विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ
पृष्ठ 86, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 86
पचास लाख कोटि सागरोपम तक श्री ऋषभदेव के वशज
आदित्ययश (सूर्ययश) से लेकर सगरपर्यन्त राजागण परम्परा से
यहाँ चौदह लाख मोक्ष गए तथा असंख्यात सर्वार्थसिद्ध मे गए।
भरत के वशज शैलक और शुकादि यहाँ असंख्यात कोटा-
कोटि परिमाण मे सिद्ध हुए। यहाँ अर्हत् प्रतिमोद्धार कराने वाले
पाँच पाण्डव, कुन्तीसहित बीस कोटि मुनियो के साथ मोक्ष गए।
दूसरे तीर्थंकर अजितनाथ व सोलहवे तीर्थंकर शान्तिनाथ ने
यहाँ वर्षाकाल-चातुर्मास विताया। श्री नेमिनाथ के वचनो से
यात्रा के लिए आये हुए नन्दिषेण आचार्य ने यहाँ सर्वरोगहर
'अजित शान्ति स्तव' की रचना की।
इस महातीर्थ के छोटे-मोटे असख्य उद्धार हुए तथा यहाँ पर
असख्य प्रतिमाएँ और असख्य चैत्यो का निर्माण हुआ।
छोटे तालाब-कुण्ड तथा भरत कारित गुफाओ मे भक्तिपूर्वक
पूजन-वदन करने वाले एकावतारी होते हैं।
संप्रति विक्रमा