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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 388

[Page Header] तित्थकप्प का सार ३०५

इक्कीस हजार वर्ष वाद १००० धनुष ऊँचा गिरिराज रहेगा और
अणपत्री-पणपत्री देव चिरकाल पूजा करेंगे। यह पुंडरीक अध्ययन है।
यह विमलगिरि शाश्वत सिद्ध क्षेत्र है। इसका नाम सिद्ध
तीर्थ, भगीरथ, पुंडरीक, शत्रुञ्जयादि अनेक नाम अवसर्पिणी मे
है। यहाँ ५ कोडि से पुंडरीक, दो-दो कोड़ि से नमि विनमि,
८ कोड़ि से द्राविड-वारिखिल्ल, १० कोडी से भरत, सागर प्रमुख,
असख्य कोडा कोडी से, हरिवंग के असख्य कोडा कोडी राम-
सुग्रीव-विभीषणादि २० कोडी, वाली पाँच लाख से, सेलगाचार्य
सिद्ध हुए। साम्व प्रद्युम्नकोडी से, राजमति प्रमुख ९ करोड ७
लाख सात सौं यादव उज्ज्वलगिरि से सिद्ध हुए। इस प्रकार दिव्य

  • प्रभाव वाला पूंडरीक तीर्थ उज्ज्वल शिखर है।
    पुंडरीक अध्ययन का छट्ठा उद्देश पूर्ण हुआ।
    अश्वावबोध भृगुपुर तीर्थ .
    दक्षिण के नर्मदा प्रदेश के श्रीपुर मे पहले अजितनाथ तीर्थंकर
    समौसरे। चातुर्मास करने से तीर्थ हुआ। फिर सरस्वती पीठ मे
    चन्द्रपुर है जहाँ चन्द्रप्रभ तीर्थ हुआ।
    फिर भृगुपुर (भरौंच) के राजा जितशत्रु के अश्वरत्न को
    हनन करने के लिए नर्मदा मे स्नान कराया गया, वह जाति स्मरण
    से आर्त्तध्यान करने लगा। उसकी अनुकंपा वश भगवान् मुनिसुव्रत
    स्वामी प्रतिष्ठानपुर से चलकर माघ सुदी १ को भरौंच के
    कोरिंट वन मे सहकार वृक्ष के नीचे समौसरे। भगवान् ने अश्व
    और जितशत्रु राजा का पूर्वभव तथा अपना सबध वतलाकर
    प्रतिवोध दिया। अश्वरत्न अनशन करके सात अहोरात्र वाद मर
    के महर्द्धिक देव हुआ। उसने प्रत्यक्ष होकर तेरह कोटि उज्ज्वल
    रत्नो की वृष्टि की, सारा नगर प्रतिबोध पाया। स्वर्ण-रत्न मणि
    विभूपित हजार स्तभो वाला मुनिसुव्रत स्वामी का चैत्य निर्माण
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