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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 71

२० विविध तीर्थ-कल्प
ग्रहण एवं आषाढ सुदि १० को १३ जिन प्रतिमाओ की प्रतिष्ठा
वडे समारोह पूर्वक करने का उल्लेख है । मथुरा, हस्तिनापुर यात्रा
व श्रावको द्वारा तीर्थोद्धार, प्रतिष्ठादि अनेक धर्मकार्यो का वर्णन
अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है । विस्तारभय से उनका यहा विवरण न लिख
कर मूलकल्प को ही देखने का अनुरोध है ।
२६ आमरकुण्ड पद्मावती देवी कल्प—तिलग जनपद विभूषण
आन्ध्र देश मे आमरकुण्ड नगर मे पद्मावती देवी का मन्दिर है ।
उरगल शिलापत्तन मे पहाड पर ऋषभदेव शान्तिनाथ के प्रासाद
थे एव दि० मेघचन्द्र मुनि रहते थे उनके छात्र क्षत्रिय माधवराज ने
देवी की कृपा से विस्तृत राज्य प्राप्त किया । कंकति से काकतीय
वग हुआ । राजाओ की वशावली भी महत्त्वपूर्ण है इस विषय मे
जैन संदेश के शोधाङ्क मे डॉ० ज्योति प्रसाद जैन का लेख
द्रष्टव्य है ।
२७ चतुरशीति महातीर्थ नाम सग्रह कल्प—इस विषय मे
ऊपर लिखा जा चुका है ।
२८ कुल्पाकमाणिक्यदेव तीर्थकल्प—यहाँ आदिनाथ भ० की
प्रतिमा भरत निर्मापित अष्टापद तीर्थ की है । उसे रावण के यहाँ
मदोदरी ने इन्द्र से प्राप्त की । फिर समुद्र मे देवो द्वारा पूजित
रही यह मरकत मणि की प्रतिमा है। कल्याण नगर के शकर राजा
ने मारि उपसर्ग निवारणार्थ पद्मावती के सांनिध्य से लवणाधिप
से प्राप्त की और वछडो को जोडकर लाते हुए सदेह होने से पीछे
देखा तो अटक जाने पर वही स्थापित की गई । उन दिनो कुल्पाक
‘‘दक्षिण वाराणसी’’ कहलाता था । शकर राजा ने प्रासाद बनवा
कर स्थापित की । भगवान् के न्हवण जल से दीपक जलता था
एवं मिट्टी का स्नानजल से भिगो कर बाँधने से अन्धो को नेत्र
ज्योति प्राप्त हो जाती थी । साँप काटे व्यक्ति भी निर्विष हो जाते