विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका २३
३६ पाटलिपुत्र नगर कल्प--इस नगर को कूणिक के पुत्र
उदायी ने वसाया था जिसका कल्प मे विस्तृत वर्णन है । उदायी
के वाद नवनन्द और कल्पक का वग़ज शकडाल मत्री हुआ । यहाँ
स्थूलिभद्र आदि अनेक महापुरुष हुए जिनका कल्प मे वर्णन है ।
और माथ ही साथ यहाँ की समृद्धि के आश्चर्यकारी उदाहरण हुए
हैं । यहाँ अनेक प्रकार के चावल होते थे जिनमे गर्दभिका गाखि-
रत्न को वार-वार काटने पर भी पुन -पुन ऊग जाता । जिनप्रभ-
सूरि जी के समय मे यह गौड देगान्तर्गत था क्योकि लक्षणावती
के सुलतान ने उसे गौड देग मे मिला दिया था ।
३७ प्रतिष्ठानपुग के कल्पो मे पौराणिक वार्त्ता है जिसमें
सातवाहन को विक्रमादित्य के समकालीन वतलाया है और
नागराज के सानिध्य से विक्रम की सेना को हराने का वर्णन है ।
यह राजा जैन हो गया । उसने जिन चैत्य वनवाये और पचास वीरो
ने भी अपने नामाङ्कित जिनालय निर्माण कराये । सातवाहन के
मरने पर गक्तिकुमार का राज्याभिषेक हुआ । वीर क्षेत्र प्रतिष्ठान
मे तब से आजतक कोई राजा प्रवेश नही करता ।
३८ अष्टापद तीर्थ कल्प--अयोध्या से बारह योजन की दूरी
पर अष्टापद लिखा है । कैलाग और धवलगिरि इसी के नाम हैं,
निकट ही मान सरोवर है । आकाग साफ होने पर अयोध्या के
निकटवर्ती उड्डयकूट पर जाने से उसकी धवल शिखर-परम्परा
दिखायी देती है । जिनप्रभसूरि लिखते हैं कि यद्यपि यह तीर्थ
अगम्य है पर प्रतिविम्बित दर्गन पाकर भव्यजन यात्राफल प्राप्त
करता है । इसमे भरत चक्रवर्त्ती ने २४ तीर्थंकर और अपने ९९
भाइयो के स्तूप-मूर्त्तियाँ व स्वय की मूर्ति भी स्थापित की थी ।
यहाँ के विशालकाय जिनालय का भी भव्य वर्णन किया गया है ।
सगर चक्रवर्त्ती द्वारा परिखा निर्माण, गगानदो की गगासागर तक
गति, वज्रस्वामी के जीव तिर्यंक जृ भक देव को गौतमस्वामी