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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 393

३१० विविध तीर्थ-कल्प
उस काल उस समय मे भगवान् चन्द्रप्रभ चंदेरी मे समवसरे।
लवणाधिपति ने उस स्थान पर सयमचद गजा के लिए तिलकपुर
नगर बसाया । यह बारह योजन विस्तृत था । अरिहदत्त गणधर
कोटि परिवृत माघ वदि १४ को निर्वाण प्राप्त हुए, जिससे शिवरात्रि
प्रसिद्ध हुई। चन्द्रविमानोद्योत से चन्द्रप्रभास कहलाया । त्रिभुवन
स्वामिनी देवी ने इस सिद्ध क्षेत्र पर भगवान् की प्रतिमा स्थापित
की। यहाँ पशु-पक्षी आदि के भी कर्म निर्जरा होती है । रामचन्द्रजी
ने यहाँ चातुर्मास किया, सीताविहार हुआ । रावण कैलाश पर
चैत्य वदना करके त्रिभुवनस्वामिनी से चन्द्रप्रभ प्रभु की अमृतलिंग
प्रतिमा प्राप्त कर लाया और यहाँ विराजमान की। यही कालक्रम
से ज्योतिर्लिंग प्रसिद्ध हुआ ।
भगवान् नेमिनाथ का समवसरण होने से यादवो का विद्याधरों
का प्रिय मिलन हुआ । पांडव भी समुद्र-सरस्वती तट पर विद्या
सिद्ध बारह वर्ष रहे । केवलज्ञान स्थान ब्रह्मकुंड समवशरण, चंद्र-
मूर्य-राहु योगस्थान विद्यासिद्धि स्थान है। दुषमानुभाव से
ज्योतिलिंग कुतीर्थिको ने ग्रहण कर लिया । यह चन्द्रप्रभास
अध्ययन हुआ ।
उस काल उस समय मे भगवान् चन्द्रप्रभ दक्षिणापथ मे विच-
रते हुए कलव वन मे समवसरे । नासिकपुर से राजा गोवर्द्धन
वदनार्थ आया। हे गौतम ! उस देव-मनुष्यो की सभा मे एक गाय
ने आकर अपना पूर्व कर्म पूछा । भगवान् ने कहा—एक कागिणी
का ऋण जो तुमने करके नौ भव पूर्व तिर्यंच गंथी बाँधी थी, उसी
ऋण से दासत्व, भिखारीपना और तिर्यंचपना प्राप्त होता है।
प्रतिबोध पाकर वह १८ दिनो के अनशन से वैमानिक देव हुई ।
राजा भी निष्क्रमण करके ब्रह्मेन्द्र हुआ । वह उस समय जहाँ
क्रीडा करता था, ब्रह्मगिरि पर वनवाई हुई जीवितस्वामी की
रत्नमय प्रतिमा थी, जहाँ गाय अमृत झरती थी। क्रमश अजना