विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतित्थकप्प का सार ३१५
तीर्थ (साचोर) से तो सम्यग्दृष्टि जोगराय ने उन्हे निकाल दिया।
स्वर्गीय देवो की सहायता से उपसर्ग दूर हुआ। तीनो प्रतिमाएँ
स्थापित की। धनद आगमन और पुष्प वृष्टि हुई।
कारशर (?) देगाधिपति ने मथुरादि मध्यप्रदेश में जाकर
राजाओ को दण्डित कर चार लाख ग्रहण किये। पर सोरठ देश
को भग्न कर सांचोर आने पर सिंह गर्जना शब्द से भयभीत होकर
भाग गया। गौड देशाधिपति ने छ मास की अवधि से पाटण पर
सात सौ करोड़ स्वर्ण दण्डित किये। ( साचोर की स्वर्ण प्रतिमा )
ज्ञातकर चैत्य को खनन करने प्रस्तुत गजपति के दल को भग्न
किया। सात दिन तक कोल दिया तो आठवे दिन भक्ति पूर्वक नम-
स्कार कर स्वस्थान को लौट गया। अनादि मिद्धायतन जाकर
वीर प्रतिमा कराके पूजी।
इसके पश्चात् दक्षिण देग के कई राजा श्रीमाल पत्तन प्रस्थित
हस्तिनापुर मे तिलग, चौड, लाट, राष्ट्र के तेजस्वी नमस्कार
करके ( गये ) फिर कन्नौज नरेन्द्र सोम संभू अर्हन्त प्रतिमाओ की
पूजा करता है। जिनशासन विरोधियो को श्री गोविन्दाचार्य ने
साचोर स्थान से 'वर्द्धमान-विद्या' द्वारा निर्द्धाडित कर दिया।
कन्नौज के स्वामी नाहड़ राय तो वैसे ही सम्यग् दृष्टि और तीर्थ
की प्रभावना करने वाले के रूप में विख्यात है।
आम राजा का पुत्र घूमराय प्रमुख अनार्यत्व प्राप्त हो गए।
बहुत आडवर से खुरासान, गजनी वाले दूषम काल के प्रभाव से
अधिक बलवान हो गए, सारा जनपद अनार्य हो गया। चोर-
डाकूओ से परिपूर्ण उपद्रव युक्त जनपद थे तो भी ( भगवान् )
स्वस्थान मे देवपूजित रहे।
फिर हस्तिनापुर से शक प्रत्यनीक प्रतिष्ठानपुर मे जिनशासन
( के विपरीत ) कृष्ण अमावस्या को होम करते थे जिसे आर्य
खपुटाचार्य ने सांचोर से उद्धार किया।