विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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इक्कीस हजार वर्ष वाद १००० धनुष ऊँचा गिरिराज रहेगा और
अणपत्री-पणपत्री देव चिरकाल पूजा करेंगे। यह पुंडरीक अध्ययन है।
यह विमलगिरि शाश्वत सिद्ध क्षेत्र है। इसका नाम सिद्ध
तीर्थ, भगीरथ, पुंडरीक, शत्रुञ्जयादि अनेक नाम अवसर्पिणी मे
है। यहाँ ५ कोडि से पुंडरीक, दो-दो कोड़ि से नमि विनमि,
८ कोड़ि से द्राविड-वारिखिल्ल, १० कोडी से भरत, सागर प्रमुख,
असख्य कोडा कोडी से, हरिवंग के असख्य कोडा कोडी राम-
सुग्रीव-विभीषणादि २० कोडी, वाली पाँच लाख से, सेलगाचार्य
सिद्ध हुए। साम्व प्रद्युम्नकोडी से, राजमति प्रमुख ९ करोड ७
लाख सात सौं यादव उज्ज्वलगिरि से सिद्ध हुए। इस प्रकार दिव्य
- प्रभाव वाला पूंडरीक तीर्थ उज्ज्वल शिखर है।
पुंडरीक अध्ययन का छट्ठा उद्देश पूर्ण हुआ।
अश्वावबोध भृगुपुर तीर्थ .
दक्षिण के नर्मदा प्रदेश के श्रीपुर मे पहले अजितनाथ तीर्थंकर
समौसरे। चातुर्मास करने से तीर्थ हुआ। फिर सरस्वती पीठ मे
चन्द्रपुर है जहाँ चन्द्रप्रभ तीर्थ हुआ।
फिर भृगुपुर (भरौंच) के राजा जितशत्रु के अश्वरत्न को
हनन करने के लिए नर्मदा मे स्नान कराया गया, वह जाति स्मरण
से आर्त्तध्यान करने लगा। उसकी अनुकंपा वश भगवान् मुनिसुव्रत
स्वामी प्रतिष्ठानपुर से चलकर माघ सुदी १ को भरौंच के
कोरिंट वन मे सहकार वृक्ष के नीचे समौसरे। भगवान् ने अश्व
और जितशत्रु राजा का पूर्वभव तथा अपना सबध वतलाकर
प्रतिवोध दिया। अश्वरत्न अनशन करके सात अहोरात्र वाद मर
के महर्द्धिक देव हुआ। उसने प्रत्यक्ष होकर तेरह कोटि उज्ज्वल
रत्नो की वृष्टि की, सारा नगर प्रतिबोध पाया। स्वर्ण-रत्न मणि
विभूपित हजार स्तभो वाला मुनिसुव्रत स्वामी का चैत्य निर्माण
२०
कराया। माघी पूर्णिमा को स्थापना हुई। उस समय तीन करोड़
पाँच लाख मनुष्य प्रतिबोध पाये। जितशत्रु ने माघ सुदी १५ को
अपरान्ह में लेप्यमय प्रतिमा स्थापित की जिसका रक्षक शक्र है।
राजा अनशन पूर्वक नवहल्लपत्तन मे विद्याधर रूप मे उत्पन्न
हुआ। अजित अपराजित सह् रैवतगिरिशिखर पर विम्ब स्थापना
की। केवली होकर सिद्ध हुआ। अन्य भी स्नानादि करते हुए
क्रमशः सिद्ध हुए।
अश्वदेव जो इन्द्र का सामानिक देव हुआ, प्रतिदिन तीर्थ
प्रभावना करने लगा। भृगुपुर महातीर्थ हो गया। स्वामी के
निर्वाण के बारह हजार वर्ष पश्चात् अश्वावबोध तीर्थ का पद्मचक्री
ने, फिर हरिषेण चक्री ने उद्धार किया। कृष्ण-बलदेव नरेन्द्र व
ईश्वर सार्थवाह भी उद्धार कराया। इक्ष्वाकु वंशी दशरथ राम
आदि तथा हरिवंश के दशार यादव प्रतिवर्ष उद्धार करते थे।
बारह हजार के परिवार से सूर राजा तथा तीन लाख से परिवृत
पाडु राजा सिद्ध हुए। भ० अरिष्टनेमि भी यहाँ समवसरे। द्वारिका-
दाह के समय प्रत्यासन्न जलधि मे मूर्च्छागत हरिवंशोद्भव का
उद्धार हुआ।
ग्यारह लाख (छ सौ) चौरासी हजार दो सौ वर्ष बाद अश्वाव-
बोध क्षेत्र मे भाद्रव महीने मे सात अहोरात्रवर्ती वर्षा हुई, जिसमे
रक्षा के लिए उड़ती हुई एक शकुनिका बाण विद्ध होकर गिरी।
श्रमण चारुचन्द्र ने नवकार मंत्र सुनाकर चैत्य के आगे रख दी।
दो प्रहर के पश्चात् वह मर के सिंहलद्वीप के राजा विजयबाहु की
रानी सुमंगला के यहाँ 'सुदर्शना कुमारी' रूप मे जन्मी। यौवन
प्राप्त होने पर स्वयंवर की आयोजना हुई, बहुत से राजा आये।
भृगुपुर के सार्थवाह के "णमो अरिहंताणं" शब्दोच्चारण से राज-
कुमारी मूच्छित होकर जातिस्मरण को प्राप्त हुई। राजकुमारी
तित्थकप्प का सार ३०७
सुदर्शना ने वैराग्य प्राप्त होकर अश्वावबोध तीर्थ मे श्री मुनिसुव्रत
स्वामी को वदनार्थ अभिग्रह किया। विवाह और राज्य से निष्प्रयो-
जन हो दृढप्रतिज्ञ राजकुमारी अपनी सखियो व १६ राजपुत्रो-अग-
रक्षको के साथ १८ जहाजो मे आरूढ़ होकर भृगुपुर की ओर चली।
मार्ग मे शील प्रभाव से दानवराज का हनन किया। नवकार मंत्र
का जप करते भृगुपुर पहुँच कर प्रभु के दर्शन किए। अठाईमहोत्सव-
पूर्वक अश्वदेव का आराधन किया। 'शकुनिका विहार' नामक
नया मंदिर निर्माण कराया, जो १००८ ध्वजाओ से विभूषित था।
सुदर्शना महादेवी ने वारह वर्ष तक तीर्थभक्ति करके अनशनपूर्वक
१६ विद्यादेवियो के पास हजारो देवो और बाण व्यंतरो की
स्वामिनी, जवूद्वीप प्रमाण धवलगृह मे उत्पन्न हुई।
अपना पूर्वभव स्मरण कर स्नानपूर्वक भद्रसाल, नदन वन,
पद्मद्रह से पद्मकमल और गोशीर्ष चन्दनादि ले जाकर अठाई
महोत्सव किया फिर नंदीश्वरादि मे चैत्यवन्दना कर भगवान्
महावीर को वंदन किया, नाटक किया। शक्रेन्द्र के प्रश्न पर प्रभु
ने कहा—यह शकुनिका है, तीसरे भव मे सिद्ध होगी।
आर्य सुहस्तिसूरि के शिष्य संप्रति राजा ने इसका उद्धार
कराया। कालिकाचार्य ने चातुर्मास कर उपसर्ग को दूर किया।
सिद्धसेन सूरि प्रतिबोधित विक्रम राजा ने जीर्णोद्धार कराया।
कालिकाचार्य के समय बनवायो हुई गोशीर्ष चन्दनमय सुदर्शना-
प्रतिमा को सिद्धसेन ने प्रतिष्ठापित की। यहाँ भद्रगुप्ताचार्य के
पास वज्रस्वामी ने दशपूर्व पूर्ण किये। आकाशगामिनी विद्या
(महापरिज्ञा अध्ययन से) उद्धृत की। जृंभक देवो ने महिमा की।
भगवान् ने गौतम स्वामी के पूछने पर कहा कि मेरे निर्वाण से
४८४ (वि० स० १४) मे आर्य खपुटाचार्य मिथ्यादृष्टि देवों द्वारा की
हुई रजवृष्टि बंद करेगे।
३०८ विविध तीर्थ-कल्प
सं० ८४५ मे वल्लभी भंग कर आते हुए अनार्यों को सुदर्शना
निवारण करेगी ।
सं० ८४० मे मल्लवादी आचार्य मिथ्यात्वी देवो का उपद्रव दूर
कर एक हजार आचार्यों सहित प्रभावना करेंगे । प्रतिष्ठानपुर का
राजा गालिवाहन उद्धार करावेगा । एवं कृष्ण, नरवाहन, शिला-
दित्य चारो राजा महोत्सव करेगे । कालकाचार्य और पादलिप्ता-
चार्य के समय सुदर्शना प्रत्यक्ष होकर नृत्यादि करेगी । इस प्रकार
११ लाख ८५ हजार ९८० वर्ष अनेक राजा सार्थवाहादि से पूजित
व्यतीत होगे ।
अंवड़, पाटलिपुत्र के दत्त कनक रत्न विभूषित करेंगे । दमघोष
जितशत्रु, सुदर्शनादि से उद्धार होगा । बारह लाख पाँच हजार से
अधिक वर्ष पूजित रहने वाले इस तीर्थ की दो हजार वर्ष बाद
नर्मदा जल कल्लोल और घोरांधकार का मिथ्यादृष्टि देवियो का
उपद्रव अश्वदेव दूर करेगा । भगवान् के अठारह हजार वर्ष बाद
मुनिसुव्रत प्रतिमा को सुदर्शना स्वस्थान ले जाकर पूजेगी । वह
आयु पूर्ण कर घातकी खंड की विजयकेतु राजा होगी फिर सर्वार्थ-
सिद्धि जाकर सर्वानुभूति तीर्थंकर (के समय मुक्त) होगी !
इस तीर्थ की बड़ी महिमा है । कल्याणक पर्वादि मे पूजा का
असंख्यगुण फल है । इस प्रकार अश्वावबोध तीर्थ के १३२ उद्धार
वज्रस्वामी ने बतलाया । पाँच हजार के परिवार से पांडुराजा
और हरिवंश के कोटि-सहस्र सिद्ध हुए ।
चंदेरी-चन्द्रप्रभास
उस काल में चन्द्रप्रभ स्वामी अनेकश चन्देरी नगरी मे समो-
सरे । ज्वालामालिनी देवी ने वहाँ सिंहकीर्ति राजा को अपने चैत्य
की प्रतिमा दी, जिसे वहाँ स्थापित की । वह चन्द्रकान्त मणि की
मणिभूषण नामक निरालंब प्रतिमा है । प्रभास यक्ष नित्य नाटक
तित्थकप्प का सार ३०९
पूजा आदि करता था। दश चक्रवर्ती, प्रतिवासुदेव, कृष्ण बलराम
आदि नरेन्द्रो ने इसको पूजा की। इनकी आराधना से कुन्ती के
पाँच पुत्र—पांडव हुए जिन्होने चैत्योद्धार कराया। 'सदाशिव'
कहलाये। शिवरात्रि प्रतिष्ठादिवस है। चौरासी हजार वर्ष बाद
सिद्धार्थ नरेन्द्र ने उद्धार कराया। कालसदीव व पेढालपुत्र सुव्रत
ने नित्य आराधना की। त्रैलोक्य स्वामिनी विद्या सिद्ध हुई।
भगवान् के निर्वाण के ६०० (वि० १३०) वर्ष बाद चंदेरी मे
वज्रसेन के शिष्य चन्दार्य शि० समन्तभद्र ने प्रतिष्ठा की। मिथ्या-
दृष्टियो का प्रभाव फैलने पर अतिशय से ईश्वर लिंग की प्रसिद्धि
अधिक हुई। सिंहमण्डलाधिप ने द्वार स्थापित कर सिंहासन पर
नागराज आरक्षक स्थापन किये। वसुमित्राचार्य अनशन करके
काल प्राप्त हुए। इसके बाद ग्राम्य जनों से पूजित सोमलिंग कह-
लाए। बोटिकदृष्टि वालो ने सीता विहार ग्रहण किया। शालिवाहन
को प्रतिबोध देकर पादलिप्ताचार्य ने गिरनार पर रहे दो क्षुल्लको
को नागार्जुन प्रभावित चंदेरी भेजकर बाद मे जीता। दुष्मानुभाव
से १४०० वर्ष बाद भस्मग्रह उतरने पर दत्त राजा के समय
सम्यग्दृष्टि जन के अधीन हो दस हजार वर्ष श्रमण संघ वदित रह
कर फिर रैवतगिरि शिखर पर पूजे जाएंगे, बीस हजार वर्ष
त्रिभुवन स्वामिनी मनुष्योत्तर पर्वत पर पूजेगी।
भगवान् महावीर के ज्येष्ठ भ्राता नन्दिवर्द्धन ने पित्तलमय
२२ प्रतिमाएं बनवाई। ५८१ वर्ष पश्चात् अंबादेवी ने उठाकर
चंदेरी के सिद्धमठ मे रखी। मिथ्यादृष्टि देवो ने चंद्रप्रभ प्रतिमा
को अक्षुब्ध भाव से पूजा। 'ज्वालामालिनी' आदि देवियाँ पूजन
करती हैं। विक्रम से ३७५ वर्ष अनार्यों ने तथा १०८१-१३८४-
१४२९ यावत् दस हजार वर्ष और फिर उज्ज्वल शिखर पर पूजी
जायगी। यह चतुर्दशां-पाँचवें चंदेरी अध्ययन का हुआ।
३१० विविध तीर्थ-कल्प
उस काल उस समय मे भगवान् चन्द्रप्रभ चंदेरी मे समवसरे।
लवणाधिपति ने उस स्थान पर सयमचद गजा के लिए तिलकपुर
नगर बसाया । यह बारह योजन विस्तृत था । अरिहदत्त गणधर
कोटि परिवृत माघ वदि १४ को निर्वाण प्राप्त हुए, जिससे शिवरात्रि
प्रसिद्ध हुई। चन्द्रविमानोद्योत से चन्द्रप्रभास कहलाया । त्रिभुवन
स्वामिनी देवी ने इस सिद्ध क्षेत्र पर भगवान् की प्रतिमा स्थापित
की। यहाँ पशु-पक्षी आदि के भी कर्म निर्जरा होती है । रामचन्द्रजी
ने यहाँ चातुर्मास किया, सीताविहार हुआ । रावण कैलाश पर
चैत्य वदना करके त्रिभुवनस्वामिनी से चन्द्रप्रभ प्रभु की अमृतलिंग
प्रतिमा प्राप्त कर लाया और यहाँ विराजमान की। यही कालक्रम
से ज्योतिर्लिंग प्रसिद्ध हुआ ।
भगवान् नेमिनाथ का समवसरण होने से यादवो का विद्याधरों
का प्रिय मिलन हुआ । पांडव भी समुद्र-सरस्वती तट पर विद्या
सिद्ध बारह वर्ष रहे । केवलज्ञान स्थान ब्रह्मकुंड समवशरण, चंद्र-
मूर्य-राहु योगस्थान विद्यासिद्धि स्थान है। दुषमानुभाव से
ज्योतिलिंग कुतीर्थिको ने ग्रहण कर लिया । यह चन्द्रप्रभास
अध्ययन हुआ ।
उस काल उस समय मे भगवान् चन्द्रप्रभ दक्षिणापथ मे विच-
रते हुए कलव वन मे समवसरे । नासिकपुर से राजा गोवर्द्धन
वदनार्थ आया। हे गौतम ! उस देव-मनुष्यो की सभा मे एक गाय
ने आकर अपना पूर्व कर्म पूछा । भगवान् ने कहा—एक कागिणी
का ऋण जो तुमने करके नौ भव पूर्व तिर्यंच गंथी बाँधी थी, उसी
ऋण से दासत्व, भिखारीपना और तिर्यंचपना प्राप्त होता है।
प्रतिबोध पाकर वह १८ दिनो के अनशन से वैमानिक देव हुई ।
राजा भी निष्क्रमण करके ब्रह्मेन्द्र हुआ । वह उस समय जहाँ
क्रीडा करता था, ब्रह्मगिरि पर वनवाई हुई जीवितस्वामी की
रत्नमय प्रतिमा थी, जहाँ गाय अमृत झरती थी। क्रमश अजना
तित्थकप्प का सार ३११
ने आराधना की, जीर्णोद्धार हुआ । राम, लक्ष्मण, सीता ने चार
वर्ष आराधना की । हस्तिनापुर मे पुत्रार्थ अग्नि प्रवेश करते कुती
को नारद मुनि ने पूर्वभव बतलाया, उपवास पूर्वक आराधना से
धर्मपुत्र युधिष्ठिर जन्मा । शील प्रभाव से सदा पूजा की, पाण्डवो
ने वारहवे वर्ष जीर्णोद्धार किया । ज्वालामालिनी शासन देवी हुई ।
श्रमण सघ ने प्रतिष्ठा की तब से दिनोदिन जीवित स्वामी प्रतिमा
का माहात्म्य बढा, अनेक उद्धार हुए । चक्रवर्ती बलदेव वासुदेवो
से पूजित प्रतिमा और चैत्य का उद्धार हरिवश द्वारा हुआ । चेडा
महाराजा ने भी उद्धार कराया ।
कृष्णदेव के प्राप्त कर बीस हजार वर्ष व्यतिक्रान्त होने पर
चन्द्रप्रभु प्रतिमा को देवी अपने भवन मे ग्रहण करेगी । करोड़
अडसठ लाख छब्बीस हजार वर्ष यह तीर्थ विद्याधर-चक्रवाल पूजा
हेतु विजययक्ष पूजित तीर्थ का उद्देश है ।
उस काल उस समय मे दक्षिण खण्ड मे पूर्ण नाटक द्वीप में
चन्देरीपुर मे चन्द्रप्रभ स्वामी जीवितस्वामीकी शक्र प्रतिष्ठित
प्रतिमा सूर्य जैसी तेजस्वी अमृत वर्षाने वाली, देवपूज्य अठारह
हजार वर्ष रहेगी, फिर भुवनपति देवो द्वारा पूजी जायगी । चन्द्रा-
वती उद्देश हुआ ।
जिस समय लंका मे मन्दोदरी अष्टमपूर्वक प्रौषध व्रत मे रही
तो तीसरे दिन त्रिभुवन स्वामिनी ने अपनी चन्द्रप्रभ प्रतिमा दी ।
कालक्रम से अयोध्या मे लाकर सीता ने पूजी, फिर देवताओ ने
ग्रहण कर ली । फिर पण्डुमधुरा मे पाण्डवो के मासक्षमण करने
पर त्रिभुवन स्वामिनी ने उन्हे दी जिसे पट्टण मे स्थापित की वही
सोलह हजार वर्ष बीतने पर यक्षराज पूजेगा ।
नाहड़-साचोर तीर्थ
एक बार कन्नौज देश-हस्तिनापुर मे श्री आर्य महागिरि सम-
३१० विविध तीर्थ-कल्प
वसरे। गुरुमहाराज ने किसी विवर्ण देहवाले भिखारी की ओर
वारंवार देखा तो देवनन्दि सेठ ने समझ लिया कि अवश्य ही यह
प्रभावक होगा। अत उसे अपने घर पर लाकर रख लिया। पूछने
पर जान हुआ कि यह जितशत्रु-नन्दन नाहड है। क्रमशः तरुण,
हुआ, दुविनीत होने से कुछ नहीं सीखता पर केवल नवकार मन्त्र
ग्रहण किया। उस प्रदेश में एक सिद्धयोगीन्द्र सौ योगियों के साथ
आया। उसने विद्या सिद्ध करने के हेतु नाहड़ को अपने वश में
कर रात्रि के समय श्मशान में बुलाया। मृतक व वेताल के प्रयोग
से मुझे मार कर स्वर्ण पुरुष बनाने में योगी सचेष्ट है, ऐसा ज्ञात
कर "णमो अरिहंताणं" का जाप किया और परिव्राजक को ही
अग्निकुण्ड में फेंक दिया जिससे 'स्वर्णपुरुष' सिद्ध हो गया। उस
नगरी का राजा यशोवर्म अपुत्रिया मर गया था जिनके उत्तरा-
धिकारी नियुक्त करने के लिए पंच दिवा प्रगट हुआ और नाहड़
राज्याभिषिक्त हो गया। आकाशवाणी घोषणा भी हो गई जिससे
दुष्ट जन अधीन हो गए। उसी दिन जातिस्मृति प्राप्त कर सार्थ-
वाह-पिता के साथ वाराणसी जाकर आर्य महागिरि गुरु को वन्दन
किया। उपदेश से प्रतिबोध पाया। विहार भूमि विस्तृत हुई।
वर्द्धमान तीर्थ की स्थापना के हेतु नैमित्तिक लोगों को भेजा
गया। वे भूमि परीक्षा के लिए ग्रामानुग्राम देखते हुए छ मास में
मरुदेश पहुँचे। सच्चउर पट्टण पहुँचे, जहाँ चन्द्रप्रभ स्वामी के
समवसरण होने से पवित्रित तीर्थभूमि थी। भगवान् वर्द्धमान
स्वामी की जीवित स्वामी प्रतिमा स्थापनार्थ परीक्षित भूमि पर
खात मुहूर्त्त किया गया।
उस नगरी में जोगराय मडलिक था, महाराजा नाहड़ के
निर्देश से अनुमति प्राप्त कर सूत्रधारों को नियुक्त कर दो चैत्य
बनवाये। भगवान् महावीर की और ब्रह्मशान्ति यक्ष की स्वर्णमय-
पित्तलमय प्रतिमाएं ब्रह्मचारी सूत्रधारों द्वारा निर्मित हुईं। आर्य
सुहस्तीसूरि को प्रतिष्ठाहेतु प्रार्थना की गई। भगवान् महावीर के
३०० वर्ष बाद वैशाख सुदि पूर्णिमा के दिन शुभलग्न मे पच पूर्व-
घर आचार्य जज्जिगसूरि के निर्देश देकर ५०० श्रमणो के साथ
वाराणसी से भेजा। चक्री नाहड भी साचोर आया। अनेक राजा
लोग साथ में आये। मार्ग मे अभयदान, अमारि उद्घोषणाएं
होती रही। जज्जगाचार्य श्रमण सघ सहित वैशाख सुदि १० को
दुगासय गाँव पहुँचे। सघ के आदेश से भ० ऋषभदेव प्रतिमा प्रति-
ष्ठित की और साचोर पधार गये। रुख नामक एक क्षुल्लक शिष्य
ने कूप प्रदेश में छाणे से वासक्षेप किया।
वीतराग प्रतिष्ठा के लिए क्षेत्र विशुद्धि की गई। श्वेत सदस
वस्त्र पर वासक्षेप, पुष्प धूपादि से तीन वार सूरि-मन्त्र अधिवासित
किया। गंगापति जल द्वारा इन्द्र-विद्या से अधिसिञ्चित कर जिनेन्द्र
का १०८ अभिषेक पूर्वक न्हवण किया। रौप्य-रत्नमय चार पूर्ण
कलशो पर चन्दन लेप और पुष्पमाला सहित एव घटिका, रत्न-
मालिका, गुच्छक, मगलदीपक आदि किए, अनेक गुड घृतपूर्ण,
इक्षुदण्ड, एक अक्षत पूर्ण घट, वस्तु रत्न-सुवर्ण-कुसुम-गधादि से
युक्त विधि विधान पूर्वक करके चैत्यवन्दनादि से आराधना की।
वैशाखी पूर्णिमा को विशाखा नक्षत्र योग मे ९ घडी ४५ पल ३५
अक्षर प्रमाण शुभ मुहूर्त मे प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई। जज्जिगसूरि ने
शक्रेन्द्र को प्रत्यक्ष किया। उसने वैश्रमण को निर्देश कर सौधर्मा-
वतंसकविमान के उत्तर पश्चिम भाग मे सहस्राणु, महाचण्ड, पूर्ण-
भद्र, मणिभद्र, चिन्तामणि प्रभृति परिवृत ब्रह्मशान्ति को आदेश
दिया। वह प्रगट प्रभावी महाबली है। नाहड़ नरेन्द्र की विनती से
यह प्रतिष्ठा दोनो चैत्यो की सुमुहूर्त मे हुई। देवेन्द्र असुरेन्द्र विद्या-
धरादि वहाँ वन्दन करते हैं। प्रथम मुहूर्त मे प्रथम प्रतिमा व
दूसरे मे सुवर्णमय प्रतिमा प्रतिष्ठित हुई। सौधर्मकल्पवासी कुवेर
यक्ष का अतुल बली ब्रह्मशान्ति महायक्ष है।
३१४ विविध तीर्थ-कल्प
श्रीपद्मनाम तीर्थङ्कर के समय भी फिर प्रभु वीर पूजनीय होगे ।
शक्रादेश से यह तीर्थ अभंग हुआ । 'महापरिज्ञा विद्या' ने गगन तल
से जाते वीर जिनालय उद्धार किया ।
उज्जयिनी मे गर्दभिल्ल द्वारा सरस्वती महत्तरा को ग्रहण करने
पर कालकाचार्य ने शको की सहायता से उसका विनाश किया ।
उसका पुत्र विक्रम हुआ, सत्यपुर मे योगीन्द्र मोहित राजा को
नवकार मन्त्र से स्वर्ण पुरुष प्राप्त हुआ । उज्जयिनी मे राज्य
करते हुए भी विक्रम वैशाखी पूर्णिमा को सांचोर आकर वीर प्रभु
के वन्दन कर भक्तिपूर्वक उत्सव मनाता था । वहाँ भी वह विद्या
सिद्ध विख्यात हुआ ।
परचक्र के द्वारा सं० ५४१ (८४५) मे वल्लभी नगरी का
भंग हुआ । वल्लभी मे ३५७ मे शिलादित्य हुआ है । अनार्य देश
के बगदादपुर के खलीफा राजा ने लाखो की सेना के साथ आकर
युद्ध किया, सन्निवेश नष्ट कर दिए । मूलस्थान से विज्जनाह,
चक्कपाणि सूलपाणि, सारगपाणि आदि ने दक्षिण दिगि की ओर
जाकर खदेड दिया, असुराधिपति भाग छूटा । वल्लभी मे आश्विन
पूर्णिमा से छ मास रहा । रत्न-माणिक्य रथ समुद्र मे प्रविष्ट हो
गए । स्वर्ण रथ श्रीमाल नगर चला गया । सम्यग्दृष्टि देव, जिने-
श्वर प्रतिमादि भी गए । विमलगिरि तीर्थ से सम्यग्दृष्टि देवों ने
निकाल दिया । चंदेरी भग्न हो गया । गिरनार के निकट कालमेह
के पास मेघनाद ने निकाल दिया । गूर्जर देश स्थित · स्वर्णप्रतिमा
दैवशक्ति से पाताल मे प्रविष्ट हो गई । अतुल बल पराक्रम से
वर्द्धमान प्रतिमा को हटाने के लिए खलीफा राजा ने प्रयत्न किया ।
अवधिज्ञान से ब्रह्मशान्ति ने ज्ञात कर प्रताडित किया, जिससे
लवणभूमि मे गिरे शेष नष्ट हो गए । उलखपुर अधिपति खुरा-
सानी दश लाख घोडे प्राप्त कर तक्षशिला का भंग किया । महावीर
तित्थकप्प का सार ३१५
तीर्थ (साचोर) से तो सम्यग्दृष्टि जोगराय ने उन्हे निकाल दिया।
स्वर्गीय देवो की सहायता से उपसर्ग दूर हुआ। तीनो प्रतिमाएँ
स्थापित की। धनद आगमन और पुष्प वृष्टि हुई।
कारशर (?) देगाधिपति ने मथुरादि मध्यप्रदेश में जाकर
राजाओ को दण्डित कर चार लाख ग्रहण किये। पर सोरठ देश
को भग्न कर सांचोर आने पर सिंह गर्जना शब्द से भयभीत होकर
भाग गया। गौड देशाधिपति ने छ मास की अवधि से पाटण पर
सात सौ करोड़ स्वर्ण दण्डित किये। ( साचोर की स्वर्ण प्रतिमा )
ज्ञातकर चैत्य को खनन करने प्रस्तुत गजपति के दल को भग्न
किया। सात दिन तक कोल दिया तो आठवे दिन भक्ति पूर्वक नम-
स्कार कर स्वस्थान को लौट गया। अनादि मिद्धायतन जाकर
वीर प्रतिमा कराके पूजी।
इसके पश्चात् दक्षिण देग के कई राजा श्रीमाल पत्तन प्रस्थित
हस्तिनापुर मे तिलग, चौड, लाट, राष्ट्र के तेजस्वी नमस्कार
करके ( गये ) फिर कन्नौज नरेन्द्र सोम संभू अर्हन्त प्रतिमाओ की
पूजा करता है। जिनशासन विरोधियो को श्री गोविन्दाचार्य ने
साचोर स्थान से 'वर्द्धमान-विद्या' द्वारा निर्द्धाडित कर दिया।
कन्नौज के स्वामी नाहड़ राय तो वैसे ही सम्यग् दृष्टि और तीर्थ
की प्रभावना करने वाले के रूप में विख्यात है।
आम राजा का पुत्र घूमराय प्रमुख अनार्यत्व प्राप्त हो गए।
बहुत आडवर से खुरासान, गजनी वाले दूषम काल के प्रभाव से
अधिक बलवान हो गए, सारा जनपद अनार्य हो गया। चोर-
डाकूओ से परिपूर्ण उपद्रव युक्त जनपद थे तो भी ( भगवान् )
स्वस्थान मे देवपूजित रहे।
फिर हस्तिनापुर से शक प्रत्यनीक प्रतिष्ठानपुर मे जिनशासन
( के विपरीत ) कृष्ण अमावस्या को होम करते थे जिसे आर्य
खपुटाचार्य ने सांचोर से उद्धार किया।
३१६ विविध तीर्थ-कल्प
विद्यासिद्ध भैरवानंद जालन्धर मे महा भैरवी विद्या से सम्य-
ग्दृष्टि श्रावको को वाणव्यंतर का उपसर्ग कराता था। बारह वर्ष
बीत गए तब चतुर्विध सघ सह आर्य सिद्ध (सेन) श्रीमाल पुर से
आकर अष्टान्हिका महिमा पूर्वक शांति उद्घोषित कर द्वार खोले।
छ मास से विद्यासिद्ध भैरवानंद को आदेशपूर्वक लाकर छोडा
वाणव्यंतर का भी निग्रह किया, फिर साचोर तीर्थ प्रभावगाली
रहा।
फिर •• नामक मुद्गर लेकर (स०) १३५० मे चैत्य मे आया
जिसे प्रभु ने निर्दाड़ित किया। वि० स० ८६० मे यक्ष ने तीन दिन
कील दिया, भयपूर्वक नमस्कार करके चला गया। दुष्ट चित्त जोग-
राय चावडा ने दहन काल मे बलहीन होकर विनय भाव से
साचोर मडन वीर प्रभु को विनय भाव से नमस्कार किया।
काशी के अधिपति महिंद्रसिंह बेताल के बल से फिर भारत मे
भ्रमण करने लगा। वह मालव और गुजरात का भग करके सांचोर
आकर उद्धार किया। यक्षराज ने अट्टहास पूर्वक अनायास
ही कुहाल को असफल कर तीर्थ विरोधी, गुजरात भग कर (शिव)
लिंगादि को गाडो मे भर कर लाने वाले को साचोर के निकट
आने पर अधा कर के करुण पुकार करा के यक्षराज ने छोडा।
अनेक प्रकार का छल प्रपंच करने वाले राजा को हजारो देवो
से परिवृत वीर ने विस्मित कर दिया, क्योकि लोकोत्तर जिन चैत्य
को विध्वंस करने के लिए (आये हुओ को) अग्नि और धुँआ
व्याप्त दिखा दिया था।
कीर्ति नगरी का स्वामी उपबल जो सूर्य भक्त था और दुष्ट
चित्त से गगन चक्र भग्न हेतु आया था, गर्जते हुए सिंह युगल
दिखा कर भगते हुए को वीर प्रभु का चरण अर्चक बना दिया।
कोल्हापुर के महा लक्ष्मी गण के सोम राजा तत्पुत्र नरसिंह
तित्थकप्प का सार ३१७
देव राजा तत्पुत्र सिंह को मारने वाले सिंह विक्रमदेव एव छत्तीस
लाख कन्नौज के परमार राजा मेघ भी तीर्थ • सांचौर के वर्द्ध-
मान तीर्थ मे कुण्डलाभरण लौटाया। • मगल तूर के गब्द
ब्रह्माण्ड व्यास देख कर गूर्जर खण्ड भूपड को दे गया ।
विक्रम के • अन्य देशाधिप जो लाख घोडो के साथ रौद्र
परिणाम वाला, गौडादि देग-तिलग देग अवगाहन कर भोगने
वाला, चारो वर्ण का विध्वसक आकाग को रेणु से आच्छादित
करता हुआ आया । यक्षराज ने उसे खदेड दिया, घोडो की पूँछ
जलने लगी । हाथी और घोडो से भी प्रभु न चले, सुभट लोग भी
असमर्थ हो गए, बैलो से थोडे सरके । अन्त मे वह प्रभु की अगुली
लेकर स्वस्थान कडमाणपुर ( ? अपने पडाव मे लौटा ) वहां घोर
अन्धकार पूर्ण रात्रि मे ब्रह्मशान्ति यक्ष ने उसे दण्ड से प्रताडित
किया । जो अगुली लेकर हम्मीर गया था, दडवत प्रणाम करता
हुआ आया और वर्द्धमान स्वामी को नमन कर अपनी अगुली
विदीर्ण करके गया । उसके पुत्र भी वैसा करते हैं । यदि न करे तो
कडमाणपुर रजस्थल हो जाय ।
श्रीमाल नगर को नाश करने के लिए जाते हुए वाराणसी और
मालवा के राजा भगवान् वर्द्धमान को आशातना करने से निविड
बंधन मे बंध गए और जोर जोर से चिल्लाने लगे । अन्त मे वे
भगवान् को नमस्कार करके लौट गए । मालवा के राजा गुजरात
के प्रत्यनीक होने पर भी साचोर प्रदेश मे शत्रुता नष्ट करके समय
बितायगे ।
दुर्लभराज ने भी श्रीमालपुर मे देवराज को माग ओर जाते
समय सांचोर मे वर्द्धमान स्वामी को नमस्कार करके गया ।
विक्रमाब्द १०२९ और १२८७ मे उत्तर मे आये अश्वपति-
वादशाहों को चारो दिशाओं से खदेड़ दिया । (बीगच्छ) १४०६-
३१८ विविध तीर्थ-कल्प
१४३२ मे मालवा का राजा पलायन करेगा । १५१८ मे अश्वपति
का भग होगा । १५७० मे उस सर्व देशो के विध्वसक को यक्षराज
ब्रह्मशांति निर्द्धाडित करेगा । इतर सर्वतीर्थों का प्रत्यनीक विरोधी
और प्रमाण न करने वाला होने पर भी भ० महावीर को पूजेगा ।
१६१९ या १९१६ मे पाटलीपुत्र नगर मे मगधराज की
चांडाल कुली रानी के यहा चैत्र वदि ८ को कल्की का जन्म होगा ।
उसी दिन मथुरा मे मधुमदन (मधु-सूदन) कृष्ण का भग होगा ।
द्वारिका मे ईश्वर लिग और श्रमणो के भात-पाणी का अपवित्रत्व
यक्ष-देवादि के प्रत्यनीक द्वारा होगा । विमल गिरि, रैवत-गिरनार,
सांचोर और मगधतीर्थ सम्यक् दृष्टि देवो के प्रभाव से अभग रहेगे
और पूजित अर्चित होगे ।
कल्कि अपने पापानुबन्धी पुण्य के उदय से आर्य-अनार्यो को
साध करके पाटलिपुत्र मे ३६ वर्ष एकछत्र राज्य करेगा । वह
सभी दर्शनो का विरोधी, उत्पीडक और लोभी-सग्रहशील होगा ।
अर्हत्-प्रवचन की निष्कारण शत्रुता से शक्रेन्द्र की सभा मे कुण्डल
चलित होगे । सर्वायु ८४ वर्ष चैत्र सुदी ८ को भस्म राशि पर्यन्त
रहेगा । गाय रूप मे भीति करेगी ।
राजा डमर दलित नाममात्र के गाव रहेगे । फिर वह घूमता
हुआ नद के निधान स्तूपो को खुदवा कर प्राप्त करेगा । साधुओ से
भिक्षा का भाग मागने आदि पापो की वृद्धि के कारण प्रतिपदा-
चार्य के काउसग्ग द्वारा शक्रेन्द्र आकर कल्कि को दण्डित करेगा ।
उसका सम्यग्दृष्टि पुत्र दत्त राजा होकर .जिनशासन की प्रभावना
करेगा । प्रतिदिन नया जिनचैत्य बनवावेगा । सर्वतीर्थों मे प्रभाव-
शाली वर्द्धमान साचोर तीर्थ होगा । बहुत से मिथ्यादृष्टि भी धर्म
के महत्त्व को समझेगे, जिनेश्वर व साधुओ के भक्त होकर पूजा
करेगे ।
तित्थकप्प का सार ३१९
दत्त महाराजा आदिजिन भुवन मडित करावेगा । उसके
समय मे स्वर्ण जटित आभरण युक्त हेममय जिनप्रतिमा प्रगट
होगी व पूजित भी होगी । वीर जिनेन्द्र के तीर्थ साचोर मे धर्म
मुकुट दश श्रेष्ठी होगे, जो आठ चैत्य तीर्थायतन विख्यात होगे,
जीर्णोद्धार करेगे । २०५४ मे नौ व्यक्तियो के सहकार से विवर्ण
तीर्थ को शुद्ध सौष्ठवपूर्ण करेगा । विमलदत्त व चारुदत्त भी वैसा
करेंगे । दत्त का पुत्र जितशत्रु होगा, वह भी नियम पूर्वक इस
तीर्थ का पोषण करेगा । इस प्रकार साचोर मे वीर जिनेन्द्र की
नियम भक्ति होगी ।
८१९ वर्ष व्यतीत होने पर मगधाधिप इस प्रदेश मे पूजा भक्ति
करेगा । २१६० मे पाटलिपुत्र मे पद्म नामक राजा एकचित्त होकर
इसकी अर्चना करेगा । वह यहाँ दुष्टो को शान्त करेगा । ४ हजार
वर्ष बीत जाने पर जितशत्रु राजा भो दुष्टों को दण्ड देगा और
यक्ष के द्वारा सब देशो मे उन्हे शीघ्र प्रताड़ित करेगा । १२ हजार
वर्ष बीत जाने पर सुवृद्धि होने पर आपणपन्ने पाणपन्ने आदि
जभक देवो द्वारा प्रातिहार्य रचना की जाने पर नित्य मगल गान
होगे । प्रतिदिन महोत्सव होगे ।
उत्सर्पिणी काल चक्र के दुषम सुषमा काल बीत जाने पर
तथा दुषम काल व्यतीत हो जाने पर सुषम दुषम काल आने पर
श्री पद्मनाम तीर्थंकर के तीर्थ मे सम्यग्दृष्टि देवो के अभियोग से
धर्म प्रवृत्ति होगी । विशेषत पुडल तीर्थ मे धर्म का उच्छेद होगा ।
वहाँ अनार्यों की पूजा होगी । अनार्य तीर्थ हो जाने पर भी मिथ्या
दृष्टि इसे वन्दन-नमस्कार कर के जाएगे । सम्यग्दृष्टि यक्ष के
द्वारा उत्कृष्ट पूजा होगी । तीर्थेश्वर सोमनाण (?) के निर्वाण के
वाद तीर्थ विच्छेद हो जायगा । अनार्यो की पूजा होगी । मुव्रत
तीर्थंकर अमम तीर्थंकर के समय सुख पूर्वक पूजित होगे । किन्तु
इन सब से वर्द्धमान स्वामी का प्रभुत्व विशेष होगा ।
३२० विविध तीर्थ-कल्प
यह सुन कर नाहड़ राजा अत्यन्त हर्षित होकर अपने स्थान
पर गया । तब से वह त्रिकाल पूजा परायण रहने लगा । अन्य
तीर्थों की भी वह यात्रा करता था । जिनशासन प्रभावक नाहड
अन्तिम समय श्री गुणसुन्दर सूरि के समक्ष अनशन करके तीर्थ
के माहात्म्य से मुक्ति पद पावेगा । यह प्रथमानुयोग के अन्तर्गत
है। इस प्रकार सोलहवाँ अध्ययन पूर्ण हुआ ।
विशेष नामसूची
( मूल तीर्थ कल्प के अनुवाद मात्र की )
- अ -
अकंपित(गणधर) ७२,१७०,१७१
अग्गहार ( ग्राम ) ११४
अग्निभूति (गणधर) १६९,१७१
अग्निवेश्यायन ( गोत्र ) १७०
अगपि १४९
अगकुमार ६०
अग (जनपद, देश) ५७,१४६,६०
अगदिका १९३
अंगवीर १६३
अगारक (तापस) १६७
अचल (ठक्कुर) २१३
अचलभ्राता (गणधर) ५३,१७०;
१७१
अचल सार्थवाह १५५
अचलेश्वर ३५
अजयदेव (राजा) ११५
अजयदेव (साहु) २१६
अजाहरा १९४,२४३
अजित (जिन) ३,८,५३,२०६
२१
अजित शान्ति स्तव ३
अजितनाथ आयतन ३
अजित (भावी बलदेव) ९४
अजित (सघपति) १९
अजितसेनाचार्य १६१
अर्जुन (पांडव) ८७
अर्जुनदेव (वाघेला राजा) ११५
अष्टापद (गिरितीर्थ) २१,२७,
५४,२०४,२०८,२११,२३७
अस्थि ग्राम ७७
अणहिल्ल (गोपालक) ११५
अणहिलवाड पाटणपुर २०,११३,
१२१,१७४,१७७
अणही १८३
अणतजिन ५३,२०४,१९४
अनतवीर्य ९४
अतनुवुक्क (सलार) १२१
अतिमुक्त (केवली) १
अतिबल (भावी वासुदेव) ९४
अतिभद्रा १७०
अन्निकापुत्र ४२,१५१
३२२ विविध तीर्थ-कल्प
अन्निकापुत्र(आचार्य) १५१,१५२ अरनाथजिन ६०,१७८,१७०,१९४
अनुपमा सर ८ अरिष्ट (भावी चक्रवर्ती) ९४
अनुपमा देवी १८० अरिष्टनेमि ११३,११४,११५,
अन्तरिक्ष पार्श्वनाथ १९५,२३६ १९२
आन्ध्रदेश २२१ अरुणा (नदी) ११७
अपराजित (प्रतिवासुदेव) ९४ अर्कस्थल ९
अभयकुमार ५१ अर्बुद कल्प ३६
अभयकीर्त्ति १२९ अर्बुदगिरि (आबू) ३३,३५,३६,
अभयदेवसूरि (हर्षपुरीय) १०५ १८१
अभयदेवसूरि (नवांगी अल्लविय (वंग) १०३
वृत्तिकार) २७,२९,२३८,२३९ अल्लाउद्दीन (सुलतान) ६७,६८,
अभया (रानी) १८४,१५६ ११५,१५९
अभिनंदन (जिन) २४,१७, अल्लावपुर २१५
१२८,२०४ अवन्ती [देश] ६०,१२७
अमम ९३ अवन्ती (नगर,पति) १३०,१३१,
अमर ९४ १८९
अमलवाहन ९४ अवलोकन (शिखर) ११,२१,
अमृत गंगा १६३ १४,१८
अबड मन्त्री ४९ अशोकचन्द्र १४७
अवा, अविका (कोहडी), अशोकश्री (मौर्य) १५५
अविणि १५,४१,१६,६५,३१, अश्वमित्र ७२,११२
६१,१०७,११५,१२५,१९१, अश्वसेन (राजा) ५१,१६२
२१२,२१७,२४४,२४५, अश्वावबोध (तीर्थ) ४४,४६,४९
२३६,२४८ अष्टापद गिरि ५,७,१४,६८,
अविकाश्रम १८ ६९,७०,५४,७१,१४९,
अयोध्या (नगरी) ४,५३,२०५, १८३,१९५
१६५,१९३,१९४,१२६ अष्टोत्तरशत कूट १
असिकुण्ड (तीर्थ) ४१
विशेष नामसूची ३२३
असि नदी १६१
अहिछत्रा (तीर्थ) ३०, ३२, १३४,
२४३
—आ—
आदीश्वर २, ६, ५४, ६०, १५४
आदिनाथ १९२, ३२, २१२
आदित्ययशा ३, २०९
आगरा नगर २१७
आणंद ९३
आत्रेय १०७
आवा (मठपति) १०९
आवुरिणी (गाव) १९३
आम (राजा) ४१
आचारांग २४०
आमरकुंड २२१, २२३, २२४
आर्यरक्षित (सूरि) ४२, १५७
आलर्भिका ७७
आलोचन तीर्थ ५०
आश्रमपदोद्यान १६२
आसधर सेठ १७६
आसराज ठक्कुर १७९
आसराज पोरवाड २०
आसराज विहार २१
आसावल्ली ६७
आसा नगर १०३
—इ—
इक्ष्वाकु कुल ७, ७४, १११, १२७,
१६२, १६५
इक्ष्वाकु भूमि ५३
इन्द्रदत्त (उपाध्याय) १६०
इन्द्रदत्त (पुरोहित) ४२
इन्द्रभूति गणधर ७७, १६१, १७३
इन्द्र व्याकरण ७७
इन्द्र शर्मा ६५
—ई—
ईश्वर राजा ५९
ईश्वरपल्लीवाल १२०
ईसरोड़ा (गाव) २०२
ईसान (देवलोक) ४८
—उ—
उग्रसेनगढ २१
उग्रसेन ( राजा ) ४५
उज्जयत कल्प १९
उज्जयत १३, २२, १९२, २४३
उज्जयिनी १६, १७, १८, १९, ५२,
९८, २०२
उज्जैन १३१, २००, २४३
उत्तर मथुरा १५०
उत्तरापथ १३४, १९२
उत्तरा ( वापी ) ३१
३२४ विविध तीर्थ-कल्प
उदयन (मंत्री) ४९
उदयन ( वत्स देशाधिप ) ५२
उदय ( भावी तीर्थंकर ) ९३
उदायी ९३
उदायी ( राजा ) १५०, १५५
उद्दण्ड विहार १९२
उपकोशा ( वेश्या ) १५५
उमास्वाति १५६
उरगल ( नगर ) २२१
उल्लू खान ६७
उशीनर ( राजा ) १६५
-ऋ-
ऋषभदेव १, २, ३, १४, ५३, ५४,
४१, ६०, ६८, ६९, १९२, १९३, २०४
१२३, २०५, २०६, २०८, २११,
२२५, २२९, २३१, २०१, २००
ऋजु वालुका ( नदी ) ७७
ऋषभकूट ३, ८, १९
ऋषभदत्त ७६
ऋषभपुर ५०
ऋषभसेन २
ऋषभ ( शाश्वत ) १०८
ऋषभ ( प्रतिमा ) ३५
-ए-
एक शिलापत्तन् २२१
एणा १५५
-ऐ-
ऐरावण गज २१
-ओ-
ओकार पर्वत १९४
ओसवाल २४०
ओसिया १९५
-क-
कल्कि ३, ८, १०, ११, ९३, १५६
कनकपुर ७२
कनक राजा ७२
कनक सुंदरी ४३
कर्ण ८७, ९४, १४७
कन्नौज ६२, ११३, १८०,
कर्ण ( १ ) ११५,
कर्णदेव ११५
कन्नाणय(पुर) १०१, १०२, १०५,
१०६
कृष्ण ७, ११, १५, २४, ४१, ९३, ११३
कृष्णर्षि ३१
कदब ( गिरि ) १
कन्नड देश २३२
कन्नाणय महावीर कल्प २१३,
२१९
कपर्दि (यक्ष) १, ७, २१, १०७, १२५
कपाट ११