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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

पृष्ठ 217, कुल 505 में से

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पृष्ठ 217

मन्त्र २७ २१७
आत्मानं सततं ज्ञात्वा कालं नय महामते।
प्रारब्धमखिलं भुञ्जन्नोद्वेगं कर्तुमर्हसि ॥ २१ ॥
.हे ज्ञानवान् पुरुष ! तुम सतत प्रयत्न करते हुए आत्मा के स्वरूप को समझने का प्रयास करो। उसी
के सच्चिन्तन में अपने समय को लगाओ। प्रारब्ध कर्मानुसार जो भी कष्ट-कठिनाइयाँ सामने आयें, उनको
भोगते हुए तुम्हें उद्विग्न (खिन्न-दुःखी) नहीं होना चाहिए ॥ २१ ॥
उत्पन्ने तत्त्वविज्ञाने प्रारब्धं नैव मुञ्चति ।
तत्त्वज्ञानोदयादूर्ध्वं प्रारब्धं नैव विद्यते ॥ २२॥
देहादीनामसत्त्वात्तु यथा स्वप्ने विबोधतः ।
कर्म जन्मान्तरीयं यत्प्रारब्धमिति कीर्तितम् ॥ २३ ॥
आत्मज्ञान के प्रादुर्भूत होने पर भी प्रारब्ध (संस्कार) स्वयं त्याग नहीं करता, किन्तु जैसे ही
तत्त्वज्ञान का प्राकट्य होता है, वैसे ही प्रारब्ध कर्म का क्षय हो जाता है। जैसा कि स्वप्नलोक के देहादिक
असत् होने के कारण जाग्रत् होने पर विलुप्त हो जाते हैं, विगत जन्मों में जो किये हुए कर्म हैं, उन्हीं कर्मों
को प्रारब्ध कर्म की संज्ञा प्रदान की गई है ॥ २२-२३ ॥
यत्तु जन्मान्तराभावात्पुंसो नैवास्ति कर्हिचित् ।
स्वप्नदेहो यथाध्यस्तस्तथैवायं हि देहकः ॥ २४॥
ज्ञानी के लिए तो जन्म-जन्मान्तर भी नहीं है। इसलिए प्रारब्ध कर्म ज्ञानी के लिए कभी भी बाधक
नहीं होता। जैसे स्वप्नकालीन देह, देह नहीं होती, केवल अध्यास मात्र (रस्सी में साँप की तरह) ही होती
है, वैसे ही यह जाग्रत् अवस्था का शरीर भी अध्यास मात्र ही है ॥ २४॥
अध्यस्तस्य कुतो जन्म जन्माभावे कुतः स्थितिः ।
उपादानं प्रपञ्चस्य मृद्भाण्डस्येव पश्यति ॥ २५॥
अध्यस्त (अयथार्थ) की उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? और उत्पत्ति के अभाव में उस वस्तु की
स्थिति कैसे होगी ? (जिस प्रकार रज्जु-रस्सी में सर्प का अध्यास होने पर रज्जु में सर्प नहीं उत्पन्न होता और
न ही उस स्थान में सर्प की स्थिति ही होती है।) इसलिए इस प्रपञ्च का मुख्य उपादान कारण आत्मा ही
है। जैसे कि मिट्टी के द्वारा निर्मित पात्रों का उपादान कारण मिट्टी होती है ॥ २५॥
अज्ञानं चेति वेदान्तैस्तस्मिन्नष्टे क्व विश्वता ।
यथा रज्जुं परित्यज्य सर्पं गृह्णाति वै भ्रमात् ॥ २६ ॥
तद्वत्सत्यमविज्ञाय जगत्पश्यति मूढधीः ।
रज्जुखण्डे परिज्ञाते सर्परूपं न तिष्ठति ॥ २७॥
वेदान्तानुसार ये सभी सांसारिक प्रपञ्च अज्ञानान्धकार के कारण आत्मा में ही प्रतिभासित होते हैं।
अज्ञानरूपी अन्धकार के विनष्ट होने पर संसार की स्थिति नहीं रह जाती। जिस तरह भ्रम बुद्धि से ग्रस्त मनुष्य
रज्जु बुद्धि का परित्याग कर उसे सर्प बुद्धि से ग्रहण करता है, अर्थात् रस्सी को सर्प समझने लगता है, इसी
तरह अज्ञानी (मूढ़) मनुष्य सत्य (आत्मा) का ज्ञान (बोध) न होने के कारण इस भ्रम-बुद्धिवश सांसारिक
प्रपञ्च का अवलोकन करता है। जब मनुष्य ठीक तरह से उस रस्सी को पहचान लेता है, तो पूर्व में
दृष्टिगोचर होने वाले सर्प की भावना नहीं रह जाती ॥ २६-२७॥