं वे कभी भी अपने वादे के सच्चे नहीं निक-
लते । इसलिये किसी की मीठी मीठी बातें सुनकर उसके फेर
में तबतक नहीं आना चाहिये जबतक कि उसका दिली भाव
न समझ में आ जाय ।”
बादशाह को अपने दरबारियों की धूर्तता से कुछ खेद सा
उत्पन्न हो गया था इसलिये उनकी तरफ इशारा करके बोले-
“आप लोगों ने इस विचारे वृद्ध को मरने के लिये तो भले
ही उसका कर काम निकाल लिया, परन्तु उसके छुड़ाने का
किसी ने कुछ भी प्रयास नहीं किया क्या तुम्हें यही करना
यथोचित था।”

अकबर बीरबल विनोद १९६

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अकबर बीरबल विनोद १९६
बीरबल बोला—"पृथ्वीनाथ ! हम लोग कविवर के बड़े
आभारी हैं क्योंकि इन्होंने अपनी जानपर खेलकर हज़ारों की
प्राणरक्षा की है। हम इस बात से भली भाँति परिचित हैं कि
आप परिणामदर्शी हैं, इसलिये उन्हें मरने न देंगे। यदि बीच
में हमलोग आप से कोई छेड़ छाड़ करते तो आपकी क्रोधाग्नि
और भी भड़क जाती, फिर उस समय हमलोगों के सँभाले
न सँभलती, इन्हीं सब परिणामों पर दृष्टिपात कर
सब लोग खामोश रह गये।" फिर यह काम समाप्त कर
बादशाह पिछड़े राजकीय कामों के करने में तत्पर हुए और
पहले के समान बराबर दर्बार में उपस्थित होकर सारे पिछड़े
हुए कामों को थोड़े दिनों में ही सँभाल लिया। दर्बारियों की
इस चातुर्य्यता से, आतंक फैलाने वालों का शिर नीचा होगया।
सबसे प्यारी वस्तु
एक दिन बादशाह जनाने महल में अपने सबसे प्रिय
बेगम से कुछ बातें कर रहा था। बात बात में कोई ऐसा
विषय आगया जिससे कि वह सिरसे पैर तक बेगम से
फिरन्ट हो गया और उसे आज्ञा दी कि तुम आज शाम
तक महल खाली कर दो। बेगम विचारी ने यद्यपि बादशाह
के गुस्से को शान्त करने के लिये बहुतेरा प्रयास किया; परन्तु
सब निष्फल गया। बादशाह उसी क्रोधावेश में महल से
बाहर चले गये। बेगम भय से थरथर काँपने लगी। जब
अपने बचाव के लिये बहुत मूड़मार कर भी कोई युक्ति न निकाल
सकी तोउसका ध्यान बीरबल की तरफ गया। उसने दासको

१६७ अकबर बीरबल विनोद

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१६७ अकबर बीरबल विनोद
भेजकर चुपके से बीरबल को महल में बुलवाकर अपना सारा
हाल कह सुनाया। बीरबल उसे एक गुप्त परामर्श देकर तुरत
महल से बाहर आया और फिर दर्बार के कामों को इस ढंग से
मौन होकर करने लगा मानो उसे इसकी कुछ खबर ही नहीं।
जब थोड़ा दिन ढलने को बाकी रहगया तो बेगम ने
कुछ सामानों के अलग अलग कई गट्ठर बाँधकर बादशाह को
बुलवाया। जब वे आये तो बेगम ने बहुतेरा अनुनय
बिनय किया; परन्तु फिर भी बादशाह का मन पल्टा नहीं
खाया। वे बोले-“अब समय नहीं है, सूर्यास्त हो रहा है
अतएव अपनी प्यारी सामग्रियों को लेकर फौरन मकान
खाली करदो।” बेगम बोली-“स्वामी ! जब आप मुझे त्यागते
ही हैं तो मेरी एक अन्तिम प्रार्थना स्वीकार करें। मैं चाहती
हूँ कि इस जुदाई के समय मेरे हाथ से एक गिलास शर्बत पान
करलें। अब जब मेरा सौभाग्य कहीं फिर से उदय होगा तब
न मुझे आपका दर्शन मिलेगा।” स्त्रियों की मोहनी भी क्या
है, बादशाह बेगम के जाल में फँस गया।
बेगम एक प्याले में खूब अच्छी सराब भर लाई और बाद-
शाह को अपने हाथों से पिला दिया। थोड़ी देर में बादशाह
शराब की नशे में ऊँघने लगा। बेगम पहले ही से अपने नौकर
को सावधान कर चुकी थी, वे बादशाह को ले जाकर एक
पालकी में सुला दिया। फिर बेगम भी एक दूसरी पालकी में
सवार होकर बादशाह के सहित अपने पीहर चली गई।
वह बादशाह को एक पलँग पर सुलाकर आप स्वयं उसकी
पहरेदारी करने लगी। दूसरे दिन जब बादशाह की नींद

अकबर बीरबल विनोद १९८

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अकबर बीरबल विनोद १९८
खुली और नशे का झोका टूटा तो अपने को एक अपरिचित
स्थान में पाया। उन्हें सन्देह हुआ-“क्या मैं स्वप्न देख रहा हूँ?”,
बेगम सामने पंखा झल रही थी बादशाह नेउससे पूछा-“क्या
तुम बतला सकती हो कि मैं इस समय सोया हूँ अथवा जाग
रहा हूँ।” बेगम ने उत्तर दिया-“स्वामीनाथ ! पहले आप सो
रहे थे, परन्तु अब सबेरा होने पर आपकी निन्द्रा भंग हो गई
है। उठिये हाथ मुँह धोकर नमाज पढ़ लीजिये। बादशाह
बोले-“पहले बतलाओ कियह किसका महल है और हम कहाँ
पर आये हुए हैं।” बेगम ने अपना दोनों हाथ जोड़कर कहा-
“प्रभु ! यह आप की ससुराल यानी मेरे पिता का घर है। मैं
भी आपकी आज्ञा पालन करने के लिये यहाँ पर आई हूँ।”
बादशाह ने फिर पूछा-“तब मैं कैसे आया।” बेगम ने उत्तर
दिया-“स्वामी ! आपने मुझे आज्ञा दी थी कि जो तुम्हारी सब
से प्यारी वस्तु हो उसे अपने साथ लेती जाओ।” मैं ईश्वर
की साक्षी देकर कहती हूँ कि महल भर में ही नहीं बल्कि
समस्त ससार में आपसे बढ़कर मुझे कुछ भी प्यारा नहीं है।
इसलिये मैं आपको अपने साथ लेकर यहाँ चली आई हूँ।”
बेगम के ऐसे अनुराग को देखकर बादशाह दयार्द्र हो गये
और उसके अपराधों की माफी दी। फिर अपने ससुर से मिल
भेट सबकी राजी कर सास ससुर की अनुमति से उसी
दिन बेगम के सहित अपने नगर को लौट आये।
कुछ दिनों के बाद जब फिर बेगम और बादशाह में भली
भाँति प्रेम हो गया तो एक दिन ससुराल जाने वाली बात
बादशाह के ध्यान में आ गई; तुरत बेगम से पूछा-“प्रिये ! क्या

१६६ अकबर बीरबल विनोद

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१६६ अकबर बीरबल विनोद
तू बतला सकती हो कि उस रोज तुम किसकी सम्मति से
मुझे अपने पीहर ले गई थी।” बेगम ने उत्तर दिया-“स्वामी !
वह आपके चतुर दीवान बीरबल की सम्मति थी।
उन्हीं की कृपा से मुझे आप फिर से प्राप्त हुए हैं।” बादशाह
बीरबल पर प्रसन्न होकर उसे बहुत धन्यवाद दिये।
दीवान और काना नाई
एक दिन बीरबल गुप्त रूप से नगर पर्यटन के लिये
निकला था। घूमते २ वह एक ऐसे स्थानपर जा पहुँचा जहाँ
कि एक अमीर एक युवती कन्यापर बलात्कार करने की चेष्टा
कर रहा था। यह युवती कुमारी कन्या थी। इसके रूप और
यौवन को देखकर वह यवन मोहित हो गया था। वह बहुत
दिनोंसे उसे फाँसने की चेष्टा में लगा हुआ था, परन्तु वह उसे
अपने पास नहीं फटकने देती थी। आज अचानक किसी प्रकार
उधर आ पड़ी थी इसलिये वह अपने कलुषित हृदय की अग्नि
शान्त करने की फिराक में पड़ा हुआ था। उस कुमारिका
के भाग्यवश उसी समय बीरबल भी वहाँ जा पहुँचा।
बीरबल की पोशाक मुसलमानी ढंग की देखकर उस
यवन ने मुसलमान समझकर बीरबल से बोला-“महाशयजी !
आप भी मुसलमान ही जान पड़ते हैं यदि आप में कुछ भी मजहब
का जोश हो तो इस समय मेरी सहायता करें। यह हमारी
स्त्री है, यह एक हिन्दू के बहकावे में आकर उसके साथ
जाना चाहती है, और पूछने पर अपने को हिन्दू बतलाती है।

अकबर बीरबल विनोद २००

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अकबर बीरबल विनोद २००
यदि आपकी थोड़ी मदद मिले तो मैं इसको घसीट कर अपने
घर ले जाऊँ । मैं एक नामी रईस हूँ, शायद आपने सरदार
खाँ का नाम कहीं न कहीं अवश्य सुना होगा। मेरा मकान भी
यहाँ से करीब ही है।"
बीरबल ने कहा-"सच है; मुसलमान के नाते मैं आपकी
मदद करने को उद्यत हूँ, परन्तु इस परिश्रम के लिये मुझे क्या
पुरस्कार दोगे ?" सरदार खाँ ने कहा-"मैं अधिक कुछ कहना
पसन्द नहीं करता, परन्तु आपको इतना बचन अवश्य देता हूँ
कि यदि आपकी सहायता से मैं इस कार्य में सफल हो जाऊँगा
तो आपको खुश कर दूँगा।" बीरबल ने कहा-"अच्छी बात
है, पहले मैं इस स्त्री को समझाकर रजामन्द करूँगा अगर
नहीं मानेगी तो देखा जायगा। आपको मुनासिब है कि जब
तक मैं इसे समझा बुझाकर राजी न करलूँ दूर खड़े
रहें।" कामी कुत्ते को जैसे आगा पीछा नहीं सूझता और
वह कुतियों के पीछे मारा मारा फिरता और निरादर सहता
है, वही हालत अमीर खाँ की भी थी। वह बीरबल की बात
मानकर अलग जा खड़ा हुआ। तब बीरबल ने उस स्त्री से
पूछा-"ऐ स्त्री ! तू अपना सच्चा सच्चा हाल मुझसे बयान
कर, मेरा नाम बीरबल है। तेरी सच्ची वाक्या सुनकर मैं तेरा
छुटकारा करा दूँगा, मैं इस समय गुप्त रूप से नगर का हाल
जानने के लिये गस्त लगा रहा हूँ।" बीरबल का नाम बच्चे
बच्चेके कानोंमें गूँज रहा था। उसकी न्यायप्रणाली से आला
से अदना सभी को उस पर विश्वास था। कन्या बीरबल
का नाम सुनते ही निर्भीक होगई और बोली-" मैं एक ब्राह्मण

२०१ अकबर बीरबल विनोद

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२०१ अकबर बीरबल विनोद

की कन्या हूँ और मेरे माता पिता मुझे लक्ष्मी के नाम से
पुकारते हैं। यह पतित यवन बहुत दिनों से मेरे पीछे पड़ा है
परन्तु मैं इसके हाथ नहीं आती थी। आज अचानक इस जगह
इससे मेरी भेंट होगई, ईश्वर के नाम पर मुझे इसके
हाथसे बचाइये, आपको सवाब होगा। यह पतित मेरी आबरू
बिगाड़ने की फिराक में लगा है, प्रभु की कृपा से आप मेरे
पिता तुल्य धर्म रक्षक मिलगये। इसका शीघ्र सत्यानाश
होगा।” बीरबल ने उस कन्या को ढाढ़स दिलाया, फिर
सरदार खाँ को बुलाकर बोला-“वाह मियाँ सरदार खाँ!
आप सरकारी कर्मचारी हैं और आपका कर्तव्य प्रजाकी रक्षा
करना है, इतना होते हुए भी आप एक ब्राह्मण की लड़की के
साथ बलात्कार करना चाहते हैं, आपको शाही हुक्म पर जरा
गौर करना चाहिये था बादशाह की आज्ञा है कि उसके साम्राज्य
में कोई भी किसी पर अत्याचार न करे। यदि इस अपराध में
कोई पकड़ा जायगा तो उसे कठिन से कठिन दण्ड दिया
जायगा।
सरदार खाँ अपनी शेखी में भूला हुआ था अतएव धृष्टता
कर बोला-“यह सोख औरत आपसे झूठ बोल रही है।”
बीरबल ने कहा-“वह नहीं, बल्कि तुम झूठ बोलते हो। यह
कृपाशंकर व्यास की कन्या है; अब मेरे रहते तुम इसको छूने
की शक्ति नहीं रखते हो, इसी में भला है कि चुपचाप अपने घर
चले जावो; नहीं तो नाहक कष्ट भोगोगे! सरदार खाँ गीदड़
धमकी देखकर काम निकालना चाहता था इसलिये बीरबलको
झिड़क कर बोला-“दुष्ट! तूँ मुझे अलग हटाकर इसे बहका

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अकबर बीरबल बिनोद २०२
दिया है, परन्तु मेरे सामने तेरी दाल न गलेगी और झट म्यान
से तलवार खींचकर बीरबल पर झपटा। बीरबल अपनी
नकली पोशाक उतारकर खासा बीरबल बन गया।'' सरदार
खाँ बीरबल को पहचान कर सन्न हो गया और उसकी
जबान एकदम बन्द हो गई। डरके कारण थरथर काँपने लगा।
बीरबल बोला-''ऐ प्रजा पर अत्याचार करने वाले सर-
दार खाँ ! अब तुम मेरे कैदी हो गये हो। तुमको मेरे साथ
चलना पड़ेगा। तुम प्रजा के रक्षा के निमित्त रक्खे गये थे
धिक्कार है तुम्हारी इस करतूत पर।''
सरदार खाँ चुपचाप बीरबल के साथ हो लिया फिर बीरबल
उस कन्या से बोला-"तू भी मेरे साथ चल। कल मैं तेरे पिता
को बुलवाकर सारी बातें समझा कर तुझे उसके साथ भेज
दूँँगा। कन्या ने सहर्ष बीरबल के साथ जाना स्वीकार किया
घर पहुँच कर बीरबल ने उसे अपनी स्त्री के हवाले किया।
और सरदार खाँ को एक कोठरी में कैदी के रूप में बन्द रक्खा।
सबेरा होते ही उसे सिपाहियों के पहरे में बादशाह के
सामने उपस्थित किया।
बादशाह तथा अन्य सभासद सरदार खाँ के सम्बन्ध में
कुछ नहीं जानते थे। एकाएक उसको कैदी के रूप में देखकर
चकित हो गये। बीरबल से उसका भेद पूछा और बीरबल
अपने भ्रमण से लेकर सरदार खाँ के पकड़े जाने तक की
सारी बातें बादशाह से कह सुनाया। बादशाह जो बात
सुनने का स्वप्न में भी कयास नहीं करता था वह सुनकर
और सामने सरदार खाँ कैदी को देखकर आग बबूला हो

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२०३ अकबर बीरबल बिनोद
होकर बोले-“ऐ नीच सरदार खाँ ! तुमको मैंने इतना
ऊंचा पद प्रदान किया था जिसका तूने मुझे इस प्रकार से
बदला चुकायो, जा मुँहमें कालिख लगाकर मेरी आँखों से
ओझल हो जा। फिर बीरबल ने तुरत उसे कारागृह में
भेज दिया। इसका प्रभाव दूसरे सरदारों पर भी बड़ा गहरा
पड़ा। वे डरवश थरथर काँपने लगे।”
दूसरे दिन सरदारखाँ बादशाह की आज्ञा से भरी सभा
में उपस्थित किया गया और सबके सामने उसको कड़ी सजा
भुगतने का हुक्म सुनाया गया। मुसलमान दरबारी और सर-
दार लोग बीरबल से बहुत चिढ़गये और सभों ने आपस में
मिलकर बीरबल को दर्बार से निकाल बाहर करने की गुप्त चेष्टा
करने लगे। उन्होंने गुप्तरूप से बीरबल की बड़ी शिकायत की
परन्तु बादशाह उनकी एक बात भी सच्ची नहीं मानते थे
उनका बीरबल पर सच्चा अनुराग था और वे उसकी अनेकों
परीक्षाएँ भी ले चुके थे। जिस कारण उन्हें बीरबल पर
कभी अविश्वास नहीं होता था। उन लोगों का जब कोई
चारा न चला तो एक काने नाई को मिलाया और उसे
धन का प्रलोभन देकर इस काम के लिये अग्रसर किया। एक
दिन वह नाई हजामत बनाते समय बादशाह को पिघला कर
बोला-“पृथ्वीनाथ ! आप रोज बड़े से बड़े कर्म किया करते हैं
परन्तु एक बात पर आपने कभी विचार नहीं किया। आप के
बाप दादों को स्वर्ग गये एक जमाना गुजर गया; परन्तु
आपने उनकी सुधि तक न ली, भला वे अपने मन में आपको
क्या कहते होंगे, कहीं वे आपसे नाराज हो जायें तो फिर कौन

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[Header] अकबर बीरबल विनोद २०४
सा उपाय कीजियेगा?" बादशाह ने कहा- "इतने दिनों तक तो
मुझे उनकी सुधि न रही, परन्तु अब तुम्हारे कहने से मुझे भी
विचार करना पड़ा। भाई ! सबसे बड़ी अड़चन की एक बात है
कि आखिरस इस काम के लिये किसे भेजूं ।" तब उस काने
नाईने कहा-"आप अपने पितरों की कमाई तो ले लेते हैं; परन्तु
अब उनकी खोज खबर तक नहीं लेते, भला वे क्या कहेंगे।
बादशाह बोला- "आखिर इस काम को करने के लिये
तुमने किसको उपयुक्त सोचा है। फिर वह जायगा किस
मार्ग से।" तब नाई बोला-"पृथ्वीनाथ ! यह तो आप जाने
कि किसे भेजना चाहिये; परन्तु जाने का मार्ग मैं आपको
बतला सकता हूँ। बादशाह ने कहा-"भली बात है तू शीघ्र
बतला।" काने ने कहा-"आप जिस आदमी को भेजना चाहें
उसे स्मशान पर भेजकर पहले उसके ऊपर घास के बहुत
से पुलिन्दे डलवा दें। जिससे ऊपर से देखने में वह मीनार
के समान देख पड़े फिर उसमें आग लगा देने से वह आदमी
धुयें के साथ पितर लोक में आपसे आप पहुँच जायगा
(भीतर ही भीतर) बिना औषधि के ही बाधा दूर हो
जायगी।"
बादशाह बोला- "यह तो हुआ परन्तु भेजें किसे, यह
भी तू ही निश्चय कर दे।" वह बोला-"भेजे तो वह
जिसे आगे पीछे दीपक भी दिखाने वाला कोई न हो, आपके
यहाँ तो हजारों आदमी एक से एक धकड़ पड़े हुए हैं, हाँ
वह काम बड़े चतुर आदमी का है।" बादशाह ने कहा-"भाई
केवल इतना कह देने से मेरा काम नहीं सरता; आखिर तुम

२०५ अकबर बीरबल विनोद

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२०५ अकबर बीरबल विनोद
अपनी समझ से किसे उपयुक्त समझते हो।" नाई ने उत्तर
दिया- "पृथ्वीनाथ ! मेरी समझ से तो इस काम के उपयुक्त
अ-अ-अ-अरे हां, अच्छा बतला दूँ, हाँ ! बीरबल है, आगे
आपकी इच्छा चाहे जिसको भेजें।"
बादशाह ने कहा- "कहता तो तू बहुत ठीक है; परन्तु
एक बात फिर भी बड़े अड़चन की आ पड़ती है, बीरबल के
जानेके बाद यहाँका कार्य कौन सँभालेगा।"नाई बोला-इसमें
कौनसी बड़ी बात है, उस जगह पर अल्प काल के लिये
कोई दूसरा ही आदमी नियुक्त कर दिया जायगा। यदि आप
वह पद मुझे देना चाहें तो उतने समय तक मैं ही संभाल
दूँगा।" बादशाह हँस पड़े और बोले- "शाबस बच्चे ! कैसा
मुँहमें पानी भर आया ?" तुमको भी दीवान पद के लिये
उत्कण्ठा हो गई।" नाई कुछ सिटपिटा गया, परन्तु फिर
भी मुँह आछत कायल होना अच्छा नहीं समझता था।
उसने कहा- "पृथ्वीनाथ ! इसमें कोई ऐसी बात नहीं है; मैं तो
योंही कह रहा था। यदि आप कहेंगे तो मैं ही चला जाऊँगा
परन्तु मैं जरा वैसा आदमी हूँ। यदि आप किसी को कत्तई
न भेजेंगे तो आप पर पितृऋण बना ही रह जायगा। मुझे
विश्वास पड़ रहा है कि जब आप बीरबलको जाने की आज्ञा देंगे
तो वह अनेक प्रकार से निबुकने की कोशिश करेगा, परन्तु
अपनी बात पर दृढ़ होकर अड़ जायँगे तो जाने के लिये उद्यत
होगा। बड़े बूढ़ों की प्रसन्नता के लिये किसी न किसी को
भेजना बहुत जरूरी है, आगे आप स्वयं मुख्तार हैं। बीरबल
ने नाई की अपील मंजूर करली और उसे घर जाने की आज्ञा

अकबर बीरबल विनोद २०६

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अकबर बीरबल विनोद २०६

दो। वह बड़ी प्रसन्नतापूर्वक वहाँ से प्रस्थान किया और
मुसलमानों की मण्डली में पहुँचकर सबको बधाई दी। वे
लोग उसकी सारी बातें सुनकर बड़े प्रसन्न हुए।
दूसरे दिन दरबार में पहुँचते ही बादशाह को नाई की
बात याद आई और बीरबल को बुलाकर बोले-"बीरबल !
आज कितने समयों से हमें अपने पुरुषाओं का कुछ
समाचार नहीं मिला है इसलिये इस समय मेरे मन में एक-
दम उचाट सा हो गया है, तुम जाकर उनका समाचार बूझ
आओ। बीरबल की आँखें खुल गईं; उसने समझ लिया कि
इसमें फँसाने की बातें हैं। अच्छा देखा जायगा। वह बोला-"
पृथ्वीनाथ ! यह दास जाने को नाहीं नहीं करता, परन्तु
एक बात की अड़चन पड़ेगी। वह यह कि वहाँ पहुँचने के लिये
कोई रास्ता नहीं है फिर क्या किया जाय ? यदि मार्ग का
प्रबन्ध आप करादें तो मैं सहर्ष कल की जगह आजही यात्रा
करने के लिये मुस्तैद हूँ।" बादशाह बोला-"जो सुथनी
सिलाता है वह पाखाना फिरने के लिये उसमें छेद भी बनवा
लेता है। वहाँ पहुँचने की तरकीब काने नाऊ ने पहले ही
बतला दिया है, उसकी युक्ति मुझे भी पसन्द आई है। उसने
कहा है कि जाने वाले आदमी को स्मशान पर बैठा कर उसके
ऊपर से घास की सवा लक्ष पूलियाँ रखकर उसमें आग
सुलगा देने से काम बन जायगा, वह दूत उसी धूयें के साथ
वहाँ (यानी स्वर्ग को) पहुँच जायगा। अतएव तुम दो चार
दिनों में एकदम तयारी करके आओ।"
अब बीरबल समझ गया कि यह सब करामात उसी

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२०७ अकबर बीरबल विनोद


काने नाई की है। परन्तु इस समय इससे बचने के उपाय
सोचने चाहिये। बाद को मैं उससे निपट लूँगा।” वह बाद-
शाह से बोला-“गरीब परवर! मसल मशहूर है कि लोग जाते
तो अपने मन से हैं और आते दूसरों के मन से। जो
आपके पितृलोग मुझे वहाँ कुछ समय के लिये रोक लगे तो
मुझे विवश होकर उनका कहना मान कर रहना पड़ेगा। अतएव
हमारे कुटुम्ब के भरण पोषण का प्रबन्ध होना चाहिये। वहाँ
से मेरे लौटने का कोई निश्चित काल नहीं है, यदि
मुझे सवा लाख सिक्के मिलें तो मैं घर का सब प्रबन्ध करके
जाऊँ। मुझको इस कार्य के लिये दो मास का अवकाश
मिलना चाहिये।
बादशाह ने बीरबल की मांग स्वीकार करली। उन
रुपयों को बीरबल ने सुरंग खुदवाने में खर्च किया। यह
सुरंग बीरबल के आँगन से प्रारम्भ होकर स्मशान तक पहुँ-
चती थी। इसकी तयारी बड़ी सावधानी से की गई। बादशाह
को इस बात की हवा तक न छूने पाई। दो मांस में सुरंग
बनकर तयार हो गई। अब बीरबल बादशाह के पास गया
और सलाम कर बोला-“पृथ्वीनाथ! अब मैं अपने घरेलू कामों
को बिल्कुल ठीक कर स्वर्ग जाने के लिये तय्यार होकर आया
हूँ। बादशाह को इसमें बड़ी दिलचस्पी थी, वह तमाशा
देखने के अभिप्राय से अपने दरबारियों के सहित स्मशान पर
पहुँचा। काना नाई की तो पौ बारह थी, उसकी प्रसन्नता
का कहीं ठिकाना नहीं था। वह ऐसा फूला हुआ था मानो
किसी अहेरी ने बिना परिश्रमही बहुत बड़े बलिष्ठ जानवर

अकबर बीरबल विनोद २०८

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अकबर बीरबल विनोद २०८
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का शिकार किया हो।
बीरबल ने बादशाह से अनुमति लेकर गुप्त सुरंग के द्वार
पर प्रसन्नता-पूर्वक जा बैठा और नाई के कथनानुसार उसके
ऊपर घास फूसों का पुलंदा सजाकर चुना जाने लगा। बीर-
बल समय की प्रतीक्षा कर रहा था। जब उसने देखा कि अब
मैं घास के पुलिन्दों से भलीभाँति ढक दिया गया और यहाँ से
खिसकने में किसी की दृष्टि नहीं पड़ सकती तो सुरंग का
द्वार खोलकर उसके द्वारा कुशल-पूर्वक अपने घर जा पहुँचा।
और फिर छद्म भेष धारण कर श्मशान की घटना देखने के
लिये घाटपर जा पहुँचा। अभी तक घास चुनी जा रही थी।
जब सब घास भलीभाँति चुन दी गयी तो बादशाह की
आज्ञा से उसमें आग डाल दी गई, बहुतेरी हिन्दू जनता बादशाह
की मूर्खता की समालोचना करने लगी कारण कि बीरबल
की सुन्दर नीति से उन्हें बड़ा अनुराग था। इस प्रकार
श्मशान पर एकत्रित जनता का एक बहुत बड़ा भाग बादशाह
की आपकीर्ति फैलाने लगा-हाय ! हाय ! दीवान अब जीवित
नहीं होगा, अब हमें फिर उसके दर्शन की आशा न रही।
उसके कर्म में ब्रह्मा ने यही लिखा था।”
बीरबल क्रमशः उपस्थित जनता में घूमता फिरता मुस-
लमानों की टोली में जा पहुँचा। वे आपस में कह रहे थे-“हम
लोगों के मार्ग का कंटक आज इस प्रकार से टला। अब कोई
मुसलमान नया दीवान चुना जायगा। यह नालायक हम
लोगों को कभी गर्दन सीधी करने का मौका ही नहीं देता।
अब हमको आनन्द ही आनन्द का उपभोग होगा।”

२०६ अकबर बीरबल विनोद

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२०६ अकबर बीरबल विनोद
और आगे बढ़कर बीरबल ने देखा तो काना नाई खूब डींग
मार रहा है और बहुतेरे ही मुसलमान एकत्रित होकर
उसकी बातें सुन रहे हैं। उसने कहा-"यह मेरी ही करतूत
से आज इस अधोगति को प्राप्त हुआ है; यदि मैं इतनी युक्ति
न लड़ाता तो भला कोई उसका एक बाल भी बाँका कर सकता
था। मीर खाँ, अब आप अपने कौल के अनुसार मुझे पुरस्कार
दीजिये।" आपने अपनी आँखों देखा है कि वह भीतर ही
भीतर जलकर खाक हो गया, अब किसी को उसकी हड्डी
गुड्डी भी देखने को नसीब न होगी।"
बीरबल उसकी डींग सुन सुनकर जहर की घूँट घोंट रहा
था, कभी २ तो क्रोध के आवेश में आकर दाँतों तले ओठ दबाकर
रह जाता था। वह मनही मन बोला-"न घबराओ, अबकी बीर-
बल के हाथ से तुम्हारा छूटना कठिन है। मेरी ओसरी खतम
हो गई; अब तुम्हारी बारी है। जब सब घास जल गई, तो लोग
अपने अपने घर चले गये। बीरबल भी चुपके से अपनी गुप्त
कोठरी में जा बैठा। परन्तु उसे चैन कहाँ। रातके समय नित्य
नगर में फेरी लगाया करता था। गुप्तबास करते हुए जब
कई महीने बीत गये तो बीरबल ने अपने प्रकट होने का
निश्चय किया। इतने दिनों में उसको दाढ़ी और मूँछ पर्याप्त
बढ़ चुकी थी। सिर पर बड़ी बड़ी जटाएँ उग आई थीं।
इसी वेश में बीरबल ने दरबार में जाना उत्तम समझा।
तब एक दिन वह दरबारी कपड़ों से सुसज्जित होकर
बादशाह के पास गया। नगर में उसे बहुतेरे परिचित
मिले; परन्तु उसका रूपान्तर हो जानेके कारण वे उसे पहचान
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ग सके । दरबार में पहुँचकर बीरबल बादशाहके सामने खड़ा
होगया। जब बादशाह उसे न पहचान सके तो वह स्वयं बोला-
"पृथ्वीनाथ! मेरा नाम बीरबल है, मैं आपकी आज्ञानुसार आपके
पित्रों से मिलकर वापस आया हूँ।" बादशाह उस को भली-
भाँति देखकर बोले- "वाहजी बीरबल, क्या तुम लौटकर आ
गये ? जरा मेरे पित्रों का समाचार वर्णन करो, वे प्रसन्न तो हैं
न ?" बीरबल ने कहा- "भला उनका क्या कहना है, आपके पुण्य
प्रभाव से वे बड़े आनन्द से हैं, जब मैंने उनको आपका कुशल
समाचार सुनाया तो वे बड़े हर्षित हुये और मुझे
आपका दीवान जानकर तो मुझसे इतना प्रेम करने लगे कि
मैं यहाँ आकर भी उन्हीं के प्रेम में विह्वल हो रहा हूँ। उनका
सुख इन्द्रके सुखभोग को भी लजाने वाला है। वहाँ उन्हें सब
बातों का सुख है केवल एकही बातकी कमी बतलाई है, वह यह
कि उस लोक में हजामत बनवाने के लिये नाई नहीं मिलता।
देखिये इसी से मेरी भी यह दशा हुई। मेरी तो केवल छ
महीने में यह हाल है और उनके बाल तो इतने बढ़ गये हैं
कि चलना फिरना दूभर हो रहा है। उनके सिर और दाढ़ी
के बार जमीन पर लेटते चलते हैं। मेरे चलते समय उन्होंने
आपसे एक चतुर नाई भेजने का अनुरोध किया है। मैं उन्हें
आपकी तरफ से धीरज देकर आया हूँ।
वहाँकी बहुतेरी सामग्रियाँ वे मेरे साथ भेजने वाले थे; परन्तु
फिर इस विचार से ठिठक गये कि नाई आने पर उसीके हाथसे
भेजा जायगा। मैं उनको एक चतुर नाई तुरत भेजनेका आश्वासन
दे आया हूँ। अब भेजना न भेजना आप की इच्छा पर निर्भर

२११ अकबर बीरबल विनोद

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२११ अकबर बीरबल विनोद
है। मैं उनका सन्देश आपसे कह कर अपने पाप दोष से बरी
होगया हूँ। तब बादशाह बोले-“बीरबल ! मैने तेरी बातें और
अपने पित्रों का सन्देशा तो सुन लिया, परन्तु आखिर इसका
उपाय क्या है, भला यहाँ पर ऐसा कौन नाई है जिसे भेजूं?”
बीरबल बोला-“हाँ इस विषय पर मैंने पहले विचार किया
था और अब भी आँखें फैलाकर देखता हूँ तो मुझे अपने काने
नाऊ के सामने दूसरा कोई भी नहीं जँचता। वह घास के
धुएँ के साथ स्वर्ग में बड़ी आसानी से पहुँच जायगा।”
बादशाह को बीरबल की युक्ति जँच गई और वे काने नाऊ
को बुलवाकर सब समाचार कह सुनाये। काने नाई को बीर-
बल का सजीव लौटना सुनकर बड़ा दुख हुआ। उसे स्वर्ग
जाने के लिये उसे बाध्य होना पड़ा। बिचारे को अपनी मृत्यु
प्रत्यक्ष नाचती हुई दिखलाई पड़ी। जान बचाने का कोई
दूसरा मार्ग न देखकर उसने बादशाह से एक मास की
मुहलत ली। इस मुहलत से उसका प्रयोजन छिपकर भाग
जाना था। बादशाह इतनी लम्बी छुट्टी स्वीकार नहीं
किये और बोले-“स्वर्ग में क्षौर कराने के लिये हमारे पितर
बड़े आकुल हो रहे हैं; इसलिये तू अपने घर का पूरा पूरा
प्रबन्ध करके एक हफ्ते के भीतर जानेके लिये तय्यार होकर
लौट आओ यदि तुझे स्वर्ग से पलटने में देर होगी तो मैं
तेरे कुटुम्ब के खाने पहनने का प्रबन्ध सरकारी कोष से
करवा दूँगा। नाई ने अपने मनमें विचार किया-“अच्छा
आठही दिन कहाँ का थोड़ा है, इतने दिनों में तो मैं कहाँ
का कहाँ पहुँच जाऊँगा। बीरबल की युक्ति मुझे फाँस

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न सकेगी। वह बादशाह को सलाम कर अपने घर का रास्ता
लिया।" बीरबल भी परछाईं की तरह इसके पीछे पड़ गया
था; वह इसकी सारी हरकतों को ध्यानपूर्वक देखता जा रहा
था। उसने समझ लिया था कि यह खोटा नाई बात छोड़ने
की युक्ति निकाल रहा है। अतएव इसपर बिना सच्ची चौकसी
किये काम न चलेगा।
बीरबल तो इसकी ताक में लगा ही था; ज्योंही काना नाई
दरबार से बाहर निकला, वह अपने एक स्वामिभक्त नौकर
को उसके पीछे लगा दिया। काना नाई रास्ते में अनेक प्रकार की
युक्ति सोचता विचारता हुआ अपने घर पहुँचा। अपने कुटुम्बके
स्त्री पुरुषों से दरबार की सारी बातें समझा कर बोला- "यदि
हमलोग गुप्त रीतिसे आज रात में ही नगर को छोड़कर इस
राज्य से बाहर निकल चलें तो बीरबल के कुचक्र से जीवन
रक्षा हो सकती है।" इसी बीच उसका छोटा लड़का दौड़ता
हुआ घर के भीतर आया और अपने पिता (काने नाई) से
बोला-"पिता जी आप यहाँ क्या कर रहे हैं, द्वार पर एक
सिपाही आकर बैठा है।" नाई का चेहरा फक् हो गया, उसने
कहा- "अब निश्चय मरना पड़ा। यह काम उसी बीरबल का जान
पड़ता है। इसको भयभीत देख उसकी स्त्री बोली- "स्वामी !
आप इतना डर क्यों रहे हैं; अभी चन्द रोज पहले बीरबल
भी तो गया था। जैसे वह काम कर के सजीव लौटा उसी
प्रकार आप भी लौट आइयेगा।" काने नाई ने कहा-"तू क्या
जाने बीरबल कैसे लौट आया है, उसपर तो देवी की छाया है
जिससे बच गया; मैं कदापि नहीं बच सकता। किसी