सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 442 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 85

२ विविध तीर्थ-कल्प
इसका विस्तार अवसर्पिणी काल मे आप्तो ने पहले आरे मे
अस्सी योजन, दूसरे मे सत्तर, तीसरे मे साठ, चौथे आरे मे
पचास, पाँचवे आरे मे बारह योजन और छठे आरे मे सात
हाथ का कहा है ।
युगादीश-ऋषभदेव के समय यह पर्वत पचास योजन मूल,
दश योजन विस्तार और आठ योजन ऊँचा था । कीर्ति से भुवन
को पवित्र बनाने वाले ऋषभसेनादि असंख्य नाथ तीर्थंकर यहाँ
पर समौसरे हैं और अतीत काल मे महर्षि लोग सिद्ध हुए हैं । श्री
पद्मनाभादि भावी जिनेश्वरो का यहाँ समवसरण होगा ।
श्री नेमिनाथ भगवान को छोडकर ऋषभदेव से लेकर
महावीर स्वामी पर्यन्त तेईस तीर्थङ्कर यहाँ समौसरे हैं ।
इस अवसर्पिणी में पवित्र बुद्धिवाले श्री भरत चक्रवर्ती ने
आदीश्वर भगवान के केवलज्ञान उत्पन्न होने पर इस पर्वत पर
योजन प्रमाण ऊँचा चैत्य कराया था जो आदीश्वर भगवान की
एक रत्न की प्रतिमा और बाईस छोटी देवकुलिकाओ मे सोने
चाँदी की बाईस तीर्थंकरो की प्रतिमाओ से युक्त था ।
बाईस तीर्थङ्करो की तदाकार पादुका और लेप्य निर्मित बिम्ब-
युक्त आयतनश्रेणी यहाँ सुशोभित है । यहाँ राजा श्री बाहूवली ने
समवसरण सहित मरुदेवी का ऊँचा प्रासाद कराया था ।
इस अवसर्पिणी मे प्रथम तीर्थङ्कर के प्रथम गणधर, प्रथम भरत
चक्रवर्ती के प्रथम पुत्र पुण्डरीक स्वामी यहाँपर सर्वप्रथम सिद्ध हुए ।
यहाँ नमि-विनमि नामक विद्याधरेन्द्र महर्षि दो कोटि मुनियो
के साथ सिद्ध को प्राप्त हुए । द्राविड़ और वालिखिल्लादि राजाओ
ने दश कोटि साधुओ के साथ यहाँ परम पद को प्राप्त किया ।
जय, राम आदि तीन कोटि राजर्षि यहाँ पधारे, नारदादि
एक लाख नव्वे मुनि शिव पद को पाये । यहाँ प्रद्युम्न, शाम्ब आदि
कुमार साढे आठ कोटि साधुओ के साथ मोक्ष गए ।