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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 69

१८ विविध तीर्थ-कल्प
२२ वाराणसी कल्प—वाराणसी चार भागों में विभक्त थी।
१ राजधानी वाराणसी, २ मदन वाराणसी, ३ विजय वाराणसी
४ देव वाराणसी (यहाँ विश्वनाथ का मन्दिर है जिसमे जैन चतु-
विंशति पट्ट उस समय भी पूजा जाता था। कमल सरोवर के पास
पार्श्वनाथ जिनालय मे अनेक जिन-प्रतिमाएँ थी। तीन कोश पर
धर्मेक्षासन्निदेश मे वोधि सत्त्व का उच्च शिखरी आयतन था।
(यह स्थान आजकल सारनाथ कहलाता है) ढाई योजन पर चन्द्र-
प्रभ स्वामी की चार कल्याणकभूमि चन्द्रावती है।
२३. कोका वसतिपार्श्वनाथ कल्प—प्रश्नवाहन कुल के हर्ष-
पुरीया श्री अभयदेवसूरि ने अणहिलपुर आकर जयसिंहदेव से मल-
धारि विरुद पाया। वे घृतवसति मे प्रवचन करने जाते थे पर गोष्ठी
के निषेध करने पर मोखदेवनायग आदि श्रावको ने नये स्थान की
गवेषणा की। कोका श्रावक से यथोचित मूल्य मे भूमि लेकर उसी
के नाम से संबद्ध कोकावसति का निर्माण कराया। भ० पार्श्वनाथ
को प्रतिष्ठित किया गया पर भीमदेव के राज्य काल मे मालवा
के सुल्तान ने पाटण का भंग कर दिया और कोकावसति की
पार्श्वनाथ प्रतिमा को तोड़ डाला। नायग के वंशधर रामदेव,
आशधर ने उद्धार कराया। आरासन से प्रतिमा के लिए तीन
फलक मगवाये पर सन्तोष न होने पर रामदेव अनशन कर बैठ
गया। आठवे उपवास मे देवादेश हुआ कि गहूंली पर पुष्पाक्षत
वाले स्थान के नीचे पाषाण फलक है। उसे निकाल कर बिम्ब
निर्माण कराया और स० १२६६ मे देवानन्दसूरि ने प्रतिष्ठा की।
इसमे रामदेव के वंशजो के नाम दिए हैं और देल्हण को स्वप्न
दिया कि अधिष्ठायक चार घडी यहाँ रहते हैं अत सखेश्वर पार्श्व-
नाथ की यात्रा यही सफल होगी।
२४ डिंपुरीतीर्थ—पारेत जनपद मे शराविका पर्वत के पास