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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

आवाम के हेतु नई बस्ती प्रदान की थी। इन सब सुकृतो का
उल्लेख प्रस्तुत तीर्थकल्प के "कन्यानयनीय महावीर कल्प और
कल्प परिशेष मे विस्तार से आया है जो समकालीन और विश्वस-
नीय है। सूरिजी की जीवनी और उनकी साहित्य सेवा के सम्बन्ध
मे विस्तृत जानने के लिए हमारे प्रकाशित व महो० विनयसागर
जी लिखित "शासन प्रभावक जिनप्रभसूरि" ग्रंथ द्रष्टव्य है।
आचार्य श्री ने अपने विचरण काल मे अनेक तीर्थो की
यात्राएँ की थी उनमे से शत्रुञ्जय, गिरनार, स्तभ तीर्थ आदि कई
तीर्थों के तो प्राचीन कल्प उपलब्ध थे, उनके आधार से तथा
अपने सुने हुए देखे हुए वृत्तान्तो के आधार से बहुत से तीर्थकल्पो
की रचनाएँ की थी इनमे से सवतोल्लेख वाले व आनुमानिक
निर्णीत संवतो वाले कल्पो की नामावली यहाँ दी जा रही है—
१ वैभारगिरि कल्प सं० १३६४।
२ चम्पापुरी कल्प सं० १३६० की घटना का उल्लेख।
३ सत्यपुर तीर्थ कल्प सं० १३६७ की घटना का उल्लेख।
४ अर्बुदगिरि कल्प सं० १३७८ (शक सं० १२४३) मे लल्ल
और पीठड के उद्धारका उल्लेख।
५ शत्रुञ्जय तीर्थ कल्प सं० १३८५ ज्येष्ठ सुदि ७।
६ ढिपुरी स्तव सं० १३८६ (शक सं० १२५१)।
७ अपापा वृहत्कल्प सं० १३८७ भाद्रपद गु० १२ पुष्यार्क देव-
गिरि नगरे।
८ कन्यानयनीय महावीर प्रतिमा कल्प सं० १३८५ का
उल्लेख।
९ हस्तिनापुर तीर्थ स्तव सं० १३८८ (शक सं० १२५३) वै०
सु० ६।
१० महावीर गणधर कल्प सं० १३८९ ज्ये० सु० ५।

८

विविध तीर्थ-कल्प

११ ग्रन्थ समाप्ति स० १३८९ भा० सु० १० योगिनीपुर।
१२ कन्यायननीय महावीर कल्प परिशेष स० १३८९ आषाढ
का उल्लेख।
प्रस्तुत ग्रन्थ मे समकालीन कई ऐतिहासिक घटनाओ के सव-
तोल्लेख सह उल्लेख व कई राजवगो व मुस्लिम सम्राटादि का
उल्लेख ऐतिहासिक दृष्टि से विशेष महत्त्वपूर्ण है।
इसमे श्वेताम्बर, दिगम्बर भेद भाव के बिना व उत्तर भारत
व दक्षिण भारत के तीर्थों का विश्वसनी वर्णन दिया है। कई
प्रमुख जैन श्रावको, जैनाचार्यो व उनके सुकृत्यो का उल्लेख भी
यथा प्रसग किया गया है। कुछ वातें पौराणिक भी है। कई वर्णन
केवल सम्बन्धित ही नही किन्तु बौद्धो, मनातनियो आदि के लिए
भी उपयोगी हैं। इस प्रकार यह ग्रन्थ ऐतिहासिक सास्कृतिक दृष्टि
से बड़ा ही महत्त्वपूर्ण है।
भाषा विज्ञान की दृष्टि से भी इसका महत्त्व निर्विवाद है
क्योकि इसमे प्राकृत सस्कृत गद्य पद्य विविध शैली की रचनाएं
हैं जिनमे देश्य शब्दो का भी प्रयोग हुआ है। कई शब्दो का वास्त-
विक अर्थ तो समझना भी कठिन है, जिनका अनुमान से काम
निकालना पडा है। वास्तव मे कही-कही तो वर्णन अति सक्षिप्त
होने से उनके भावो का स्पष्टीकरण भी कठिन हो गया है। कोश
ग्रन्थो मे उन शब्दो के नाम भी नही मिलते वे भविष्य मे रचे जाने
वाले कोशो मे अवश्य आने चाहिए। अन्य ग्रन्थो मे वे शब्द किस
अर्थ मे प्रयुक्त हुए हैं इस विषय मे अनुसन्धान व विचार किया
जाना चाहिए।
प्रस्तुत ग्रन्थ का नाम विविध तीर्थकल्प रखा गया है क्योकि
कल्प सज्ञक रचनाएँ अधिक हैं अवशिष्ट स्तव, स्तवन, स्तुति, चरित्र
और विचार सज्ञक कई रचनाएँ हैं। प्रशस्ति सह कुल ६२ रच-

भमिका ९
नाओ में भाषा और गद्य-पद्यादि की दृष्टि से इस प्रकार वर्गीकरण
किया जा सकता है। संस्कृत की कुल २७ रचनाओ मे १४ पद्य
और १३ गद्यमय है। एवं प्राकृत की ६ पद्य और ३० गद्य रच-
नाएँ हैं।
विविध तीर्थकल्प के ६२ कल्पो मे निम्नोक्त तीर्थों सम्बन्धी
रचनाएँ हैं—
१ अणहिलपुर अरिष्टनेमि कल्प
२ अपापापुरी कल्प,
३ अयोध्याकल्प,
४ अर्बुदाद्रिकल्प,
५ अवन्तिदेश अभिनन्दन कल्प,
६ अश्वावबोध कल्प
७ अष्टापदगिरि कल्प,
८ अहिच्छत्रा नगरी कल्प,
९ उज्ज्यन्त (गिरनार-रैवतगिरि)
१० कन्यानयनीय महावीर कल्प,
११ कालिकुण्ड कुर्कुटेश्वर कल्प,
१२ काम्पिल्यपुर तीर्थ कल्प,
१३ कुड्डु गेश्वर नामेयदेव कल्प,
१४ कुलपाकऋषभ-माणिक्यस्वामी कल्प,
१५ कोकावसति पार्श्वनाथ कल्प,
१६ कोटिशिला तीर्थ कल्प,
१७ कौशाम्बी नगरी कल्प,
१८ चौरासी महातीर्थ नाम संग्रह कल्प,
१९ चम्पापुरी कल्प,
२० ढीपुरी तीर्थ कल्प,

१० विविध तीर्थ-कल्प
२१ नन्दीश्वरद्वीप कल्प,
२२ नाशिकपुर कल्प,
२३ पाटलिपुत्र कल्प,
२४ पार्श्वनाथ (स्तम्भन) कल्प
२५ प्रतिष्ठानपुर कल्प,
२६ फलवर्द्धि पार्श्वनाथ कल्प
२७ मथुगपुरी कल्प
२८ मिथिला नाथ कल्प,
२९ रत्नवाहपुर कल्प
३० वागणसी नगरी कल्प
३१ वैभारगिरि कल्प
३२ शग्वपुर पार्श्व कल्प
३३ शत्रुञ्जय तीर्थ कल्प,
३४ गृद्धदन्ती पार्श्व कल्प,
३५ श्रावस्ती नगरी कल्प
३६ श्रीपुर अन्तगेक्ष कल्प
३७ सत्यपुर तीर्थ कल्प
३८ हरिकेली पार्श्व कल्प,
३९ हस्तिनापुर कल्प,
४० आमेर कुण्ड पद्मावती कल्प,
४१ व्याघ्री कल्प,
४२ कपर्दि कल्प,
४३ अम्बिका कल्प,
४४ वस्तुपाल तेजपाल कल्प,
इनमे पावापुरी, अष्टापद, कन्यानयन, ढिंपुरी, हस्तिनापुर के
दो-दो हैं, प्रतिष्ठान के तीन हैं, गिरनार के चार हैं व पार्श्वनाथ
(स्तंभन) के दो हैं। अत ६२ मे १२ बाद जाने से ५० रहे और

उनमें पच कल्याणक, अतिशय, पचकल्याणक (२४ जिन) स्तव,
पचपरमेष्ठि, ११ गणधर, समवशरण, आदि ६ कल्प तीर्थों के न
होकर गास्त्रीय विचार वाद देने से ४४ ही अवशिष्ट रहेगे। इनमे
भी १ अष्टापद महातीर्थ कल्प धर्मघोषसूरि का, २ पचकल्याणक
स्तवन सोमसूरि का एव ३ कल्यानयन महावीर कल्प परिशेष
आचार्य संघतिलकसूरि के आदेश से विद्यातिलक द्वारा रचित है।
इन कल्पो मे सभी एक-एक तीर्थ सम्बन्धी हैं परन्तु (४५) चतुर-
गीति महातीर्थ नाम सग्रह कल्प मे उस समय के अनेक तीर्थों का
उल्लेख चौबीस तीर्थंकरो के क्रम मे स्थानसूची सह किया है जो
ऐतिहासिक दृष्टि मे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यह शाश्वत ती है।
यो तीर्थ मुनियो की परम्परा भ० ऋषभदेव के निर्वाणस्थल अष्टा-
पद से आरम्भ होती है जो हिमालय मे छिपा पडा है।
इस कल्प का अनुवाद प्रस्तुत ग्रन्थ के पृ० १९२ मे प्रकाशित
है। इनमें से बहुत से तीर्थों व मन्दिरो का आज कोई पता नही
चलता।
विविध तीर्थकल्प मे श्रीजिनप्रभसूरि जी ने ज्ञातव्य दिए हैं
उनसे तत्कालीन जैन तीर्थों की स्थिति पर अच्छा प्रकाश पडता
है। अनेक नवीन ऐतिहासिक तथ्य सामने आते हैं। गत सात सौ
वर्षों मे जो पट परिवर्त्तन हुआ है उसका लेखा जोखा चित्र की
भाँति सामने आ जाता है। अनेक मुस्लिम शासको द्वारा विध्वस
लोला हुई धर्म प्राण भक्त श्रावको ने जीर्णोद्धार व नवनिर्माण
कराया उसके विवरण अत्यन्त मूल्यवान हैं।
शत्रुञ्जयतीर्थ—मूलमन्दिर के दाहिनी ओर पुण्डरीक स्वामी
और बाँये तरफ जावड़ सहकारित बिंव था। वामपार्श्व मे सत्य-
पुरीयावतार जिनालय, दाहिनी ओर शकुनिका चैत्य के पीछे अष्टा-
पद मन्दिर, नन्दीश्वर, स्तभन तीर्थ, गिरनार, स्वर्गारोहण चैत्य मे

१२ विविध तीर्थ-कल्प
नमि-विनमि सेवित ऋषभ दूसरे शृंग पर श्रेयासनाथ, गान्तिनाथ,
नमिनाथ ऋषभदेव व महावीर सुशोभित थे । कुन्ती और पाँच
पाण्डवो के बिम्ब लेप्यमय थे जो आज भी हैं । संप्रति, विक्रम,
वाग्भट, पादलिप्त, आम, दत्त के उद्धार का उल्लेख । जावड साह
के बिम्बोद्धार के अजिता यनन स्थानपर अनुपमा सरोवर हुआ ।
जावड का उद्धार स० १०८ मे वज्रस्वामी के उपदेश से हुआ वह
मधुमती (महुवा) निवासी था । वस्तुपाल और पीठड ने भी उद्धार
कराया । वस्तुपाल ने म्लेच्छो द्वारा भग्न होने की संभावना से
ऋषभदेव व पुण्डरीक प्रतिमाओ को भूमिगृह मे रखा । स० १३६९
मे जात्रड स्थापित बिम्बो का म्लेच्छो द्वारा भग्न हुआ । तब समरा-
साह ने स० १३७१ मे मूल नायकोद्धार किया ।
२ गिरनार तीर्थ—गिरनार जी की उपत्यका मे खगान्गढ
और तेजलपुर थे । वहाँ ऋषभदेव व पार्श्वनाथ के मन्दिर थे ।
कल्याणक त्रय मन्दिर वस्तुपाल मन्त्री ने ओर शत्रुजयावतार
कपर्दी मरुदेवी प्रासाद एव ऋषभदेव, पुण्डरीक, अष्टापद, नन्दीश्वर-
द्वीप के जिनालय भी वनवाये थे । काश्मीर के रत्न और अजित
श्रावक के समय लेप्यमय विम्व स्नान से गल जाने पर देवी ने
उन्हे रत्नमय बिम्ब दिया । गुजरात के जयसिंह देव ने खगार को
मार कर सज्जन को दण्डनायक स्थापित किया । स० ११८४ मे
उसने जिनालय बनाया, मालवा के भावड साह ने स्वर्णमय आमाल-
सार कराया । कुमारगल के श्रीमालवंशीय दण्डनायक ने स० १२००
मे पाज बनवाई व धवल ने प्रणाएं (प्याऊ) कराई। वस्तुपाल तेजपाल
वीरधवल के मन्त्री थे । तेजपाल ने तेजलपुर वसाया और पिता
के नाम से आसराज विहार पार्श्व जिनालय कराया । माता कुमार
देवी के नाम से कुमार सरोवर कराया । तेजलपुर से पूर्व दिगा मे
उग्रसेनगढ मे ऋषभदेवादि के मन्दिर हैं । उग्रसेनगढ, खगारगढ
और जूनागढ एक ही है । गढ के बाहर दक्षिणगा दि मे चँवरी-

भूमिका १३

वेदी, लड्दुओ के ओरे, पगुवाड़ा आदि स्थान हैं। उत्तर दिशा मे
दगारमंडप है। तेजपाल ने तीन कल्याणक चैत्य व देपाल मंत्री ने
इन्द्रमण्डप का उद्धार कराया था।
३ स्तभनतीर्थ—इसका लघुकल्प सघदास मुनि ने बनाया
था। जिनप्रभमूरि ने सक्षिप्त रचना की। अभयदेवसूरि द्वारा जयति-
हुअण स्तोत्र रचना का उल्लेख है। न० ५९ कल्पशिलोछ मे विशेष
वर्णन है।
४ अहिच्छत्रा तीर्थ—यह पार्श्वनाथ भगवान् के कमठोपसर्ग
का तीर्थ है। धरगेन्द्र की सर्पणगति के अनुसार दुर्ग का निर्माण
हुआ जो उस समय मौजूद था। चमत्कारी जलकुण्डो व मिट्टी सो
धातु सिद्धि होने के साथ-साथ सकृपिका, सवा लाख कुँए-वापिकाएँ,
मन्दिर मे धरणेन्द्रपद्मावती सेवित पार्श्वनाथ किले के पास नेमि-
नाथ व अम्बिका मूर्ति विद्यमान थी। उत्तरावापी का जल रोग-
नाशक था एव अनेक प्रकार की औषधियो व लौकिक तीर्थो का
भी वर्णन किया है।
५ अर्बुद गिरि—चन्द्रावती के विमलदण्डनायक ने स० १०८८
मे विमलवसही और स, १०८८ मे वस्तुपाल तेजपाल ने लूणि-
गवसही बनाई थी। म्लेच्छो द्वारा भग कर देने पर महणसिह के
पुत्र लल्ल ने विमलवसही का और चण्डसिंह के पुत्र पीथड ने
स० १३९८ मे लूणगवसही का जीर्णोद्धार कराया था। कुमारपाल
ने ऊंचे शिखर पर वीरचैत्य बनवाया जिसका उल्लेख है। जैनेतर
स्थानो का वर्णन भी महत्त्वपूर्ण हैं।
६ मथुरा तीर्थ—पुरातत्त्व की दृष्टि से मथुरा का अत्यधिक
महत्त्व है। वहाँ के सुपार्श्वनाथ स्वामी के कुबेरादेवी निर्मित बौद्ध
स्तूप जिनप्रभसूरि जी के समय मे अच्छी स्थिति मे और प्रसिद्ध
तीर्थ था। वहाँ के अनेक वृत्तान्त और स० ८२६ वोप्रभहिसूरि द्वारा

१४ विविध तीर्थ-कल्प
महावीर प्रतिमा प्रतिष्ठा व आमराजा द्वारा जीर्णोद्धार कराने
आदि का महत्त्वपूर्ण उल्लेख है ।
७ अश्वावबोध तीर्थ भरौंच—यह तीर्थ भी मुनिसुव्रत स्वामी
के समय का है । इस कल्प मे उसकी उत्पत्ति का महत्त्वपूर्ण इति-
हास है । शत्रुञ्जयोद्धारक वाहक के अनुज अवड ने अपने पिता के
पुण्यार्थ शमली विहार का उद्धार कराया था, आचार्य हेमचन्द्र
द्वारा सिंधवा देवी के उपद्रव दूर करने का उल्लेख है ।
८ कौशाम्बी तीर्थ—यहाँ के पद्मप्रभ जिनालय मे उस समय
भगवान् महावीर को पारणा कराती हुई चन्दनबाला की मूर्ति
थी जो आज नही है । पास मे ही वसुहार गाँव था ।
९ अयोध्या कल्प से विदित होता है कि देवेन्द्रसूरि जी यहाँ
के तीन महाबिम्ब आकाश मार्ग से लाये थे जिनमे सेरीसा
पार्श्वनाथ का बिम्ब धारासेणक गांव के खेत मे रह गया था ।
महाराजा कुमारपाल ने उस महाप्रभावक बिम्ब की स्थापना
की थी ।
१० हस्तिनापुर मे शान्तिनाथ, कुंथुनाथ, अरनाथ और
मल्लिनाथ के मनोहर चैत्य थे । अम्बा देवी का भी देवल था ।
११ साचोर तीर्थ राजा नाहड़ निर्मापित और जज्जिंगसूरि
प्रतिष्ठित था । यह तीर्थ भी अत्यन्त चमत्कारिक था । सं० ८४५ मे
हमीर ने वल्लभी का भंग किया तब और बाद मे सं० १०८१ मे
गजनी पति भी साचोर का भंग करने मे असमर्थ रहा । सं० १३४८
मे भी ब्रह्मशान्ति ने चमत्कार दिखाया और सं० १३५८ मे अलाउद्-
दीन के भाई उलूखान के आक्रमण समय भी अनाहत बाजे सुनकर
सेना भग गई पर सं० १३६७ मे सुलतान अलाउद्दीन ने गोमांस
रुधिर से अपवित्र कर प्रतिमा को दिल्ली लाकर आशातना की ।

भूमिका १५

१२ मिथिला तीर्थ—विदेह जनपद मे जगई नाम से प्रसिद्ध
मल्लिनाथ और नमिनाथ भगवान् के चैत्य थे। वहाँ की विद्या
समृद्धि और प्राकृतिक रहनसहन प्रशंसनीय था। आज तीर्थ
विच्छेद है।
१३. पावापुरी तीर्थ—इस लघुकल्प के अनुसार निकटस्थ
पहाडी मे दरार और दीवाली के दिन कुंए के पानी से दीपक जलने
का उल्लेख है। वृहत्कल्प तो बहुत विस्तृत और अनेक गास्त्रीय
पौराणिक ज्ञातव्यो से परिपूर्ण है।
१४ (ए) कन्नानयन महावीर प्रतिमा—यह प्रतिमा सिरि
जिनपतिसूरि जी ने स० १२३३ आषाढ सुदि १० को प्रतिष्ठित की
थी। इसके निर्माता उनके चाचा सेठ नागदेव थे। सं० १२४८ मे
पृथ्विराज चौहान का सुलतान सहाबुद्दीन द्वारा निधन होने पर
सेठ रामदेव (राज्य प्रधान) के निर्देश से कयवास स्थल के टीवो
मे प्रतिमा छिपा दी थी। १३११ मे सुथार जोज्जो को स्वप्न देकर
भगवान् प्रगट हुए। किन्तु परिकर प्राप्त न हुआ जिसपर प्रशस्ति
लेख मिलने की सम्भावना की। स० १३८५ तक वहाँ पूजित रही
जट्ठुअ राजपूतो की धाड से गाँव उजड़ गया। उसी वर्ष हासी के
अल्लविय सिकदार ने श्रावक़ और साधुओ को बन्दी बनाकर
विडम्बित किया। पार्श्वनाथ प्रतिमा का भग हुआ। महावीर स्वामी
की प्रतिमा दिल्ली-तुगलकाबाद के शाही खजाने मे लाकर रखी
गई। फिर प्रभावक आचार्य श्रीजिनप्रभसूरि जी द्वारा मुहम्मद
तुगलक को प्रतिबोध देकर अनेक चमत्कारो से प्रभावित
सम्राट् द्वारा मन्दिर बना कर पूजे जाने का विशद वर्णन दो
कल्पो मे है।
श्री जिनप्रभसूरि जी जब देवगिरि पधारे तो प्रतिष्ठानपुर

१६ विविध तीर्थ-कल्प
पधार कर सघपति जनसिंह, साहण, मल्लदेव आदि के साथ मुनि-
सुव्रत (जीवित) स्वामी की प्रतिमा को वन्दन किया ।
१५ अणहिलपुर अरिष्टनेमि कल्प— से विदित होता है कि
कन्नौजपति ने अपनी पुत्री महनिका को कञ्चुलि सम्वन्ध मे दिए
गए गूर्जरदेश मे जख सेठ को पोठी लेकर आने पर लखाराम मे
चौमासा बिताना पडा और स्वप्नादेश से खोये बैल मिले और
अरिष्टनेमि, पार्श्वनाथ और अम्बिका की प्रतिमाए इमली के वृक्ष
के नीचे से निकाली। मदिर बनने पर ब्रह्माण गच्छीय यशोभद्रसूरि
ने प्रतिष्ठित किए । उसी स्थान पर स० ८०२ मे वनराज चावडा
ने अणहिलपुर पाटण वसाया । वहा की नशावली इस कल्प मे दी
गई है ।
१६ नाशिकपुर कल्प—इस पौराणिक तीर्थ के कल्प मे चन्द्र-
कान्त मणिमय चन्द्रप्रभ प्रतिमा को प्रभु की विद्यमानता मे ही
सौधर्मेन्द्र से प्रतिमा प्राप्त करने और प्रजापति के मन्दिर बनाने
का उल्लेख है । रामचन्द्र जी व कुन्ती।द्वारा बाद मे जीर्णोद्धार हुआ ।
शान्तिसूरि ने कलिकाल मे जीर्णोद्धार कराया । राजा परमर्दी ने
२४ गांव अर्पण किए। महल्लय क्षत्रिय डाकूवाइओ के द्वारा
प्रासाद गिरा देने पर पल्लीवाल ईश्वर के पुत्र माणिक्य के पुत्र
कुमार सिंह ने जीर्णोद्धार कराया था ।
१७ हरिकखी पार्श्वनाथ कल्प से विदित होता है कि चालुक्य
भीमदेव के समय अतनु वुक्क सलार ने अणहिलपुर पाटण को
भग कर लौटते हुए हरिकखी गाव की प्रतिमा को भग्न कर
डाला । अधिष्ठाता देव के निर्देश से जोडकर छ महीना बद रखने
पर जुड जाने का चमत्कार वर्णित है ।
१८ शुद्धदन्ती पार्श्वनाथ कल्प—यह राजस्थान के सोजत से
सम्बन्धित है इस परगने को 'सात सौ देश लिखा है, सोधतिवाल

भूमिका १७

गच्छ यही से सम्बन्धित है । अयोध्या से रामचन्द्र जी के देहरासर
की रत्नमय प्रतिमा अधिष्ठाता देव ने गगनमार्ग से यहाँ ला कर
भूमिगृह मे रखी और उसे रत्नमय से पाषाण मय कर दिया।
तुर्कों द्वारा मस्तक उतार देने पर भी अजापालक द्वारा मस्तक को
शरीर पर चढा देने से वह पुन अखण्ड हो गई।
१९ अवन्ति देशस्थ अभिनन्दन कल्प मे मेदपल्ली मे तुर्कों
द्वारा खण्डित प्रतिमा को जोडकर प्रतिदिन पूजा करने के नियम
वाले वइजा श्रावक द्वारा पूजे जाने व अधिष्ठाता द्वारा चन्दन लेप
से अखण्ड हो जाने का निर्देश व बाद मे जिनालय निर्माण व मठ-
पति अभयकीर्ति भानुकीर्ति द्वारा चैत्यव्यवस्था का उल्लेख व
मालवपति जयसिंह देव द्वारा २४ हल की भूमि मठपति को व १२
हल भूमि पूजक को प्रदान करने का उल्लेख है।
२० चम्पापुरी कल्प मे सुभद्रा सती द्वारा बद छोडा हुआ एक
दरवाजा अठारह सौ वर्षों तक विद्यमान था जिसे स० १३६० मे
लक्षणावती (गौड बंगाल) के सुलतान समसदीन ने तुडवाकर पत्थर
और कपाटो को ले जाकर शंकरपुर दुर्ग के निर्माण मे काम लगाने
का महत्त्वपूर्ण उल्लेख है।
२१ श्रावस्ती नगरी 'महेठ' नाम से तब भी प्रसिद्ध थी, संभव-
नाथ जिनालय गगनचुंबी था और देवानुभाव से संध्या समय बन्द
हो जाता और प्रात काल स्वय खुल जाता था। एक बार सुलतान
अलाउद्दीनके मल्लिक हब्स ने बहराइच से आकर प्राकार कपाट
व विम्बो को भग्न कर डाला। उस चैत्य शिखर पर चीता आकर
उत्सवादि के समय बैठ जाता और मगल दीपक होने पर चला
जाता था। उस समय वहाँ बौद्धायतन भी था जहाँ समुद्र वंशीय
करावल्ल नरेन्द्र जो बौद्ध भक्त थे प्रक्षरित पलाना हुआ। अलंकृत
महातुरंगम चढाते थे, यहाँ वहुत प्रकार की औषध उत्पन्न
होती थी।
२

१८ विविध तीर्थ-कल्प
२२ वाराणसी कल्प—वाराणसी चार भागों में विभक्त थी।
१ राजधानी वाराणसी, २ मदन वाराणसी, ३ विजय वाराणसी
४ देव वाराणसी (यहाँ विश्वनाथ का मन्दिर है जिसमे जैन चतु-
विंशति पट्ट उस समय भी पूजा जाता था। कमल सरोवर के पास
पार्श्वनाथ जिनालय मे अनेक जिन-प्रतिमाएँ थी। तीन कोश पर
धर्मेक्षासन्निदेश मे वोधि सत्त्व का उच्च शिखरी आयतन था।
(यह स्थान आजकल सारनाथ कहलाता है) ढाई योजन पर चन्द्र-
प्रभ स्वामी की चार कल्याणकभूमि चन्द्रावती है।
२३. कोका वसतिपार्श्वनाथ कल्प—प्रश्नवाहन कुल के हर्ष-
पुरीया श्री अभयदेवसूरि ने अणहिलपुर आकर जयसिंहदेव से मल-
धारि विरुद पाया। वे घृतवसति मे प्रवचन करने जाते थे पर गोष्ठी
के निषेध करने पर मोखदेवनायग आदि श्रावको ने नये स्थान की
गवेषणा की। कोका श्रावक से यथोचित मूल्य मे भूमि लेकर उसी
के नाम से संबद्ध कोकावसति का निर्माण कराया। भ० पार्श्वनाथ
को प्रतिष्ठित किया गया पर भीमदेव के राज्य काल मे मालवा
के सुल्तान ने पाटण का भंग कर दिया और कोकावसति की
पार्श्वनाथ प्रतिमा को तोड़ डाला। नायग के वंशधर रामदेव,
आशधर ने उद्धार कराया। आरासन से प्रतिमा के लिए तीन
फलक मगवाये पर सन्तोष न होने पर रामदेव अनशन कर बैठ
गया। आठवे उपवास मे देवादेश हुआ कि गहूंली पर पुष्पाक्षत
वाले स्थान के नीचे पाषाण फलक है। उसे निकाल कर बिम्ब
निर्माण कराया और स० १२६६ मे देवानन्दसूरि ने प्रतिष्ठा की।
इसमे रामदेव के वंशजो के नाम दिए हैं और देल्हण को स्वप्न
दिया कि अधिष्ठायक चार घडी यहाँ रहते हैं अत सखेश्वर पार्श्व-
नाथ की यात्रा यही सफल होगी।
२४ डिंपुरीतीर्थ—पारेत जनपद मे शराविका पर्वत के पास

भूमिका
१९

चर्मणवती नदी के किनारे चेल्लण पार्श्वनाथ ढिंपुरी तीर्थ है जो
वकचूल द्वारा निर्यापित है । प्रतिमा भग्न करने आये हुए म्लेच्छो
के हाथ स्तम्भित हो गए । सिंहगुफापल्ली ही ढिंपुरी है । यहाँ महा-
वीर स्वामी, पार्श्वनाथ प्रतिमाएँ थी । नदी का नाम रतिदेव भी है
स्तोत्रानुसार ऋषभदेव, मुनिसुव्रत, अम्बिका-क्षेत्रपालादि की
मूर्तियाँ भी यहाँ थी ।
२५. कुडुंगेस्वर नाभेयदेव कल्प—श्वे० चारणमुनि वज्रसेन ने
शक्रावतार तीर्थ मे आदीश्वर भगवान् की प्रतिष्ठा की । यह कल्प
शासनपट्टिका को देखकर इस कल्प को बनाने का महत्त्वपूर्ण उल्लेख
है । सिद्धसेन दिवाकर से प्रतिबोध पाकर सम्राट् विक्रमादित्य ने
“वि० स० १ चैत्रसुदि १ गुरुवार को गोह्द मडल के सावद्रादि ९१
गाँव, चित्रकूट मडल के बसाड आदि ८४ गाँव, घुटारसी आदि २४
गाँव मोहड वासक मडल के ईसरोडा आदि ५६ गाँव कुडुंगेस्वर
ऋषभदेव तीर्थ के लिए । यह पट्टिका उज्जैन मे भाटदेशीय महा-
क्षपटलिक परमार्हत् श्वेताम्बर ब्राह्मण, गौतम के पुत्र कात्यायन
ने राजाज्ञा से लिखी । इस कल्प मे विक्रम से सिद्धसेनसूरि ने
तुम्हारे से ११९१ वर्ष बाद परनार्हत् कुमारपाल होगा—भविष्य
वाणी की—ऐसा उल्लेख है ।
कल्यानयन महावीर कल्प परिशेष—यह विद्यातिलक मुनि की
कृति है पर समकालीन इतिवृत्त होने से इसका महत्त्व अत्यधिक
है । श्री जिनप्रभसूरि जी ने दौलतावाद के साहू पेथड, साहू सहजा
ठा० अचल कारित चैत्यो का तुर्कों द्वारा भग किये जाते समय
फरमान, दिखा कर निवारण करने का उल्लेख है । ताजमल्लिक,
नगर नायक कुतुलखान महामल्लिक दीनार आदि एव मुल्तान
की माता मगदूम-इ-जहाँ आदि के उल्लेख है एव चैत मुदि १२ को
पाँच शिष्यो की दीक्षा एव व्रत ग्रहणादि के साथ मालारोपण, व्रत

२० विविध तीर्थ-कल्प
ग्रहण एवं आषाढ सुदि १० को १३ जिन प्रतिमाओ की प्रतिष्ठा
वडे समारोह पूर्वक करने का उल्लेख है । मथुरा, हस्तिनापुर यात्रा
व श्रावको द्वारा तीर्थोद्धार, प्रतिष्ठादि अनेक धर्मकार्यो का वर्णन
अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है । विस्तारभय से उनका यहा विवरण न लिख
कर मूलकल्प को ही देखने का अनुरोध है ।
२६ आमरकुण्ड पद्मावती देवी कल्प—तिलग जनपद विभूषण
आन्ध्र देश मे आमरकुण्ड नगर मे पद्मावती देवी का मन्दिर है ।
उरगल शिलापत्तन मे पहाड पर ऋषभदेव शान्तिनाथ के प्रासाद
थे एव दि० मेघचन्द्र मुनि रहते थे उनके छात्र क्षत्रिय माधवराज ने
देवी की कृपा से विस्तृत राज्य प्राप्त किया । कंकति से काकतीय
वग हुआ । राजाओ की वशावली भी महत्त्वपूर्ण है इस विषय मे
जैन संदेश के शोधाङ्क मे डॉ० ज्योति प्रसाद जैन का लेख
द्रष्टव्य है ।
२७ चतुरशीति महातीर्थ नाम सग्रह कल्प—इस विषय मे
ऊपर लिखा जा चुका है ।
२८ कुल्पाकमाणिक्यदेव तीर्थकल्प—यहाँ आदिनाथ भ० की
प्रतिमा भरत निर्मापित अष्टापद तीर्थ की है । उसे रावण के यहाँ
मदोदरी ने इन्द्र से प्राप्त की । फिर समुद्र मे देवो द्वारा पूजित
रही यह मरकत मणि की प्रतिमा है। कल्याण नगर के शकर राजा
ने मारि उपसर्ग निवारणार्थ पद्मावती के सांनिध्य से लवणाधिप
से प्राप्त की और वछडो को जोडकर लाते हुए सदेह होने से पीछे
देखा तो अटक जाने पर वही स्थापित की गई । उन दिनो कुल्पाक
‘‘दक्षिण वाराणसी’’ कहलाता था । शकर राजा ने प्रासाद बनवा
कर स्थापित की । भगवान् के न्हवण जल से दीपक जलता था
एवं मिट्टी का स्नानजल से भिगो कर बाँधने से अन्धो को नेत्र
ज्योति प्राप्त हो जाती थी । साँप काटे व्यक्ति भी निर्विष हो जाते

भूमिका २१

थे। वि० स० ६८० पर्यन्त भगवान् अधर रहे बाद मे वेदी पर
विराजमान हुए वहाँ अमी झरती थी। यह तीर्थ आज भी प्रभाव-
गाली है।
२९. श्रीपुर—अंतरिक्ष पार्श्वनाथ कल्प—यह प्रतिमा भी रावण
के समय की है और चिंगउल देश के श्रीपाल राजा का कुष्ट दूर
हो गया तब तालाब मे से निकालकर स्वप्न निर्देशानुसार लाई गई।
आज भी प्रतिमा अधर है जिसके नीचे से वस्त्र निकलता है और
उसका चमत्कारिक वर्णन कल्प मे पाया जाता है। प्रभु के न्हवण
जल से सिंचित आरती नही बुझती और न्हवण जल से दाद खाज
कुष्टादि चर्म रोग मिट जाते हैं।
३०. फलवर्द्धि पार्श्वनाथ कल्प—सवालक्ष देश मे मेडता के
निकटवर्त्ती यह पूर्वकाल मे बडा नगर था। धाघल श्रीमाल और
ओसवाल शिवकर वहाँ रहते थे। गाय का दूध झरने के स्थान मे
प्राचीन बिम्ब निकला और मन्दिर निर्माण प्रारम्भ हुआ। प्रति-
दिन देवानुभाव से द्रम्म मुद्रा का स्वस्तिक मिलता जिससे मन्दिर
निर्माण कार्य चलता था। सेठ के पुत्र के छिपकर देखने से द्रम्म-
मुद्रा आना बन्द हो गया। स० ११८१ मे राजगच्छीय धर्मघोषसूरि
ने प्रतिष्ठा की। सुलतान साहावुद्दीन ने मूल बिम्ब को भग्न किया
तो म्लेच्छ सेना मे अधत्व, रुधिर-वमनादि होने लगा तब सुल-
तान ने फरमान निकाला कि इसे कोई भग्न न करे। यहाँ का
अधिष्ठाता जाग्रत-चमत्कारी है। पौ० व० १० को पार्श्व जन्म
दिवस का मेला अति प्राचीन समय से लगता आ रहा है।
३१ वैभार गिरि कल्प—इस कल्प से विदित होता है कि
उस समय राजगृह मे द्रारिद्रविद्रावक रसकूपिका, त्रिकूट खण्डिकादि
शिखर व करण गांव के अवशेष थे। गरम व ठण्डे पानी के कुण्ड
तो आज भी है पर उपर्युक्त स्थान कहाँ थे ? पता नही। उस समय

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"से मिट्टी के वर्त्तन भी जनता को अन्य स्थान से लाना पडता था ।"
"वर्त्तन" -> 'व' + 'र्' + 'त्' + 'त' + 'न' = वर्त्तन.
"पडता" -> no

भूमिका २३
३६ पाटलिपुत्र नगर कल्प--इस नगर को कूणिक के पुत्र
उदायी ने वसाया था जिसका कल्प मे विस्तृत वर्णन है । उदायी
के वाद नवनन्द और कल्पक का वग़ज शकडाल मत्री हुआ । यहाँ
स्थूलिभद्र आदि अनेक महापुरुष हुए जिनका कल्प मे वर्णन है ।
और माथ ही साथ यहाँ की समृद्धि के आश्चर्यकारी उदाहरण हुए
हैं । यहाँ अनेक प्रकार के चावल होते थे जिनमे गर्दभिका गाखि-
रत्न को वार-वार काटने पर भी पुन -पुन ऊग जाता । जिनप्रभ-
सूरि जी के समय मे यह गौड देगान्तर्गत था क्योकि लक्षणावती
के सुलतान ने उसे गौड देग मे मिला दिया था ।
३७ प्रतिष्ठानपुग के कल्पो मे पौराणिक वार्त्ता है जिसमें
सातवाहन को विक्रमादित्य के समकालीन वतलाया है और
नागराज के सानिध्य से विक्रम की सेना को हराने का वर्णन है ।
यह राजा जैन हो गया । उसने जिन चैत्य वनवाये और पचास वीरो
ने भी अपने नामाङ्कित जिनालय निर्माण कराये । सातवाहन के
मरने पर गक्तिकुमार का राज्याभिषेक हुआ । वीर क्षेत्र प्रतिष्ठान
मे तब से आजतक कोई राजा प्रवेश नही करता ।
३८ अष्टापद तीर्थ कल्प--अयोध्या से बारह योजन की दूरी
पर अष्टापद लिखा है । कैलाग और धवलगिरि इसी के नाम हैं,
निकट ही मान सरोवर है । आकाग साफ होने पर अयोध्या के
निकटवर्ती उड्डयकूट पर जाने से उसकी धवल शिखर-परम्परा
दिखायी देती है । जिनप्रभसूरि लिखते हैं कि यद्यपि यह तीर्थ
अगम्य है पर प्रतिविम्बित दर्गन पाकर भव्यजन यात्राफल प्राप्त
करता है । इसमे भरत चक्रवर्त्ती ने २४ तीर्थंकर और अपने ९९
भाइयो के स्तूप-मूर्त्तियाँ व स्वय की मूर्ति भी स्थापित की थी ।
यहाँ के विशालकाय जिनालय का भी भव्य वर्णन किया गया है ।
सगर चक्रवर्त्ती द्वारा परिखा निर्माण, गगानदो की गगासागर तक
गति, वज्रस्वामी के जीव तिर्यंक जृ भक देव को गौतमस्वामी

२४ विविध तीर्थ-कल्प
द्वारा प्रतिबोध, भगवान् महावीर द्वारा प्रतिबोध, भगवान् महावीर
द्वारा गिरिराज पर चढने वाले को तद्भवमोक्षगामी बतलाने पर
गौतम स्वामी के चढने व १५०३ तापसो को प्रतिवोध देने का
विशद वर्णन है।
जिन सक्षिप्त कल्पो की वातो का उन्होने विस्तार किया है
उनमे से धर्मघोष सूरि कृत कल्प को श्रीजिनप्रभसूरि ने इस विविध
तीर्थकल्प मे सम्मिलित कर दिया है।
३९ कोटिशिला—यह तीर्थ एक योजन चौड़ा और एक योजन
ऊँचा मगध देश मे देवताओ द्वारा पूजित बतलाया है जो अब
अज्ञात है। यहाँ ६ तीर्थंकरो के शासन मे करोडो मुनि सिद्ध हुए
हैं और वासुदेव लोग इसे ऊँचा उठा कर शक्ति सन्तुलन बताते
हैं। बलभद्र जैन ने इस तीर्थ की अवस्थिति के विषय मे भारत के
दिगम्बर जैन तीर्थ भाग-२ के पृ० २२३ मे उहापोह की है।
४० नन्दीश्वर द्वीपकल्प—नन्दीश्वर द्वीप मनुष्य लोक से
बाहर आठवा द्वीप है जहाँ शाश्वत बावन पहाडो पर बावन
जिनालय हैं। इनका कल्प मे विशद वर्णन है। देवेन्द्रादि विशिष्ट
अवसर पर अट्ठाई महोत्सव करते हैं एव लब्धिधारी या देव के
साहाय्य से ही इसके दर्शन कर सकते हैं।
४१ वस्तुपाल तेजपालमंत्रि कल्प—प्राग्वाट आसराज कुमार
देवी के नन्दन इन विश्वविश्रुत भ्राता युगल के सुकृत्यो का वर्णन
आचार्य प्रवर ने बडे ही हार्दिक प्रेम से किया है और मन्त्रिद्वय को
तीर्थ स्वरुप बतलाया है क्योकि जिनके हृदय मे जिनेश्वर विराज-
मान हो वही तीर्थ है।
४२ कपर्द्धि यक्ष कल्प—पालीताना मे सरपंच कपर्द्धि निवास
करता था जो सप्त व्यसन रत था। गुरु महाराज ने उसके द्वारा
प्रदत्त स्थान मे चातुर्मास किया और अन्त मे नवद्वार मंत्र स्मरण

व शत्रुंजय को नमस्कार करने का नियम दिलाया । वह अनशन
पूर्वक मर के शत्रुंजयगिरि का अधिष्ठायक कर्पर्दिद यक्ष हुआ ।
४३ व्याघ्री कल्प—शत्रुंजय पर वाघणपोल प्रसिद्ध है । तीर्था-
धिराज के द्वार पर एक व्याघ्री आकर अनशन कर के बैठ गई
और ७-८ दिन की आराधना से स्वर्ग गई । उसका देह सस्कार
अगर चंदन से करके प्रतोली के दक्षिण की ओर उसकी मूर्ति
स्थापित की गई ।
४४ अम्बिकादेवी कल्प—गिरनार पर अम्बिका शिखर दूसरी
टोक प्रसिद्ध है । अम्बिका कोडीनार के ब्राह्मण सोम की भार्या थी
जो जैन धर्म परायणा थी । श्राद्ध के दिन ब्रह्म भोज से पूर्व मुनि-
राज को आहार देने से क्रुद्ध सास और पति द्वारा अपमानित
होकर अपने सिद्ध-बुद्ध पुत्रों के साथ निकल कर जाते हुए पीछे से
पति को आते देख मार्गवर्त्ती कुएँ मे गिर गई और नेमिप्रभु के
ध्यान से मर कर गिरनार की अधिष्ठातृ अम्बिका देवी हुई । सोम-
भट्ट भी महासती के पीछे कूद पडा जो देव हुआ और सिंहरूप
धारण कर देवी का वाहन हो गया । अम्बिका को कोहडी भी
कहते हैं ।
अवशिष्ट कल्पो मे कुछ सैद्धान्तिक विषयो सम्बन्धी हैं । किसी
कारण से उनका इस ग्रन्थ मे संग्रह कर लिया गया है पर वे तीर्थों
सम्बन्धी नही होने से उनको अलग रखा जाना ही अधिक समी-
चीन होता । समय-समय पर कल्प रचे जाते रहे अतः इनमे कुछ
तारतम्य है । अनुक्रम ठीक से नही रह सका, प्रान्तीय वर्गीकरण
भी नही हो सकता । स० १३९० मे जव इन सबको दिल्ली मे
सगृहीत कर ग्रंथ का रूप दिया गया तब आजकल की भाँति कोई
क्रम ठीक वैठाया नही जा सका और मुनि जिनविजय जी ने भी

२६ विविध तीर्थ-कल्प
वैसा कोई क्रम नही बैठाया जो सम्पादकीय के नाते उन्हे करना
चाहिए था। हमने भी इसी क्रम से अनुवाद किया है। सं १९९०
मे मुनि जिन-विजयजी ने जब इस ग्रथ रत्न का अनेक हस्त-
लिखित प्रतियो के आधार से सिंघी जैन ग्रन्थमाला के ग्रथाक १०
के रूप मे प्रकाशित कराया तो अपने निवेदन के अन्त मे वर्त्तमान
राष्ट्रभाषा मे द्वितीय अवतार होगा जो ऐतिहासिक अन्वेषण वाले
विवेचनादि से अलकृत व स्थान विशेष के चित्रादि से विभूषित
होगा पर मुनि जी का वह मनोरथ पूर्ण नही हो सका। अन्त मे
तथाविध योग्यता न होने पर भी हमने ऐसे ग्रन्थ का हिन्दी मे
अनुवाद प्रकाशित होना चाहिए इस प्रबल भावना से यह अन-
धिकार सा कार्य किया है इसमें जो त्रुटियाँ रही हो उसके लिए
क्षमा प्रार्थी हूँ। विशेषज्ञ हमे संशोधनादि सूचित करेंगे। ऐसी
आशा है।
प्रस्तुत ग्रन्थ की प्रस्तावना डा० ज्योति प्रसाद जी जैन जैसे
जैनइतिहास के विशिष्ट विद्वान् ने हमारे अनुरोध पर लिख भेजने
की कृपा की है उसके लिए अत्यन्त आभारी हैं।
प्रस्तुत ग्रन्थ के