Skip to content
SarvaKosh
अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

Page 208 of 292

Read in context
Page 208

अकबरबीरबल विनोद १६४
रात्रि के समय मेरे जनाने महल में प्रवेश किया था ?
तुम्हारा कसूर प्राण दण्ड पाने का है।" गंग लाचार था, उसने
अपने मुख से कुछ भी उत्तर न दिया। बादशाह की आज्ञा
पातेही वधिक उसे कतल करने के लिये म्यान से तलवार
निकाल कर सामने आये ।
गंग अपनी अन्तिम घड़ियाँ गिनने लगा; फिर उसका
ध्यान उन दरबारियों की तरफ गया जिनकी कृपा से वह
इस दशा को प्राप्त हुआ था। वह बारी बारी सबके मुख की
तरफ फिरकर देखा। इशारे से हरचन्द लोगों को अपनी
सहायता के लिये प्रोत्साहित किया; परन्तु प्राण जाने के भय से
सहायता करने की कौन कहे कोई सिर उठाकर उसकी तरफ
देखा तक नहीं। बादशाह गंगकी सारी हरकतों का मनोमन निरी-
क्षण कर रहे थे; आखिरकार उनसे न रहा गया और गंग
से बोले- "गंग ! तू आज यह कौन सा ढोंग निकाला है दरबार
है या तमाशे का घर । गंग से रहा न गया; कल की सभा के
परामर्श दाताओं की काली करतूत उसे सूल की तरह बेध
रही थी। अभी कल्ह तो वे उसे विमानारूढ़ कर सदेह स्वर्ग
पहुँचाने पर तुले हुए थे और आज किसी के मुख में छेद ही नहीं
दिखाई पड़ता। ऐसा प्रतीत होता है कि अगली बातों से इन्हें
कुछ भी परिचय नहीं है। जब मुझे काल के गाल में जाना
ही है तो इन्हें भी विश्वासघात का मजा चखाकर जाना
चाहिये ताकि सबको आगे के लिये मेरा सबक याद रहे।
कवि गंग दरबारियों की तरफ हाथ का इशारा करके
बोला- "पृथ्वीनाथ ! इन्हीं दरबारियों की काली करतूतों के