१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 221, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ेंमन्त्र ५६ २२१
सर्वे तत्र लयं यान्ति ब्रह्मप्रणवनादके ।
सर्वावस्थाविनिर्मुक्तः सर्वचिन्ताविवर्जितः ॥ ५१ ॥
मृतवत्तिष्ठते योगी स मुक्तो नात्र संशयः ।
शङ्खदुन्दुभिनादं च न शृणोति कदाचन ॥ ५२ ॥
सशब्द अर्थात् शब्दयुक्त नाद (ध्वनि) के अक्षर स्वरूप ब्रह्म में क्षीण (लय) हो जाने पर वह
निःशब्द परमपद कहलाता है। जब सतत नाद का अनुसन्धान करने पर समस्त विषय-वासनाएँ पूर्णरूपेण
नष्ट हो जाती हैं, तदुपरान्त मन एवं प्राण दोनों संशयरहित हो उस निराकार परमब्रह्म में लय हो जाते हैं।
करोड़ों-करोड़ नाद एवं बिन्दु उस ब्रह्मरूप प्रणव नाद में विलीन हो जाते हैं। वह योगी जाग्रत्, स्वप्न तथा
सुषुप्ति आदि सभी अवस्थाओं से मुक्त होकर सभी तरह की चिन्ताओं से रहित हो जाता है। ऐसी स्थिति
में वह योगी मरे हुए व्यक्ति की भाँति (मृतवत्) रहता है। निश्चय ही वह योगी मुक्तावस्था प्राप्त कर लेता
है और वह (योगी) शङ्ख-दुन्दुभि आदि (लौकिक) नाद का श्रवण कभी भी नहीं करता ॥ ४९-५२ ॥
काष्ठवज्जायते देह उन्मन्यावस्थया ध्रुवम् ।
न जानाति स शीतोष्णं न दुःखं न सुखं तथा ॥ ५३ ॥
जिस अवस्था में मन 'अमन' हो जाता है, उस अवस्था के प्राप्त होने पर शरीर लकड़ी की भाँति
चेष्टारहित सा हो जाता है। वह (मन) न शीत जानता है, न गर्मी जानता है और न ही वह सुख-दुःख का
अनुभव करता है ॥ ५३ ॥
न मानं नावमानं च संत्यक्त्वा तु समाधिना ।
अवस्थात्रयमन्वेति न चित्तं योगिनः सदा ॥ ५४ ॥
वह (योगी) मान-अपमान से परे हो जाता है। समाधि द्वारा वह इन सभी का पूर्णतया परित्याग कर
देता है। योगी का चित्त तीनों अवस्थाओं-जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि का कभी भी अनुगमन नहीं करता
है (अर्थात् उससे परे हो जाता है) ॥ ५४ ॥
जाग्रन्निद्राविनिर्मुक्तः स्वरूपावस्थतामियात् ॥ ५५ ॥
दृष्टिः स्थिरा यस्य विनासदृश्यं वायुः स्थिरो यस्य विना प्रयत्नम् ।
चित्तं स्थिरं यस्य विनावलम्बं स ब्रह्मतारान्तरनादरूप इत्युपनिषत् ॥ ५६ ॥
(वह) योगी जाग्रत् और निद्रा (स्वप्न) की अवस्था से मुक्त होकर अपने वास्तविक स्वरूप में स्थिर
हो जाता है। दृश्य वस्तु के अभाव में भी जिसकी दृष्टि स्थिर हो जाती है, बिना प्रयास के ही जिसका प्राण
अपने स्थान पर सुस्थिर हो जाता है तथा बिना किसी आश्रय अथवा अवलम्बन के ही जिसका चित्त स्थिरता
को प्राप्त हो जाता है, ऐसा वह (योगी) ब्रह्ममय प्रणव नाद के अन्तर्वर्ती तुरीयावस्था (परमानंद) में सदैव
स्थित हो जाता है। यही उपनिषद् (रहस्यात्मक ज्ञान) है ॥ ५५-५६ ॥
ॐ वाङ्मे मनसि.........इति शान्तिः ॥
॥ इति नादबिन्दूपनिषत्समाप्ता ॥