विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव शत्रुंजय को नमस्कार करने का नियम दिलाया । वह अनशन
पूर्वक मर के शत्रुंजयगिरि का अधिष्ठायक कर्पर्दिद यक्ष हुआ ।
४३ व्याघ्री कल्प—शत्रुंजय पर वाघणपोल प्रसिद्ध है । तीर्था-
धिराज के द्वार पर एक व्याघ्री आकर अनशन कर के बैठ गई
और ७-८ दिन की आराधना से स्वर्ग गई । उसका देह सस्कार
अगर चंदन से करके प्रतोली के दक्षिण की ओर उसकी मूर्ति
स्थापित की गई ।
४४ अम्बिकादेवी कल्प—गिरनार पर अम्बिका शिखर दूसरी
टोक प्रसिद्ध है । अम्बिका कोडीनार के ब्राह्मण सोम की भार्या थी
जो जैन धर्म परायणा थी । श्राद्ध के दिन ब्रह्म भोज से पूर्व मुनि-
राज को आहार देने से क्रुद्ध सास और पति द्वारा अपमानित
होकर अपने सिद्ध-बुद्ध पुत्रों के साथ निकल कर जाते हुए पीछे से
पति को आते देख मार्गवर्त्ती कुएँ मे गिर गई और नेमिप्रभु के
ध्यान से मर कर गिरनार की अधिष्ठातृ अम्बिका देवी हुई । सोम-
भट्ट भी महासती के पीछे कूद पडा जो देव हुआ और सिंहरूप
धारण कर देवी का वाहन हो गया । अम्बिका को कोहडी भी
कहते हैं ।
अवशिष्ट कल्पो मे कुछ सैद्धान्तिक विषयो सम्बन्धी हैं । किसी
कारण से उनका इस ग्रन्थ मे संग्रह कर लिया गया है पर वे तीर्थों
सम्बन्धी नही होने से उनको अलग रखा जाना ही अधिक समी-
चीन होता । समय-समय पर कल्प रचे जाते रहे अतः इनमे कुछ
तारतम्य है । अनुक्रम ठीक से नही रह सका, प्रान्तीय वर्गीकरण
भी नही हो सकता । स० १३९० मे जव इन सबको दिल्ली मे
सगृहीत कर ग्रंथ का रूप दिया गया तब आजकल की भाँति कोई
क्रम ठीक वैठाया नही जा सका और मुनि जिनविजय जी ने भी