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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 70

भूमिका
१९

चर्मणवती नदी के किनारे चेल्लण पार्श्वनाथ ढिंपुरी तीर्थ है जो
वकचूल द्वारा निर्यापित है । प्रतिमा भग्न करने आये हुए म्लेच्छो
के हाथ स्तम्भित हो गए । सिंहगुफापल्ली ही ढिंपुरी है । यहाँ महा-
वीर स्वामी, पार्श्वनाथ प्रतिमाएँ थी । नदी का नाम रतिदेव भी है
स्तोत्रानुसार ऋषभदेव, मुनिसुव्रत, अम्बिका-क्षेत्रपालादि की
मूर्तियाँ भी यहाँ थी ।
२५. कुडुंगेस्वर नाभेयदेव कल्प—श्वे० चारणमुनि वज्रसेन ने
शक्रावतार तीर्थ मे आदीश्वर भगवान् की प्रतिष्ठा की । यह कल्प
शासनपट्टिका को देखकर इस कल्प को बनाने का महत्त्वपूर्ण उल्लेख
है । सिद्धसेन दिवाकर से प्रतिबोध पाकर सम्राट् विक्रमादित्य ने
“वि० स० १ चैत्रसुदि १ गुरुवार को गोह्द मडल के सावद्रादि ९१
गाँव, चित्रकूट मडल के बसाड आदि ८४ गाँव, घुटारसी आदि २४
गाँव मोहड वासक मडल के ईसरोडा आदि ५६ गाँव कुडुंगेस्वर
ऋषभदेव तीर्थ के लिए । यह पट्टिका उज्जैन मे भाटदेशीय महा-
क्षपटलिक परमार्हत् श्वेताम्बर ब्राह्मण, गौतम के पुत्र कात्यायन
ने राजाज्ञा से लिखी । इस कल्प मे विक्रम से सिद्धसेनसूरि ने
तुम्हारे से ११९१ वर्ष बाद परनार्हत् कुमारपाल होगा—भविष्य
वाणी की—ऐसा उल्लेख है ।
कल्यानयन महावीर कल्प परिशेष—यह विद्यातिलक मुनि की
कृति है पर समकालीन इतिवृत्त होने से इसका महत्त्व अत्यधिक
है । श्री जिनप्रभसूरि जी ने दौलतावाद के साहू पेथड, साहू सहजा
ठा० अचल कारित चैत्यो का तुर्कों द्वारा भग किये जाते समय
फरमान, दिखा कर निवारण करने का उल्लेख है । ताजमल्लिक,
नगर नायक कुतुलखान महामल्लिक दीनार आदि एव मुल्तान
की माता मगदूम-इ-जहाँ आदि के उल्लेख है एव चैत मुदि १२ को
पाँच शिष्यो की दीक्षा एव व्रत ग्रहणादि के साथ मालारोपण, व्रत