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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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भूमिका २१

थे। वि० स० ६८० पर्यन्त भगवान् अधर रहे बाद मे वेदी पर
विराजमान हुए वहाँ अमी झरती थी। यह तीर्थ आज भी प्रभाव-
गाली है।
२९. श्रीपुर—अंतरिक्ष पार्श्वनाथ कल्प—यह प्रतिमा भी रावण
के समय की है और चिंगउल देश के श्रीपाल राजा का कुष्ट दूर
हो गया तब तालाब मे से निकालकर स्वप्न निर्देशानुसार लाई गई।
आज भी प्रतिमा अधर है जिसके नीचे से वस्त्र निकलता है और
उसका चमत्कारिक वर्णन कल्प मे पाया जाता है। प्रभु के न्हवण
जल से सिंचित आरती नही बुझती और न्हवण जल से दाद खाज
कुष्टादि चर्म रोग मिट जाते हैं।
३०. फलवर्द्धि पार्श्वनाथ कल्प—सवालक्ष देश मे मेडता के
निकटवर्त्ती यह पूर्वकाल मे बडा नगर था। धाघल श्रीमाल और
ओसवाल शिवकर वहाँ रहते थे। गाय का दूध झरने के स्थान मे
प्राचीन बिम्ब निकला और मन्दिर निर्माण प्रारम्भ हुआ। प्रति-
दिन देवानुभाव से द्रम्म मुद्रा का स्वस्तिक मिलता जिससे मन्दिर
निर्माण कार्य चलता था। सेठ के पुत्र के छिपकर देखने से द्रम्म-
मुद्रा आना बन्द हो गया। स० ११८१ मे राजगच्छीय धर्मघोषसूरि
ने प्रतिष्ठा की। सुलतान साहावुद्दीन ने मूल बिम्ब को भग्न किया
तो म्लेच्छ सेना मे अधत्व, रुधिर-वमनादि होने लगा तब सुल-
तान ने फरमान निकाला कि इसे कोई भग्न न करे। यहाँ का
अधिष्ठाता जाग्रत-चमत्कारी है। पौ० व० १० को पार्श्व जन्म
दिवस का मेला अति प्राचीन समय से लगता आ रहा है।
३१ वैभार गिरि कल्प—इस कल्प से विदित होता है कि
उस समय राजगृह मे द्रारिद्रविद्रावक रसकूपिका, त्रिकूट खण्डिकादि
शिखर व करण गांव के अवशेष थे। गरम व ठण्डे पानी के कुण्ड
तो आज भी है पर उपर्युक्त स्थान कहाँ थे ? पता नही। उस समय