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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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१६५ अकबर बीरबलविनोद
कारण आज मैं इस दुर्गति को प्राप्त हुआ हूँ, इसमें इन सबों
का सारा अपराध है। फिर उसने सब के सामने प्राइवेट सभा
का होना और उसमें लोगों का उसे उभार कर भेजना
आदि २ बातें एक एक कर कहना शुरू किया ।
गंग कवि की बातों से बादशाह को बड़ा कौतूहल हो रहा
था, इस पर तो वे खिलखिला कर हँस पड़े जब कि गंग
द्वारा उसे मालूम हुआ कि दरबारी लोग कलह की सभामें उसे
बचाने का कस्ट करके अब मुँह से चूँ तक नहीं बोलते ।
बादशाह ज्यों ज्यों गंग कवि से उसकी कहानी सुनते
गये त्यों त्यों उनके क्रोध में कमी आती गई। अन्त में
वे प्रसन्न होकर गंग कवि के प्राणदण्ड की सजा रद्द करदी
और उसके कर्त्तव्यों को उपकार की दृष्टिसे किया जाना समझ
कर उसे अच्छी पारितोषिक प्रदान किये । बादशाह ने कहा-
“देखो कविवर ! मेरी बातें गठिया कर रखलो; जो लोग
मधुर भाषी होते हैं वे कभी भी अपने वादे के सच्चे नहीं निक-
लते । इसलिये किसी की मीठी मीठी बातें सुनकर उसके फेर
में तबतक नहीं आना चाहिये जबतक कि उसका दिली भाव
न समझ में आ जाय ।”
बादशाह को अपने दरबारियों की धूर्तता से कुछ खेद सा
उत्पन्न हो गया था इसलिये उनकी तरफ इशारा करके बोले-
“आप लोगों ने इस विचारे वृद्ध को मरने के लिये तो भले
ही उसका कर काम निकाल लिया, परन्तु उसके छुड़ाने का
किसी ने कुछ भी प्रयास नहीं किया क्या तुम्हें यही करना
यथोचित था।”