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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 395

३१० विविध तीर्थ-कल्प
वसरे। गुरुमहाराज ने किसी विवर्ण देहवाले भिखारी की ओर
वारंवार देखा तो देवनन्दि सेठ ने समझ लिया कि अवश्य ही यह
प्रभावक होगा। अत उसे अपने घर पर लाकर रख लिया। पूछने
पर जान हुआ कि यह जितशत्रु-नन्दन नाहड है। क्रमशः तरुण,
हुआ, दुविनीत होने से कुछ नहीं सीखता पर केवल नवकार मन्त्र
ग्रहण किया। उस प्रदेश में एक सिद्धयोगीन्द्र सौ योगियों के साथ
आया। उसने विद्या सिद्ध करने के हेतु नाहड़ को अपने वश में
कर रात्रि के समय श्मशान में बुलाया। मृतक व वेताल के प्रयोग
से मुझे मार कर स्वर्ण पुरुष बनाने में योगी सचेष्ट है, ऐसा ज्ञात
कर "णमो अरिहंताणं" का जाप किया और परिव्राजक को ही
अग्निकुण्ड में फेंक दिया जिससे 'स्वर्णपुरुष' सिद्ध हो गया। उस
नगरी का राजा यशोवर्म अपुत्रिया मर गया था जिनके उत्तरा-
धिकारी नियुक्त करने के लिए पंच दिवा प्रगट हुआ और नाहड़
राज्याभिषिक्त हो गया। आकाशवाणी घोषणा भी हो गई जिससे
दुष्ट जन अधीन हो गए। उसी दिन जातिस्मृति प्राप्त कर सार्थ-
वाह-पिता के साथ वाराणसी जाकर आर्य महागिरि गुरु को वन्दन
किया। उपदेश से प्रतिबोध पाया। विहार भूमि विस्तृत हुई।
वर्द्धमान तीर्थ की स्थापना के हेतु नैमित्तिक लोगों को भेजा
गया। वे भूमि परीक्षा के लिए ग्रामानुग्राम देखते हुए छ मास में
मरुदेश पहुँचे। सच्चउर पट्टण पहुँचे, जहाँ चन्द्रप्रभ स्वामी के
समवसरण होने से पवित्रित तीर्थभूमि थी। भगवान् वर्द्धमान
स्वामी की जीवित स्वामी प्रतिमा स्थापनार्थ परीक्षित भूमि पर
खात मुहूर्त्त किया गया।
उस नगरी में जोगराय मडलिक था, महाराजा नाहड़ के
निर्देश से अनुमति प्राप्त कर सूत्रधारों को नियुक्त कर दो चैत्य
बनवाये। भगवान् महावीर की और ब्रह्मशान्ति यक्ष की स्वर्णमय-
पित्तलमय प्रतिमाएं ब्रह्मचारी सूत्रधारों द्वारा निर्मित हुईं। आर्य