विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका २७
इच्छा रही पर सब तीर्थों के फोटो प्राप्त करना सम्भव नही हुआ
अत जिन जिन तीर्थों के जितने ब्लाक जैन भवन, कलकत्ता श्रीजैन
सेवा समिति व श्री महेन्द्र कुमार सिंघी से प्राप्त हुए उन्हे साभार
प्रकाशित किए है।
इस ग्रथ का मुद्रण श्री महावीर प्रेस, वाराणसी मे हुआ है
वहाँ से प्रत्येक फर्में का प्रूफ मगाने मे पर्याप्त विलम्ब होता इसलिए
वही.प्रूफ सशोधन कर छापे गये अत बहुत सी अशुद्धिया रह गईं
जिसका हमे खेद है।
अन्त मे जिन जिनसे भी हमे सहयोग मिला है उन सबके प्रति
आभार प्रकट करते हुए जैन तीर्थों सम्बन्धी अवशिष्ट सामग्री भी
हम शीघ्र प्रकाशन करने मे समर्थ हो यही शुभेच्छा है।
इस ग्रन्थ का अनुवाद कलकत्ता मे परमपूज्या विदुषी आर्यारत्न
श्री सज्जनश्री जी महाराज के सानिध्य मे हुआ। पूज्य प्रेरणा
सम्राट् काकाश्री अगरचंद जी नाहटा का आदेश मिला कि इस
महान् ग्रन्थ का हिन्दी अनुवाद करो। तो पर्यूषण मे प्रारम्भ करके
प्रतिदिन अनुवाद को पूज्या साध्वी जी महाराज के पास बैठ कर
मिला लेता व जहाँ भी गाडी अटकती महाराज साहब उसको चला
देते इस प्रकार दीवाली के पूर्व इसका अनुवाद पूर्ण हो गया और
प्रेस कापी बनाकर काकाजी अगरचन्दजी को भेज दी। उन्होने महो-
पाध्याय विनयसागर जी आदि को भी दिखलाया तथा श्रीयुत्
देवेन्द्रराजजी मेहता ने भी प्राकृत भारती से प्रकाशन मे वडी
उत्सुकता दिखाई पर अन्त मे काकाजी अगरचद जी की प्रेरणा से
नाकोडा तीर्थ कमेटी को ही इसके प्रकाशन का श्रेय मिला। प्राकृत
तित्थकप्प जो अपूर्ण और अव्यवस्थित रूप मे मिला उसके