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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 400, कुल 442 में से

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पृष्ठ 400

तित्थकप्प का सार ३१७
देव राजा तत्पुत्र सिंह को मारने वाले सिंह विक्रमदेव एव छत्तीस
लाख कन्नौज के परमार राजा मेघ भी तीर्थ • सांचौर के वर्द्ध-
मान तीर्थ मे कुण्डलाभरण लौटाया। • मगल तूर के गब्द
ब्रह्माण्ड व्यास देख कर गूर्जर खण्ड भूपड को दे गया ।
विक्रम के • अन्य देशाधिप जो लाख घोडो के साथ रौद्र
परिणाम वाला, गौडादि देग-तिलग देग अवगाहन कर भोगने
वाला, चारो वर्ण का विध्वसक आकाग को रेणु से आच्छादित
करता हुआ आया । यक्षराज ने उसे खदेड दिया, घोडो की पूँछ
जलने लगी । हाथी और घोडो से भी प्रभु न चले, सुभट लोग भी
असमर्थ हो गए, बैलो से थोडे सरके । अन्त मे वह प्रभु की अगुली
लेकर स्वस्थान कडमाणपुर ( ? अपने पडाव मे लौटा ) वहां घोर
अन्धकार पूर्ण रात्रि मे ब्रह्मशान्ति यक्ष ने उसे दण्ड से प्रताडित
किया । जो अगुली लेकर हम्मीर गया था, दडवत प्रणाम करता
हुआ आया और वर्द्धमान स्वामी को नमन कर अपनी अगुली
विदीर्ण करके गया । उसके पुत्र भी वैसा करते हैं । यदि न करे तो
कडमाणपुर रजस्थल हो जाय ।
श्रीमाल नगर को नाश करने के लिए जाते हुए वाराणसी और
मालवा के राजा भगवान् वर्द्धमान को आशातना करने से निविड
बंधन मे बंध गए और जोर जोर से चिल्लाने लगे । अन्त मे वे
भगवान् को नमस्कार करके लौट गए । मालवा के राजा गुजरात
के प्रत्यनीक होने पर भी साचोर प्रदेश मे शत्रुता नष्ट करके समय
बितायगे ।
दुर्लभराज ने भी श्रीमालपुर मे देवराज को माग ओर जाते
समय सांचोर मे वर्द्धमान स्वामी को नमस्कार करके गया ।
विक्रमाब्द १०२९ और १२८७ मे उत्तर मे आये अश्वपति-
वादशाहों को चारो दिशाओं से खदेड़ दिया । (बीगच्छ) १४०६-