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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 66

भूमिका १५

१२ मिथिला तीर्थ—विदेह जनपद मे जगई नाम से प्रसिद्ध
मल्लिनाथ और नमिनाथ भगवान् के चैत्य थे। वहाँ की विद्या
समृद्धि और प्राकृतिक रहनसहन प्रशंसनीय था। आज तीर्थ
विच्छेद है।
१३. पावापुरी तीर्थ—इस लघुकल्प के अनुसार निकटस्थ
पहाडी मे दरार और दीवाली के दिन कुंए के पानी से दीपक जलने
का उल्लेख है। वृहत्कल्प तो बहुत विस्तृत और अनेक गास्त्रीय
पौराणिक ज्ञातव्यो से परिपूर्ण है।
१४ (ए) कन्नानयन महावीर प्रतिमा—यह प्रतिमा सिरि
जिनपतिसूरि जी ने स० १२३३ आषाढ सुदि १० को प्रतिष्ठित की
थी। इसके निर्माता उनके चाचा सेठ नागदेव थे। सं० १२४८ मे
पृथ्विराज चौहान का सुलतान सहाबुद्दीन द्वारा निधन होने पर
सेठ रामदेव (राज्य प्रधान) के निर्देश से कयवास स्थल के टीवो
मे प्रतिमा छिपा दी थी। १३११ मे सुथार जोज्जो को स्वप्न देकर
भगवान् प्रगट हुए। किन्तु परिकर प्राप्त न हुआ जिसपर प्रशस्ति
लेख मिलने की सम्भावना की। स० १३८५ तक वहाँ पूजित रही
जट्ठुअ राजपूतो की धाड से गाँव उजड़ गया। उसी वर्ष हासी के
अल्लविय सिकदार ने श्रावक़ और साधुओ को बन्दी बनाकर
विडम्बित किया। पार्श्वनाथ प्रतिमा का भग हुआ। महावीर स्वामी
की प्रतिमा दिल्ली-तुगलकाबाद के शाही खजाने मे लाकर रखी
गई। फिर प्रभावक आचार्य श्रीजिनप्रभसूरि जी द्वारा मुहम्मद
तुगलक को प्रतिबोध देकर अनेक चमत्कारो से प्रभावित
सम्राट् द्वारा मन्दिर बना कर पूजे जाने का विशद वर्णन दो
कल्पो मे है।
श्री जिनप्रभसूरि जी जब देवगिरि पधारे तो प्रतिष्ठानपुर