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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 75

२४ विविध तीर्थ-कल्प
द्वारा प्रतिबोध, भगवान् महावीर द्वारा प्रतिबोध, भगवान् महावीर
द्वारा गिरिराज पर चढने वाले को तद्भवमोक्षगामी बतलाने पर
गौतम स्वामी के चढने व १५०३ तापसो को प्रतिवोध देने का
विशद वर्णन है।
जिन सक्षिप्त कल्पो की वातो का उन्होने विस्तार किया है
उनमे से धर्मघोष सूरि कृत कल्प को श्रीजिनप्रभसूरि ने इस विविध
तीर्थकल्प मे सम्मिलित कर दिया है।
३९ कोटिशिला—यह तीर्थ एक योजन चौड़ा और एक योजन
ऊँचा मगध देश मे देवताओ द्वारा पूजित बतलाया है जो अब
अज्ञात है। यहाँ ६ तीर्थंकरो के शासन मे करोडो मुनि सिद्ध हुए
हैं और वासुदेव लोग इसे ऊँचा उठा कर शक्ति सन्तुलन बताते
हैं। बलभद्र जैन ने इस तीर्थ की अवस्थिति के विषय मे भारत के
दिगम्बर जैन तीर्थ भाग-२ के पृ० २२३ मे उहापोह की है।
४० नन्दीश्वर द्वीपकल्प—नन्दीश्वर द्वीप मनुष्य लोक से
बाहर आठवा द्वीप है जहाँ शाश्वत बावन पहाडो पर बावन
जिनालय हैं। इनका कल्प मे विशद वर्णन है। देवेन्द्रादि विशिष्ट
अवसर पर अट्ठाई महोत्सव करते हैं एव लब्धिधारी या देव के
साहाय्य से ही इसके दर्शन कर सकते हैं।
४१ वस्तुपाल तेजपालमंत्रि कल्प—प्राग्वाट आसराज कुमार
देवी के नन्दन इन विश्वविश्रुत भ्राता युगल के सुकृत्यो का वर्णन
आचार्य प्रवर ने बडे ही हार्दिक प्रेम से किया है और मन्त्रिद्वय को
तीर्थ स्वरुप बतलाया है क्योकि जिनके हृदय मे जिनेश्वर विराज-
मान हो वही तीर्थ है।
४२ कपर्द्धि यक्ष कल्प—पालीताना मे सरपंच कपर्द्धि निवास
करता था जो सप्त व्यसन रत था। गुरु महाराज ने उसके द्वारा
प्रदत्त स्थान मे चातुर्मास किया और अन्त मे नवद्वार मंत्र स्मरण