विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
भूमिका २३
३६ पाटलिपुत्र नगर कल्प--इस नगर को कूणिक के पुत्र
उदायी ने वसाया था जिसका कल्प मे विस्तृत वर्णन है । उदायी
के वाद नवनन्द और कल्पक का वग़ज शकडाल मत्री हुआ । यहाँ
स्थूलिभद्र आदि अनेक महापुरुष हुए जिनका कल्प मे वर्णन है ।
और माथ ही साथ यहाँ की समृद्धि के आश्चर्यकारी उदाहरण हुए
हैं । यहाँ अनेक प्रकार के चावल होते थे जिनमे गर्दभिका गाखि-
रत्न को वार-वार काटने पर भी पुन -पुन ऊग जाता । जिनप्रभ-
सूरि जी के समय मे यह गौड देगान्तर्गत था क्योकि लक्षणावती
के सुलतान ने उसे गौड देग मे मिला दिया था ।
३७ प्रतिष्ठानपुग के कल्पो मे पौराणिक वार्त्ता है जिसमें
सातवाहन को विक्रमादित्य के समकालीन वतलाया है और
नागराज के सानिध्य से विक्रम की सेना को हराने का वर्णन है ।
यह राजा जैन हो गया । उसने जिन चैत्य वनवाये और पचास वीरो
ने भी अपने नामाङ्कित जिनालय निर्माण कराये । सातवाहन के
मरने पर गक्तिकुमार का राज्याभिषेक हुआ । वीर क्षेत्र प्रतिष्ठान
मे तब से आजतक कोई राजा प्रवेश नही करता ।
३८ अष्टापद तीर्थ कल्प--अयोध्या से बारह योजन की दूरी
पर अष्टापद लिखा है । कैलाग और धवलगिरि इसी के नाम हैं,
निकट ही मान सरोवर है । आकाग साफ होने पर अयोध्या के
निकटवर्ती उड्डयकूट पर जाने से उसकी धवल शिखर-परम्परा
दिखायी देती है । जिनप्रभसूरि लिखते हैं कि यद्यपि यह तीर्थ
अगम्य है पर प्रतिविम्बित दर्गन पाकर भव्यजन यात्राफल प्राप्त
करता है । इसमे भरत चक्रवर्त्ती ने २४ तीर्थंकर और अपने ९९
भाइयो के स्तूप-मूर्त्तियाँ व स्वय की मूर्ति भी स्थापित की थी ।
यहाँ के विशालकाय जिनालय का भी भव्य वर्णन किया गया है ।
सगर चक्रवर्त्ती द्वारा परिखा निर्माण, गगानदो की गगासागर तक
गति, वज्रस्वामी के जीव तिर्यंक जृ भक देव को गौतमस्वामी
२४ विविध तीर्थ-कल्प
द्वारा प्रतिबोध, भगवान् महावीर द्वारा प्रतिबोध, भगवान् महावीर
द्वारा गिरिराज पर चढने वाले को तद्भवमोक्षगामी बतलाने पर
गौतम स्वामी के चढने व १५०३ तापसो को प्रतिवोध देने का
विशद वर्णन है।
जिन सक्षिप्त कल्पो की वातो का उन्होने विस्तार किया है
उनमे से धर्मघोष सूरि कृत कल्प को श्रीजिनप्रभसूरि ने इस विविध
तीर्थकल्प मे सम्मिलित कर दिया है।
३९ कोटिशिला—यह तीर्थ एक योजन चौड़ा और एक योजन
ऊँचा मगध देश मे देवताओ द्वारा पूजित बतलाया है जो अब
अज्ञात है। यहाँ ६ तीर्थंकरो के शासन मे करोडो मुनि सिद्ध हुए
हैं और वासुदेव लोग इसे ऊँचा उठा कर शक्ति सन्तुलन बताते
हैं। बलभद्र जैन ने इस तीर्थ की अवस्थिति के विषय मे भारत के
दिगम्बर जैन तीर्थ भाग-२ के पृ० २२३ मे उहापोह की है।
४० नन्दीश्वर द्वीपकल्प—नन्दीश्वर द्वीप मनुष्य लोक से
बाहर आठवा द्वीप है जहाँ शाश्वत बावन पहाडो पर बावन
जिनालय हैं। इनका कल्प मे विशद वर्णन है। देवेन्द्रादि विशिष्ट
अवसर पर अट्ठाई महोत्सव करते हैं एव लब्धिधारी या देव के
साहाय्य से ही इसके दर्शन कर सकते हैं।
४१ वस्तुपाल तेजपालमंत्रि कल्प—प्राग्वाट आसराज कुमार
देवी के नन्दन इन विश्वविश्रुत भ्राता युगल के सुकृत्यो का वर्णन
आचार्य प्रवर ने बडे ही हार्दिक प्रेम से किया है और मन्त्रिद्वय को
तीर्थ स्वरुप बतलाया है क्योकि जिनके हृदय मे जिनेश्वर विराज-
मान हो वही तीर्थ है।
४२ कपर्द्धि यक्ष कल्प—पालीताना मे सरपंच कपर्द्धि निवास
करता था जो सप्त व्यसन रत था। गुरु महाराज ने उसके द्वारा
प्रदत्त स्थान मे चातुर्मास किया और अन्त मे नवद्वार मंत्र स्मरण
व शत्रुंजय को नमस्कार करने का नियम दिलाया । वह अनशन
पूर्वक मर के शत्रुंजयगिरि का अधिष्ठायक कर्पर्दिद यक्ष हुआ ।
४३ व्याघ्री कल्प—शत्रुंजय पर वाघणपोल प्रसिद्ध है । तीर्था-
धिराज के द्वार पर एक व्याघ्री आकर अनशन कर के बैठ गई
और ७-८ दिन की आराधना से स्वर्ग गई । उसका देह सस्कार
अगर चंदन से करके प्रतोली के दक्षिण की ओर उसकी मूर्ति
स्थापित की गई ।
४४ अम्बिकादेवी कल्प—गिरनार पर अम्बिका शिखर दूसरी
टोक प्रसिद्ध है । अम्बिका कोडीनार के ब्राह्मण सोम की भार्या थी
जो जैन धर्म परायणा थी । श्राद्ध के दिन ब्रह्म भोज से पूर्व मुनि-
राज को आहार देने से क्रुद्ध सास और पति द्वारा अपमानित
होकर अपने सिद्ध-बुद्ध पुत्रों के साथ निकल कर जाते हुए पीछे से
पति को आते देख मार्गवर्त्ती कुएँ मे गिर गई और नेमिप्रभु के
ध्यान से मर कर गिरनार की अधिष्ठातृ अम्बिका देवी हुई । सोम-
भट्ट भी महासती के पीछे कूद पडा जो देव हुआ और सिंहरूप
धारण कर देवी का वाहन हो गया । अम्बिका को कोहडी भी
कहते हैं ।
अवशिष्ट कल्पो मे कुछ सैद्धान्तिक विषयो सम्बन्धी हैं । किसी
कारण से उनका इस ग्रन्थ मे संग्रह कर लिया गया है पर वे तीर्थों
सम्बन्धी नही होने से उनको अलग रखा जाना ही अधिक समी-
चीन होता । समय-समय पर कल्प रचे जाते रहे अतः इनमे कुछ
तारतम्य है । अनुक्रम ठीक से नही रह सका, प्रान्तीय वर्गीकरण
भी नही हो सकता । स० १३९० मे जव इन सबको दिल्ली मे
सगृहीत कर ग्रंथ का रूप दिया गया तब आजकल की भाँति कोई
क्रम ठीक वैठाया नही जा सका और मुनि जिनविजय जी ने भी
२६ विविध तीर्थ-कल्प
वैसा कोई क्रम नही बैठाया जो सम्पादकीय के नाते उन्हे करना
चाहिए था। हमने भी इसी क्रम से अनुवाद किया है। सं १९९०
मे मुनि जिन-विजयजी ने जब इस ग्रथ रत्न का अनेक हस्त-
लिखित प्रतियो के आधार से सिंघी जैन ग्रन्थमाला के ग्रथाक १०
के रूप मे प्रकाशित कराया तो अपने निवेदन के अन्त मे वर्त्तमान
राष्ट्रभाषा मे द्वितीय अवतार होगा जो ऐतिहासिक अन्वेषण वाले
विवेचनादि से अलकृत व स्थान विशेष के चित्रादि से विभूषित
होगा पर मुनि जी का वह मनोरथ पूर्ण नही हो सका। अन्त मे
तथाविध योग्यता न होने पर भी हमने ऐसे ग्रन्थ का हिन्दी मे
अनुवाद प्रकाशित होना चाहिए इस प्रबल भावना से यह अन-
धिकार सा कार्य किया है इसमें जो त्रुटियाँ रही हो उसके लिए
क्षमा प्रार्थी हूँ। विशेषज्ञ हमे संशोधनादि सूचित करेंगे। ऐसी
आशा है।
प्रस्तुत ग्रन्थ की प्रस्तावना डा० ज्योति प्रसाद जी जैन जैसे
जैनइतिहास के विशिष्ट विद्वान् ने हमारे अनुरोध पर लिख भेजने
की कृपा की है उसके लिए अत्यन्त आभारी हैं।
प्रस्तुत ग्रन्थ के
भूमिका २७
इच्छा रही पर सब तीर्थों के फोटो प्राप्त करना सम्भव नही हुआ
अत जिन जिन तीर्थों के जितने ब्लाक जैन भवन, कलकत्ता श्रीजैन
सेवा समिति व श्री महेन्द्र कुमार सिंघी से प्राप्त हुए उन्हे साभार
प्रकाशित किए है।
इस ग्रथ का मुद्रण श्री महावीर प्रेस, वाराणसी मे हुआ है
वहाँ से प्रत्येक फर्में का प्रूफ मगाने मे पर्याप्त विलम्ब होता इसलिए
वही.प्रूफ सशोधन कर छापे गये अत बहुत सी अशुद्धिया रह गईं
जिसका हमे खेद है।
अन्त मे जिन जिनसे भी हमे सहयोग मिला है उन सबके प्रति
आभार प्रकट करते हुए जैन तीर्थों सम्बन्धी अवशिष्ट सामग्री भी
हम शीघ्र प्रकाशन करने मे समर्थ हो यही शुभेच्छा है।
इस ग्रन्थ का अनुवाद कलकत्ता मे परमपूज्या विदुषी आर्यारत्न
श्री सज्जनश्री जी महाराज के सानिध्य मे हुआ। पूज्य प्रेरणा
सम्राट् काकाश्री अगरचंद जी नाहटा का आदेश मिला कि इस
महान् ग्रन्थ का हिन्दी अनुवाद करो। तो पर्यूषण मे प्रारम्भ करके
प्रतिदिन अनुवाद को पूज्या साध्वी जी महाराज के पास बैठ कर
मिला लेता व जहाँ भी गाडी अटकती महाराज साहब उसको चला
देते इस प्रकार दीवाली के पूर्व इसका अनुवाद पूर्ण हो गया और
प्रेस कापी बनाकर काकाजी अगरचन्दजी को भेज दी। उन्होने महो-
पाध्याय विनयसागर जी आदि को भी दिखलाया तथा श्रीयुत्
देवेन्द्रराजजी मेहता ने भी प्राकृत भारती से प्रकाशन मे वडी
उत्सुकता दिखाई पर अन्त मे काकाजी अगरचद जी की प्रेरणा से
नाकोडा तीर्थ कमेटी को ही इसके प्रकाशन का श्रेय मिला। प्राकृत
तित्थकप्प जो अपूर्ण और अव्यवस्थित रूप मे मिला उसके
३० विविध तीर्थ-कल्प
१० मिथिला तीर्थ-कल्प ७१
२० रतनवाहपुर कल्प ७३
२ पावापुरी-दीपावली वृहत्कल्प ७६
२२ कन्यायननीय महावीर प्रतिमा कल्प १०१
२३ प्रतिष्ठान पत्तन कल्प १०६
२४ नन्दोग्वर द्वीप कल्प १०८
२५ काम्पिल्यपुर तीर्थ कल्प १११
२६ अणहिलपुर स्थित अरिष्टनेमि-कल्प ११३
२७ गखपुर पार्श्वनाथ-कल्प ११६
२८ नागिकपुर कल्प ११७
२९ हरिखली नगर स्थित पार्श्वनाथ कल्प १२०
३० कर्पर्दिद यक्ष-कल्प १२३
३१ शुद्धदन्ती स्थित पार्श्वनाथ-कल्प १२६
३२ अवन्ती देशस्थ अभिनन्दन देव-कल्प १२७
३३ प्रतिष्ठानपुर कल्प १३०
३४ प्रतिष्ठानपुराधिप त सातवाहन नृप चरित्र १३५
३५ चम्पापुरी-कल्प १४६
३६ पाटलिपुत्र नगर कल्प १५०
३७ श्रावस्ती नगरी कल्प १५८
३८ वाराणसी नगरी-कल्प १६१
३० महावीर गणधर कल्प १६९
४०. कोकावसति पार्श्वनाथ कल्प १७४
४१ श्री कोटिशिला तीर्थ कल्प १७७
४२ वस्तुपाल तेजपाल मंत्रि कल्प १७९
४३ टिपुरी तीर्थ कल्प १८३
४४ टिपुरी स्तव १९०
४५ चौगनो तीर्थ नाम सग्रह कल्प १९३
अनुक्रमणिका ३१
४६ समवसरण रचना कल्प १९६
४७ कुडुंगेश्वर नाभेयदेव कल्प २००
४८ व्याघ्री कल्प २०३
४९ अष्टापदगिरि कल्प २०४
५० हस्तिनापुर तीर्थ स्तवन २११
५१ कन्यानयन महावीर कल्प परिशेष २१३
५२ श्री कुल्पाक ऋषभदेव स्तुति २२०
५३ आमर कुण्ड पद्मावती देवी कल्प २२१
५४ चतुर्विंशति जिन कल्याण कल्प २२५
५५ तीर्थंकर अतिशय विचार २२६
५६ पञ्च कल्याणक सावन २२७
५७ कुल्पाक माणिक्यदेव तीर्थ कल्प २३१
५८ श्रीपुर-अन्तरिक्ष पार्श्वनाथ-कल्प २३४
५९ स्तभन-पार्श्वनाथकल्प शिलोञ्छ २३६
६० श्रीफलवृद्धि पार्श्वनाथ कल्प २४०
६१ अम्बिका देवी-कल्प २४३
६२ पच परमेष्ठी नमस्कार कल्प २४७
६३ ग्रन्थ समाप्ति का कथन २४८
परिशिष्ट १
जीरापल्ली तीर्थ २४९
फलवृद्धि तीर्थ २५१
आरासण तीर्थ २५३
कलिकुण्ड तीर्थोत्पत्ति २५५
श्री अन्तरिक्ष तीर्थ-श्रीपाल राजा २५७
माणिक्य देव कुल्पाक २५९
श्री स्तभन तीर्थ २६१
२८ विविध तीर्थ-कल्प
मूल और अनुवाद सगोधन मे मुनि श्री नेमिचन्द्रजी ने मौन,
उपवास रहते हुए भी समेत शिखर जी मे उल्लेखनीय सहयोग
दिया। इसके लिए उनका भी आभार व्यक्त करना आवश्यक
समझते हैं।
विनीत
भँवरलाल नाहटा
अनुक्रमणिका
मुनि जिनविजय जी का वक्तव्य ३
प्रस्तावना डा० ज्योतिप्रसाद जैन ७ से ३५
भूमिका १ से ३२
१ शत्रुञ्जय तीर्थ कल्प १
२ रैवतगिरि कल्प संक्षेप ११
३ श्री उज्ज्यन्त स्तव १३
४ उज्ज्यन्त महातीर्थ कल्प १६
५ रैवत गिरि कल्प १९
६ श्री स्तभन पार्श्वनाथ कल्प २२
श्री स्तभनक कल्प २९
७ अहिच्छत्रा नगरी कल्प ३०
८ अर्बुदगिरि कल्प ३२
९ मथुरापुरी कल्प ३६
१० अश्वावबोध तीर्थ कल्प ४४
११ वैभार गिरि-कल्प ४९
१२ कौशाम्बी नगरी कल्प ५२
१३ अयोध्या नगरी कल्प ५३
१४. अपापापुरी संक्षिप्त कल्प ५६
१५ कलिकुण्ड कुवकुटेश्वर कल्प ५७
१६ हस्तिनापुर-कल्प ६०
१७ सत्यपुर-सांचौर-तीर्थकल्प ६२
१८ अष्टापद महातीर्थ कल्प ६८
३२ विविध तीर्थ-कल्प
अवन्ती देशस्थ अभिनन्दन देव २६३
परिशिष्ट २
एक तीर्थ यात्रा विवरण २६८
परिशिष्ट ३
तित्थकप्प का सार २९५
विशेष नाम सूची ३२१
शुद्धाशुद्धिपत्र ३५१
विविध तीर्थ-कल्प
१. शत्रुञ्जय तीर्थ-कल्प
श्री पुण्डरीक गिरि शिखर के प्रासाद के अलङ्कारभूत श्री
ऋषभदेव आप सबका कल्याण करे। अतिमुक्त केवली ने नारद
ऋषि के समक्ष जो श्री शत्रुञ्जय तीर्थ का माहात्म्य कहा था, उसे
मै अपनी और दूसरो की स्मृति के लिए लेश मात्र कहूंगा। भव्य
जनो को पाप नष्ट करने की इच्छा से उसे श्रवण करना योग्य है।
शत्रुञ्जय पर पाँच कोटि तपस्वियो के साथ श्री पुण्डरीक
स्वामी चैत्री-पूनम के दिन सिद्ध हुए अत. यह पर्वत भी पुण्डरीक
(गिरि) नाम से स्मरण किया गया।
देवो, मनुष्यो और ऋषियो द्वारा उस तीर्थ के १. सिद्धक्षेत्र,
२ तीर्थराज, ३. मरुदेव, ४. भगीरथ, ५ विमलाचल, ६ बाहूबली,
७ सहस्रकमल, ८. तालध्वज, ९. कदम्ब, १० शतपत्र ११. नगाधि-
राज, १२ अष्टोत्तर शतकूट, १३. सहस्रपत्र, १४ ढंक, १५ लौहित्य,
१६. कपर्द्दिनिवास, १७ सिद्धिशेखर, १८ शत्रुञ्जय, १९ मुक्तिनिलय,
२० सिद्धि पर्वत, और २१. पुण्डरीक ये इक्कीस नाम किये हुए
गाये जाते हैं।
ढंक आदि पाँच कूट देवो सहित हैं और जिनके विवरो में
रसकूपिका, रत्नखान और ओषधियाँ विराजित है। काल के प्रभाव
से मिथ्यादृष्टि लोगो द्वारा, १ढक, २कदम्ब, ३लौहित्य, ४तालध्वज
और ५कपर्दि ये पाँचो स्वीकृत किए हुए हैं। अर्थात् उनके अधिकार
मे हैं।
२ विविध तीर्थ-कल्प
इसका विस्तार अवसर्पिणी काल मे आप्तो ने पहले आरे मे
अस्सी योजन, दूसरे मे सत्तर, तीसरे मे साठ, चौथे आरे मे
पचास, पाँचवे आरे मे बारह योजन और छठे आरे मे सात
हाथ का कहा है ।
युगादीश-ऋषभदेव के समय यह पर्वत पचास योजन मूल,
दश योजन विस्तार और आठ योजन ऊँचा था । कीर्ति से भुवन
को पवित्र बनाने वाले ऋषभसेनादि असंख्य नाथ तीर्थंकर यहाँ
पर समौसरे हैं और अतीत काल मे महर्षि लोग सिद्ध हुए हैं । श्री
पद्मनाभादि भावी जिनेश्वरो का यहाँ समवसरण होगा ।
श्री नेमिनाथ भगवान को छोडकर ऋषभदेव से लेकर
महावीर स्वामी पर्यन्त तेईस तीर्थङ्कर यहाँ समौसरे हैं ।
इस अवसर्पिणी में पवित्र बुद्धिवाले श्री भरत चक्रवर्ती ने
आदीश्वर भगवान के केवलज्ञान उत्पन्न होने पर इस पर्वत पर
योजन प्रमाण ऊँचा चैत्य कराया था जो आदीश्वर भगवान की
एक रत्न की प्रतिमा और बाईस छोटी देवकुलिकाओ मे सोने
चाँदी की बाईस तीर्थंकरो की प्रतिमाओ से युक्त था ।
बाईस तीर्थङ्करो की तदाकार पादुका और लेप्य निर्मित बिम्ब-
युक्त आयतनश्रेणी यहाँ सुशोभित है । यहाँ राजा श्री बाहूवली ने
समवसरण सहित मरुदेवी का ऊँचा प्रासाद कराया था ।
इस अवसर्पिणी मे प्रथम तीर्थङ्कर के प्रथम गणधर, प्रथम भरत
चक्रवर्ती के प्रथम पुत्र पुण्डरीक स्वामी यहाँपर सर्वप्रथम सिद्ध हुए ।
यहाँ नमि-विनमि नामक विद्याधरेन्द्र महर्षि दो कोटि मुनियो
के साथ सिद्ध को प्राप्त हुए । द्राविड़ और वालिखिल्लादि राजाओ
ने दश कोटि साधुओ के साथ यहाँ परम पद को प्राप्त किया ।
जय, राम आदि तीन कोटि राजर्षि यहाँ पधारे, नारदादि
एक लाख नव्वे मुनि शिव पद को पाये । यहाँ प्रद्युम्न, शाम्ब आदि
कुमार साढे आठ कोटि साधुओ के साथ मोक्ष गए ।
पचास लाख कोटि सागरोपम तक श्री ऋषभदेव के वशज
आदित्ययश (सूर्ययश) से लेकर सगरपर्यन्त राजागण परम्परा से
यहाँ चौदह लाख मोक्ष गए तथा असंख्यात सर्वार्थसिद्ध मे गए।
भरत के वशज शैलक और शुकादि यहाँ असंख्यात कोटा-
कोटि परिमाण मे सिद्ध हुए। यहाँ अर्हत् प्रतिमोद्धार कराने वाले
पाँच पाण्डव, कुन्तीसहित बीस कोटि मुनियो के साथ मोक्ष गए।
दूसरे तीर्थंकर अजितनाथ व सोलहवे तीर्थंकर शान्तिनाथ ने
यहाँ वर्षाकाल-चातुर्मास विताया। श्री नेमिनाथ के वचनो से
यात्रा के लिए आये हुए नन्दिषेण आचार्य ने यहाँ सर्वरोगहर
'अजित शान्ति स्तव' की रचना की।
इस महातीर्थ के छोटे-मोटे असख्य उद्धार हुए तथा यहाँ पर
असख्य प्रतिमाएँ और असख्य चैत्यो का निर्माण हुआ।
छोटे तालाब-कुण्ड तथा भरत कारित गुफाओ मे भक्तिपूर्वक
पूजन-वदन करने वाले एकावतारी होते हैं।
संप्रति विक्रमा
४ विविध तीर्थ-कल्प
मात्र से मनुष्यो के सिंह-अग्नि-समुद्र-साँप-भूपाल-विष-युद्ध-चोर-
वैरी-मारिजन्य भय नष्ट हो जाते हैं।
भरतेश्वर की बनवायी लेप्यमय आदिनाथ प्रतिमा का उत्संग
गय्यास्थ एव आत्मस्थ होकर ध्यान करने से सर्वभयो को जीतने
वाला होता है। उग्रतप व ब्रह्मचर्य से जो पुण्य की प्राप्ति होती है,
वही गत्रुञ्जय मे निवास करने से प्राप्ति होती है।
तीर्थों पर करोडो के व्यय से कामित आहार देने का पुण्यफल
यहाँ विमलाचल पर एक उपवास करने पर प्राप्त हो जाता है।
तीन लोक मे जो कुछ भी तीर्थ है—पुण्डरीक गिरि का अभिवदन-
दर्गन करने मात्र से उन सबके दर्गन हो जाते हैं।
सैकडो दानगालाओ मे भोजन होने पर भी यहाँ कभी अरिष्ट
पक्षी-कौए नही आते। यहाँ यात्रा पर जाते लोगोको भोजन देने पर
करोड गुणा पुण्य होता है और यात्रा करके लौटते हुए को भोजन
देने पर अनन्तगुणा पुण्य होता है।
विमलाचल को देखे विना भी सघ को प्रतिलाभ देने पर कोटि
गुणा पुण्य व देखने पर अनन्त गुणा पुण्य होता है।
इसी तीर्थ को वदन करने पर तीर्थंकरो के केवलज्ञान व
निर्वाण जहाँ हुए हैं, उन सभी तीर्थों की वदना हो जाती है।
जन्म-दीक्षा-ज्ञानोत्पत्ति-मोक्षगमन उत्सव दूसरे तीर्थों मे
पृथक्-पृथक् होते हैं किन्तु यहाँ सभी एक साथ होते है।
अयोध्या, मिथिला, चम्पा, श्रावस्ती, हस्तिनापुर, कौगाम्बी,
कागी, काकन्दी, कम्पिल, भद्दिलपुर, रत्नवाह—गौरीपुर, कुण्ड-
ग्राम, पावापुरी, चन्द्रानना, सिंहपुर, राजगृह, रैवतक, सम्मेत-
गिखर, वैभार, अष्टपदादि तीर्थों की यात्रा के फल से यहाँ की
यात्रा करने से सौ गुना फल होता है।
पूजा के पुण्य से सौ गुणा पुण्य, विम्बनिर्माण से एवं चैत्य
निर्माण से सहस्र गुणा व प्रतिपालन से अनन्त गुणा पुण्य होता है।
शत्रुञ्जय तीर्थ-कल्प ५
जो इस तीर्थ-शिखर पर प्रतिमा या मन्दिर बनवाता है वह
भारतवर्ष की ऋद्धि भोगकर स्वर्गश्री प्राप्त करता है।
नमस्कार-सहित तपश्चर्यादि करता हुआ मनुष्य पुण्डरीक
गिरि की स्मृति से उत्तरोत्तर तप फल प्राप्त करता है।
त्रिकरण शुद्धि पूर्वक इस तीर्थ को स्मरण करने वाला मनुष्य
छःमासी तप का फल प्राप्त करता है।
आज भी पुण्डरीक गिरि पर उत्तम अनशन करके शीलरहित
भी सुखपूर्वक स्वर्ग प्राप्त करता है।
यहाँ छत्र, चामर, कलश, ध्वज, स्थाल का दान करने वाला
विद्याधर एवं रथदान करने वाला चक्रवर्ती हो जाता है।
भावशुद्धिपूर्वक यहाँ दश पुष्पमालाओ को देने वाला भोजन
करता हुआ भी उपवास का फल प्राप्त करता है।
दुगुणा देने से छट्ठ तप, त्रिगुणा से अष्टम, चौगुना देने से
दशम, पाँच गुणा से द्वादश और क्रमशः बढते-बढते देने से फल
की भी उत्तरोत्तर वृद्धि कही गई है।
विमलाचल पर स्नान पूजा मात्र से जो पुण्य होता है, अन्य
तीर्थों मे वह स्वर्ण-भूषण और भूमिदान करने से भी नही होता।
यहाँ धूप-खेने से पक्षोपवास का फल और कर्पूर-पूजा से
मासक्षमण का फल प्राप्त करता है।
यहाँ निर्दोष भोजनादि से साधुओ को प्रतिलाभने से कात्तिक-
मासक्षमण का फल होता है। तीनो काल मंत्र पूर्वक स्नान करके
चैत्र व आश्विन मे "नमोऽर्हद्भ्य" पद का ध्यान करने से तीर्थंकर
पद अर्जन करता है।
पालीताना नगर में पार्श्वनाथ और महावीर स्वामी के दो
जिनालय है और जिनके नीचे नेमिनाथ भगवान का महान्
आयतन है।
मन्त्रीश्वर वाग्भट ने तीन करोड तीन लाख स्वर्ण व्यय कर
६ विविध तीर्थ-कल्प
आदीश्वर भगवान के प्रासाद का उद्धार करवाया । यहाँ तीर्थ मे
प्रवेश करते ही पहले आदीश्वर भगवान की विशद प्रतिमा के
दर्शन करने पर आँखे तृप्त होती है ।
श्री विक्रमादित्य से एक सौ आठ वर्ष बीतने पर जावडशाह
ने प्रचुर द्रव्य व्यय करके प्रतिमा को विराजमान किया । और
उसने मम्माण पर्वत मे उत्पन्न चमकीली कान्ति वाले मम्माण
रत्न पाषाण के ज्योतिरस रत्न द्वारा प्रतिमा घटित—निर्माण
करवाई ।
मधुमती नगर निवासी सेठ जावड ने पहिले श्री वज्रस्वामी से
शत्रुञ्जय का माहात्म्य सुना था । वह गन्धोदक स्नान कराने की
रुचि से लेप्यमय बिम्ब का विचार कर चक्रेश्वरी देवी को स्मरण
करके मम्माण पर्वत की खान मे गया और वहाँ से पाषाण की
प्रतिमा बनवा कर रथ मे आरोपण कर शुभ दिन मे भार्या-सहित
विमल गिरि की ओर चला । दिन मे प्रतिमा सहित रथ जितना
रास्ता चलता था, उतना ही रात्रि मे वापस लौट आता था ।
यह आश्चर्य देखकर जावडसाह का चित्त खिन्न हो गया और
उसने कपर्दि-यक्ष का स्मरण किया । और उसके हेतु और विधि
को ज्ञात कर वह अपनी पत्नी के सहित रथ के मार्ग मे टेढा सो
गया । उसके साहस से प्रसन्न हुए देवता ने रथ को बिम्ब सहित
पहाड़ के शिखर पर चढा दिया । सात्त्विको के लिए कुछ भी
दु साध्य नही है ।
मूलनायक का उत्थापन करके उनके स्थान पर मम्वाणी
पाषाण की प्रतिमा स्थापन करने पर लेप्य बिम्ब के भयंकर शब्द
से पर्वत के टुकडे हुए और उनके द्वारा छोडी हुई बिजली श्रेष्ठी के
बिम्ब ने हाथ मे लेकर मर्दन कर दी । वह सीढियो में छेद करती
हुई पहाड़ के देश को भेद कर निकल गई ।
जावड सेठ चैत्य शिखर पर पत्नी सहित चढकर प्रमोद से
शत्रुञ्जय तीर्थ-कल्प ७
हर्ष रोमाञ्चित हो नाचने लगा । म्लेच्छ देश से १८ जहाज आये,
जिनका द्रव्य व्ययकर सेठ ने यह धर्म-प्रभावना की । इस प्रकार
जावडगाह ऋषभदेव, पुण्डरीक और कपर्दि यक्ष की मूर्त्तियाँ
विराजमान कर स्वर्ग का अतिथि वना । भगवान के दाहिनी ओर
पुण्डरीक स्वामी और वाँये तरफ जावड शाह द्वारा स्थापित दूसरा
विम्ब सुशोभित है ।
इक्ष्वाकु और यादव वंशी लोग यहाँ असंख्य कोटा-कोटि सिद्ध
हुए हैं जो 'कोटि-कोटि तिलक' नाम को सूचित करते हैं।
पाँचो पाण्डव, उनकी माता कुन्ती यहाँ से मुक्त हुए, यह इस
तोर्थ पर रही हुईटॉक पर लेप्यमय छहों मूर्त्तियाँ सिद्ध करती हैं ।
यहाँ श्रीसघ के अद्भुत भाग्य से रायण चैत्य वृक्ष चन्द्र-
किरणों से झरते अमृत के सदृश दुग्धवर्षा करता है । यहाँ व्याघ्री-
मयूर आदि तिर्यञ्च भी मुक्त भक्ति पूर्वक आदीश्वर भगवान के
चरणों को नमस्कार करने से स्वर्ग को प्राप्त हुए है । वाम पार्श्व मे
सत्यपुरीय महावीरावतार जिनालय और दक्षिण पार्श्व मे शकुनि
चैत्य के पृष्ठ भाग मे अष्टापद का मंदिर है। भव्य जन सरलता-
पूर्वक यात्रा कर पुण्य वृद्धि करे, इस हेतु से नन्दीश्वर, स्तंभनक
और गिरनार महातीर्थ के मन्दिर विराजमान हैं। अस्तिहस्त नमि
और विनमि से सेवित श्री नाभेय जिनेश्वर स्वर्गारोहण चैत्य में
शोभायमान हैं। दूसरे उत्तुग शिखर को श्रेयास, शान्तिनाथ,
नेमिनाथ, ऋषभदेव और महावीर आदि जिनेश्वर अलंकृत करते
है। पुण्यशाली जन यहाँ जिनालय में ससार का उच्छेद करने
वाली भगवती मरुदेवी को नमस्कार करके अपने आपको कृतकृत्य
मानते हैं ।
यहाँ कल्पवृक्ष सदृश कपर्दि नामक यक्षराज नमस्कार करने
वालो एव यात्रीसंघ के विविध विघ्नो का नाग करते है ।
यहाँ पर भगवान नेमिनाथ के आदेग से श्रीकृष्ण ने आठ
पाटलिपुत्र, नालंदा, चम्पा, मिथिला एवं मगध तीर्थ कल्प
८ विविध तीर्थ-कल्प
दिन उपवास करके पर्वत गुफा में रहे और कपर्दि यक्ष का आराधन
कर तीन विम्बो को पर्वतगुफा मे छिपाकर रखा। सुनते हैं कि आज
भी शक्रेन्द्र वहाँ आते हैं और पूजा करते हैं।
पाण्डवो द्वारा स्थापित श्री ऋषभदेव के उत्तर दिशा की ओर
वह गुफा आज भी चेलना तलाई तक विद्यमान है। यक्ष के
आदेग से प्रतिमाओ के दर्गन होते हैं।
यहाँ भगवान अजितनाथ और शान्तिनाथ वर्षावास रहे थे।
वहाँ उनके दो पूर्वाभिमुख चैत्य थे, अजितनाथ चैत्य के निकट
अनुपमा सर हुआ। मरुदेवी के पास आँखो को गीतल करनेवाला
गान्तिनाथ चैत्य भव्य प्राणियो की भव-भ्रान्ति को दूर करता है।
श्री गान्तिनाथ जिनालय के आगे तीस हाथ पर सात पुरुष
नीचे सोने और रूपे की दो खाने हैं। वहाँ से सौ हाथ आगे पूर्व
द्वार वाली सिद्ध रस से भरी हुई आठ हाथ नीचे रसकूपिका है।
श्री पादलिप्ताचार्य ने तीर्थोद्धार के लिए उसके समीप स्वर्ण और
रत्न स्थापित किए थे। पूर्व दिगा मे ऋषभदेव के नीचे ऋषभकूट
से ३० धनुष जाकर अष्टम तप पूर्वक बलिविधान आदि करने पर
वरुट्टया देवी बहु धन दिखलाती है। उनकी आज्ञा से गिला
उघाड कर रात्रि मे वहाँ प्रवेग-किया जाता है। वहाँ उपवास
करने से सर्वसिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। ऋषभदेव भगवान् का पूजन
वदन करने से (भव्य प्राणी) एकावतारी होता है। पाँच सौ
धनुष आगे पाषाणकुण्डिका है, वहाँ सात पद जाकर बुद्धिमान को
बलिविधि करनी चाहिए। किसी-किसी पुण्यगाली को वहाँ
गिलोत्पाटन कर दो उपवास करनेपर रसकूपिका प्रत्यक्ष होती है।
कल्कि का पुत्र परमार्हत् धर्मदत्त होगा, वह प्रतिदिन जिन-
विम्ब की प्रतिष्ठा कराके भोजन करेगा। उसका पुत्र जितगत्रु
राजा गत्रुञ्जय का उद्धार करेगा और वह बत्तीस वर्ष राज्य-
लग्मी का भोग करेगा। उसका पुत्र मेघघोष यहाँ कपर्दि यक्ष के
शत्रुञ्जय तीर्थ-कल्प ९
आदेश से श्री शान्तिनाथ और मरुदेवी के चैत्य का उद्धार करेगा।
नन्दिसूरि, आर्य श्रीप्रभ, मणिभद्र, यशोमित्र, धनमित्र, विकटधर्म,
मुमङ्गल और सूरसेन इस तीर्थ के उद्धार कराने वाले होगे जो
दुष्प्रसहसूरि के समय होने वाले विमलवाहन से पहले उद्धार
करेंगे।
जो यहाँ यात्रियो को कष्ट देते हैं अथवा उनका धन अपहरण
करते हैं वे अपने पाप के भार से वंश सहित घोर नरक मे पडते
हैं। यहाँ यात्रा-पूजा-तीर्थ द्रव्य की रक्षा और यात्री सघों का
सत्कार करने वाला, गोत्रसहित स्वर्ग लोक मे पूजा जाता है।
यहाँ पर वस्तुपाल और पेथड आदि के बनवाये हुए धर्म-
स्थानो का वर्णन करते हुए वक्ता पार नही पा सकता है। दूषक-
काल के प्रभाव से म्लेच्छो द्वारा इसके भविष्य मे भग होने की
सभावना करके मन्त्री वस्तुपाल एव तेजपाल—बुद्धिमानो—ने
ऋषभदेव व पुडरीक स्वामी की प्रतिमाएँ मम्पाणी पाषाण की
बनवा कर भूमिगृह मे रख दी थी।
कलिकाल के प्रभाव से स० १३६९, वैक्रमीय मे म्लेच्छो ने
जावड् स्थापित बिम्ब को भग कर दिया। इसके बाद स० १३७१
मे समरा शाह ने मूलनायक बिम्ब का उद्धार किया।
इस तीर्थ पर जो सघपति हो गए हैं, हो रहे हैं, और भविष्य
मे होगे, वे धन्य है। वे चिरकाल तक लक्ष्मी से समृद्ध रहे।
श्री भद्रबाहु स्वामी ने पहले 'कल्प पाहुड' से श्री शत्रुजय
कल्प बनाया था और उनके बाद श्री वज्रस्वामी ने और फिर
पादलिप्ताचार्य ने भी बनाया। उन्ही कल्पो से उद्धृत कर सक्षेप से
श्री जिनप्रभ सूरि ने यह श्री शत्रुजय कल्प प्रणीत किया है।
इस कल्प को वाचने, ध्यान करने, व्याख्यान करने, पढने और
श्रवण करने पर भक्तिशाली भव्य तीसरे भव मे सिद्धि प्राप्त
करते हैं।
१० विविध तीर्थ-कल्प
हे शत्रुजय शैलेग । तुम्हारे गुण कौन विद्वान थोडा-सा भी
कहने मे समर्थ हो सकते हैं ? इस तीर्थ के प्रभाव से यात्रा करने
वाले और नमस्कार करने वाले मनुष्य के मन-परिणाम शुभ होते
हैं और वृद्धिगत होते हैं ।
हे गिरिराज ! तुम्हारी यात्रा को चलते हुए सघ के रथ, घोडे,
ऊँट और मनुष्यो के चरणो से पवित्र हुई रज भव्य-जनो के अग
मे लगने पर पाप को नष्ट करती है । अन्यत्र मासक्षमण करने पर
जितने पापो का क्षय होता है उतना आपको नमस्कार करने मात्र
से हो जाता है ।
श्री नामेय-ऋषभ के द्वारा जहाँ निवास किया गया है और
इन्द्र से प्रग्रसित वैभव वाला है, ऐसे हे गिरिराज ! हे सिद्धक्षेत्र !
मन वचन और काया से तुम्हे नमस्कार करता हूँ । मैने सरल मन
से तुम्हारा कल्प बना कर जो पुण्य अर्जन किया है, उससे सारा
विश्व वास्तविक सुख वाला बने ।
पोथी मे रहे हुए इस कल्प को जो पूजेगा उसे समस्त इच्छित
सम्पत्तियाँ और सिद्धि प्राप्त होगी ।
- इसके प्रारंभ करने पर संघ मे 'राजाधिराज' प्रसन्न हुए थे,
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