विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकराया। माघी पूर्णिमा को स्थापना हुई। उस समय तीन करोड़
पाँच लाख मनुष्य प्रतिबोध पाये। जितशत्रु ने माघ सुदी १५ को
अपरान्ह में लेप्यमय प्रतिमा स्थापित की जिसका रक्षक शक्र है।
राजा अनशन पूर्वक नवहल्लपत्तन मे विद्याधर रूप मे उत्पन्न
हुआ। अजित अपराजित सह् रैवतगिरिशिखर पर विम्ब स्थापना
की। केवली होकर सिद्ध हुआ। अन्य भी स्नानादि करते हुए
क्रमशः सिद्ध हुए।
अश्वदेव जो इन्द्र का सामानिक देव हुआ, प्रतिदिन तीर्थ
प्रभावना करने लगा। भृगुपुर महातीर्थ हो गया। स्वामी के
निर्वाण के बारह हजार वर्ष पश्चात् अश्वावबोध तीर्थ का पद्मचक्री
ने, फिर हरिषेण चक्री ने उद्धार किया। कृष्ण-बलदेव नरेन्द्र व
ईश्वर सार्थवाह भी उद्धार कराया। इक्ष्वाकु वंशी दशरथ राम
आदि तथा हरिवंश के दशार यादव प्रतिवर्ष उद्धार करते थे।
बारह हजार के परिवार से सूर राजा तथा तीन लाख से परिवृत
पाडु राजा सिद्ध हुए। भ० अरिष्टनेमि भी यहाँ समवसरे। द्वारिका-
दाह के समय प्रत्यासन्न जलधि मे मूर्च्छागत हरिवंशोद्भव का
उद्धार हुआ।
ग्यारह लाख (छ सौ) चौरासी हजार दो सौ वर्ष बाद अश्वाव-
बोध क्षेत्र मे भाद्रव महीने मे सात अहोरात्रवर्ती वर्षा हुई, जिसमे
रक्षा के लिए उड़ती हुई एक शकुनिका बाण विद्ध होकर गिरी।
श्रमण चारुचन्द्र ने नवकार मंत्र सुनाकर चैत्य के आगे रख दी।
दो प्रहर के पश्चात् वह मर के सिंहलद्वीप के राजा विजयबाहु की
रानी सुमंगला के यहाँ 'सुदर्शना कुमारी' रूप मे जन्मी। यौवन
प्राप्त होने पर स्वयंवर की आयोजना हुई, बहुत से राजा आये।
भृगुपुर के सार्थवाह के "णमो अरिहंताणं" शब्दोच्चारण से राज-
कुमारी मूच्छित होकर जातिस्मरण को प्राप्त हुई। राजकुमारी