१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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Read in contextभृगुवल्ली अनुवाक १० मन्त्र ६ २१३
आदर करता है। वह परमात्मा वाणी में रक्षक शक्ति के रूप में है, प्राण और अपान में प्रदाता और रक्षक
दोनों सामर्थ्य वाला है। वह हाथों में कर्म करने की शक्ति, पैरों में गति सामर्थ्य, गुदा में विसर्जन शक्ति के
रूप में स्थित है। यह उस ब्रह्म की मानुषी सत्ता का वर्णन है, अब उसकी दैवी सत्ता का वर्णन करते हैं।
वह वृष्टि में तृप्ति है, बिजली में शक्ति है। पशुओं में यश, ग्रहों-नक्षत्रों में ज्योति, उपस्थ में प्रजनन-सामर्थ्य,
वीर्य और आनन्द रूप में सन्निहित है। वह आकाश में व्यापक विश्व (प्रत्यक्ष जगत्) रूप में स्थित है। वह
परमात्मा सबका आधाररूप है, ऐसा मानकर-उपासना करने वाला सबको आधार देने वाला बन जाता है।
वह सबसे महान् है, ऐसा मानकर उपासना करने वाला महान् बन जाता है। वह मन है, ऐसा मानकर
उपासना करने वाला मननशील होता है। वह नमन योग्य है, ऐसा मानने वाले उपासक के लिए सम्पूर्ण
कामनाएँ नत होती हैं। वह ब्रह्म है, ऐसा मानकर उपासना करने वाला ब्रह्ममय हो जाता है। वह परिमर
(जिसमें विद्युत्, वृष्टि, चन्द्रमा, आदित्य और अग्नि -ये पाँच देवता मृत्यु (अस्त) को प्राप्त होते हैं।) -
आकाश-मृत्युनियामक देव है, ऐसा मानकर उपासना करने वाले के विद्वेषी शत्रु समाप्त हो जाते हैं, उसका
अप्रिय चाहने वाले बन्धु भी नष्ट हो जाते हैं, जो इस मनुष्य में है, वह सूर्य में भी है, जो साधक इस प्रकार
दोनो में एकत्व को जानता है, वह इस लोक से प्रयाण कर अन्नमय आत्मा को प्राप्त होता है। पुनः प्राणमय
आत्मा को प्राप्त होता है। पुनः मनोमय आत्मा, फिर विज्ञानमय आत्मा को प्राप्त होता है। पुनः वह
आनन्दमय आत्मा को प्राप्त होता है। आनन्दमय आत्मा को प्राप्त होकर वह इच्छित भोग और रूप को प्राप्त
करता है। फिर साम गायन करता हुआ सब लोकों में विचरण करता है॥ १-५ ॥
अहमन्नमह-मन्नमहमन्नम्। अहमन्नादो ३ ऽहमन्नादो ३ ऽहमन्नादः।
अह१श्लोककृदह१श्लोककृद-ह१श्लोककृत्। अहमस्मि प्रथमजा ऋता३स्य । पूर्वं
देवेभ्योऽमृतस्य ना ३ भायि। यो मा ददाति स इदेव मा३ वाः । अहमन्नमन्नमदन्तमा ३
द्मि। अहं विश्वं भुवनमभ्यभवा३म् । सुवर्णज्योतीः । य एवं वे। इत्युपनिषत् ॥ ६ ॥
आश्चर्य ! आश्चर्य !! आश्चर्य !!! मैं (आत्मतत्त्व) ही अन्न हूँ। आश्चर्य है कि मैं (आत्मा ) ही
अन्न का उपभोग करने वाला हूँ । आश्चर्य है कि मैं (आत्मा) ही इनका संयोजक हूँ। मैं ही श्लोककृत्
(मन्त्रद्रष्टा) हूँ, मैं ही श्लोककृत् हूँ। मैं इस प्रत्यक्ष सत्यरूप जगत् के प्रथम उत्पत्तिकर्त्ता हिरण्यगर्भ
आदि अमर देवों के भी पूर्व स्थित अमरत्व का केन्द्र हूँ। जो मुझे देता है, वह देकर मेरी रक्षा करता
है। मैं अन्नरूप होकर अन्न-भक्षक का भी भक्षण कर लेता हूँ। मैं सम्पूर्ण भुवनों को नगण्यरूप
अनुभव करता हूँ। मेरा तेज सूर्य के समान है। इस प्रकार का बोध करने वाला विद्वान् वैसी ही
सामर्थ्य वाला होता है। (इस प्रकार) यह उपनिषद् पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु । ........ इति शान्तिः ॥
ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः ॥ ............ इति शान्तिः ॥
॥ इति तैत्तिरीयोपनिषत्समाप्ता ॥