अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in contextअकबर बीरबल विनोद २००
यदि आपकी थोड़ी मदद मिले तो मैं इसको घसीट कर अपने
घर ले जाऊँ । मैं एक नामी रईस हूँ, शायद आपने सरदार
खाँ का नाम कहीं न कहीं अवश्य सुना होगा। मेरा मकान भी
यहाँ से करीब ही है।"
बीरबल ने कहा-"सच है; मुसलमान के नाते मैं आपकी
मदद करने को उद्यत हूँ, परन्तु इस परिश्रम के लिये मुझे क्या
पुरस्कार दोगे ?" सरदार खाँ ने कहा-"मैं अधिक कुछ कहना
पसन्द नहीं करता, परन्तु आपको इतना बचन अवश्य देता हूँ
कि यदि आपकी सहायता से मैं इस कार्य में सफल हो जाऊँगा
तो आपको खुश कर दूँगा।" बीरबल ने कहा-"अच्छी बात
है, पहले मैं इस स्त्री को समझाकर रजामन्द करूँगा अगर
नहीं मानेगी तो देखा जायगा। आपको मुनासिब है कि जब
तक मैं इसे समझा बुझाकर राजी न करलूँ दूर खड़े
रहें।" कामी कुत्ते को जैसे आगा पीछा नहीं सूझता और
वह कुतियों के पीछे मारा मारा फिरता और निरादर सहता
है, वही हालत अमीर खाँ की भी थी। वह बीरबल की बात
मानकर अलग जा खड़ा हुआ। तब बीरबल ने उस स्त्री से
पूछा-"ऐ स्त्री ! तू अपना सच्चा सच्चा हाल मुझसे बयान
कर, मेरा नाम बीरबल है। तेरी सच्ची वाक्या सुनकर मैं तेरा
छुटकारा करा दूँगा, मैं इस समय गुप्त रूप से नगर का हाल
जानने के लिये गस्त लगा रहा हूँ।" बीरबल का नाम बच्चे
बच्चेके कानोंमें गूँज रहा था। उसकी न्यायप्रणाली से आला
से अदना सभी को उस पर विश्वास था। कन्या बीरबल
का नाम सुनते ही निर्भीक होगई और बोली-" मैं एक ब्राह्मण