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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 84

विविध तीर्थ-कल्प
१. शत्रुञ्जय तीर्थ-कल्प
श्री पुण्डरीक गिरि शिखर के प्रासाद के अलङ्कारभूत श्री
ऋषभदेव आप सबका कल्याण करे। अतिमुक्त केवली ने नारद
ऋषि के समक्ष जो श्री शत्रुञ्जय तीर्थ का माहात्म्य कहा था, उसे
मै अपनी और दूसरो की स्मृति के लिए लेश मात्र कहूंगा। भव्य
जनो को पाप नष्ट करने की इच्छा से उसे श्रवण करना योग्य है।
शत्रुञ्जय पर पाँच कोटि तपस्वियो के साथ श्री पुण्डरीक
स्वामी चैत्री-पूनम के दिन सिद्ध हुए अत. यह पर्वत भी पुण्डरीक
(गिरि) नाम से स्मरण किया गया।
देवो, मनुष्यो और ऋषियो द्वारा उस तीर्थ के १. सिद्धक्षेत्र,
२ तीर्थराज, ३. मरुदेव, ४. भगीरथ, ५ विमलाचल, ६ बाहूबली,
७ सहस्रकमल, ८. तालध्वज, ९. कदम्ब, १० शतपत्र ११. नगाधि-
राज, १२ अष्टोत्तर शतकूट, १३. सहस्रपत्र, १४ ढंक, १५ लौहित्य,
१६. कपर्द्दिनिवास, १७ सिद्धिशेखर, १८ शत्रुञ्जय, १९ मुक्तिनिलय,
२० सिद्धि पर्वत, और २१. पुण्डरीक ये इक्कीस नाम किये हुए
गाये जाते हैं।
ढंक आदि पाँच कूट देवो सहित हैं और जिनके विवरो में
रसकूपिका, रत्नखान और ओषधियाँ विराजित है। काल के प्रभाव
से मिथ्यादृष्टि लोगो द्वारा, १ढक, २कदम्ब, ३लौहित्य, ४तालध्वज
और ५कपर्दि ये पाँचो स्वीकृत किए हुए हैं। अर्थात् उनके अधिकार
मे हैं।