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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 394, कुल 442 में से

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पृष्ठ 394

तित्थकप्प का सार ३११
ने आराधना की, जीर्णोद्धार हुआ । राम, लक्ष्मण, सीता ने चार
वर्ष आराधना की । हस्तिनापुर मे पुत्रार्थ अग्नि प्रवेश करते कुती
को नारद मुनि ने पूर्वभव बतलाया, उपवास पूर्वक आराधना से
धर्मपुत्र युधिष्ठिर जन्मा । शील प्रभाव से सदा पूजा की, पाण्डवो
ने वारहवे वर्ष जीर्णोद्धार किया । ज्वालामालिनी शासन देवी हुई ।
श्रमण सघ ने प्रतिष्ठा की तब से दिनोदिन जीवित स्वामी प्रतिमा
का माहात्म्य बढा, अनेक उद्धार हुए । चक्रवर्ती बलदेव वासुदेवो
से पूजित प्रतिमा और चैत्य का उद्धार हरिवश द्वारा हुआ । चेडा
महाराजा ने भी उद्धार कराया ।
कृष्णदेव के प्राप्त कर बीस हजार वर्ष व्यतिक्रान्त होने पर
चन्द्रप्रभु प्रतिमा को देवी अपने भवन मे ग्रहण करेगी । करोड़
अडसठ लाख छब्बीस हजार वर्ष यह तीर्थ विद्याधर-चक्रवाल पूजा
हेतु विजययक्ष पूजित तीर्थ का उद्देश है ।
उस काल उस समय मे दक्षिण खण्ड मे पूर्ण नाटक द्वीप में
चन्देरीपुर मे चन्द्रप्रभ स्वामी जीवितस्वामीकी शक्र प्रतिष्ठित
प्रतिमा सूर्य जैसी तेजस्वी अमृत वर्षाने वाली, देवपूज्य अठारह
हजार वर्ष रहेगी, फिर भुवनपति देवो द्वारा पूजी जायगी । चन्द्रा-
वती उद्देश हुआ ।
जिस समय लंका मे मन्दोदरी अष्टमपूर्वक प्रौषध व्रत मे रही
तो तीसरे दिन त्रिभुवन स्वामिनी ने अपनी चन्द्रप्रभ प्रतिमा दी ।
कालक्रम से अयोध्या मे लाकर सीता ने पूजी, फिर देवताओ ने
ग्रहण कर ली । फिर पण्डुमधुरा मे पाण्डवो के मासक्षमण करने
पर त्रिभुवन स्वामिनी ने उन्हे दी जिसे पट्टण मे स्थापित की वही
सोलह हजार वर्ष बीतने पर यक्षराज पूजेगा ।
नाहड़-साचोर तीर्थ
एक बार कन्नौज देश-हस्तिनापुर मे श्री आर्य महागिरि सम-