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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 442 में से

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पृष्ठ 67

१६ विविध तीर्थ-कल्प
पधार कर सघपति जनसिंह, साहण, मल्लदेव आदि के साथ मुनि-
सुव्रत (जीवित) स्वामी की प्रतिमा को वन्दन किया ।
१५ अणहिलपुर अरिष्टनेमि कल्प— से विदित होता है कि
कन्नौजपति ने अपनी पुत्री महनिका को कञ्चुलि सम्वन्ध मे दिए
गए गूर्जरदेश मे जख सेठ को पोठी लेकर आने पर लखाराम मे
चौमासा बिताना पडा और स्वप्नादेश से खोये बैल मिले और
अरिष्टनेमि, पार्श्वनाथ और अम्बिका की प्रतिमाए इमली के वृक्ष
के नीचे से निकाली। मदिर बनने पर ब्रह्माण गच्छीय यशोभद्रसूरि
ने प्रतिष्ठित किए । उसी स्थान पर स० ८०२ मे वनराज चावडा
ने अणहिलपुर पाटण वसाया । वहा की नशावली इस कल्प मे दी
गई है ।
१६ नाशिकपुर कल्प—इस पौराणिक तीर्थ के कल्प मे चन्द्र-
कान्त मणिमय चन्द्रप्रभ प्रतिमा को प्रभु की विद्यमानता मे ही
सौधर्मेन्द्र से प्रतिमा प्राप्त करने और प्रजापति के मन्दिर बनाने
का उल्लेख है । रामचन्द्र जी व कुन्ती।द्वारा बाद मे जीर्णोद्धार हुआ ।
शान्तिसूरि ने कलिकाल मे जीर्णोद्धार कराया । राजा परमर्दी ने
२४ गांव अर्पण किए। महल्लय क्षत्रिय डाकूवाइओ के द्वारा
प्रासाद गिरा देने पर पल्लीवाल ईश्वर के पुत्र माणिक्य के पुत्र
कुमार सिंह ने जीर्णोद्धार कराया था ।
१७ हरिकखी पार्श्वनाथ कल्प से विदित होता है कि चालुक्य
भीमदेव के समय अतनु वुक्क सलार ने अणहिलपुर पाटण को
भग कर लौटते हुए हरिकखी गाव की प्रतिमा को भग्न कर
डाला । अधिष्ठाता देव के निर्देश से जोडकर छ महीना बद रखने
पर जुड जाने का चमत्कार वर्णित है ।
१८ शुद्धदन्ती पार्श्वनाथ कल्प—यह राजस्थान के सोजत से
सम्बन्धित है इस परगने को 'सात सौ देश लिखा है, सोधतिवाल