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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 68

भूमिका १७

गच्छ यही से सम्बन्धित है । अयोध्या से रामचन्द्र जी के देहरासर
की रत्नमय प्रतिमा अधिष्ठाता देव ने गगनमार्ग से यहाँ ला कर
भूमिगृह मे रखी और उसे रत्नमय से पाषाण मय कर दिया।
तुर्कों द्वारा मस्तक उतार देने पर भी अजापालक द्वारा मस्तक को
शरीर पर चढा देने से वह पुन अखण्ड हो गई।
१९ अवन्ति देशस्थ अभिनन्दन कल्प मे मेदपल्ली मे तुर्कों
द्वारा खण्डित प्रतिमा को जोडकर प्रतिदिन पूजा करने के नियम
वाले वइजा श्रावक द्वारा पूजे जाने व अधिष्ठाता द्वारा चन्दन लेप
से अखण्ड हो जाने का निर्देश व बाद मे जिनालय निर्माण व मठ-
पति अभयकीर्ति भानुकीर्ति द्वारा चैत्यव्यवस्था का उल्लेख व
मालवपति जयसिंह देव द्वारा २४ हल की भूमि मठपति को व १२
हल भूमि पूजक को प्रदान करने का उल्लेख है।
२० चम्पापुरी कल्प मे सुभद्रा सती द्वारा बद छोडा हुआ एक
दरवाजा अठारह सौ वर्षों तक विद्यमान था जिसे स० १३६० मे
लक्षणावती (गौड बंगाल) के सुलतान समसदीन ने तुडवाकर पत्थर
और कपाटो को ले जाकर शंकरपुर दुर्ग के निर्माण मे काम लगाने
का महत्त्वपूर्ण उल्लेख है।
२१ श्रावस्ती नगरी 'महेठ' नाम से तब भी प्रसिद्ध थी, संभव-
नाथ जिनालय गगनचुंबी था और देवानुभाव से संध्या समय बन्द
हो जाता और प्रात काल स्वय खुल जाता था। एक बार सुलतान
अलाउद्दीनके मल्लिक हब्स ने बहराइच से आकर प्राकार कपाट
व विम्बो को भग्न कर डाला। उस चैत्य शिखर पर चीता आकर
उत्सवादि के समय बैठ जाता और मगल दीपक होने पर चला
जाता था। उस समय वहाँ बौद्धायतन भी था जहाँ समुद्र वंशीय
करावल्ल नरेन्द्र जो बौद्ध भक्त थे प्रक्षरित पलाना हुआ। अलंकृत
महातुरंगम चढाते थे, यहाँ वहुत प्रकार की औषध उत्पन्न
होती थी।
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