विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतित्थकप्प का सार ३१९
दत्त महाराजा आदिजिन भुवन मडित करावेगा । उसके
समय मे स्वर्ण जटित आभरण युक्त हेममय जिनप्रतिमा प्रगट
होगी व पूजित भी होगी । वीर जिनेन्द्र के तीर्थ साचोर मे धर्म
मुकुट दश श्रेष्ठी होगे, जो आठ चैत्य तीर्थायतन विख्यात होगे,
जीर्णोद्धार करेगे । २०५४ मे नौ व्यक्तियो के सहकार से विवर्ण
तीर्थ को शुद्ध सौष्ठवपूर्ण करेगा । विमलदत्त व चारुदत्त भी वैसा
करेंगे । दत्त का पुत्र जितशत्रु होगा, वह भी नियम पूर्वक इस
तीर्थ का पोषण करेगा । इस प्रकार साचोर मे वीर जिनेन्द्र की
नियम भक्ति होगी ।
८१९ वर्ष व्यतीत होने पर मगधाधिप इस प्रदेश मे पूजा भक्ति
करेगा । २१६० मे पाटलिपुत्र मे पद्म नामक राजा एकचित्त होकर
इसकी अर्चना करेगा । वह यहाँ दुष्टो को शान्त करेगा । ४ हजार
वर्ष बीत जाने पर जितशत्रु राजा भो दुष्टों को दण्ड देगा और
यक्ष के द्वारा सब देशो मे उन्हे शीघ्र प्रताड़ित करेगा । १२ हजार
वर्ष बीत जाने पर सुवृद्धि होने पर आपणपन्ने पाणपन्ने आदि
जभक देवो द्वारा प्रातिहार्य रचना की जाने पर नित्य मगल गान
होगे । प्रतिदिन महोत्सव होगे ।
उत्सर्पिणी काल चक्र के दुषम सुषमा काल बीत जाने पर
तथा दुषम काल व्यतीत हो जाने पर सुषम दुषम काल आने पर
श्री पद्मनाम तीर्थंकर के तीर्थ मे सम्यग्दृष्टि देवो के अभियोग से
धर्म प्रवृत्ति होगी । विशेषत पुडल तीर्थ मे धर्म का उच्छेद होगा ।
वहाँ अनार्यों की पूजा होगी । अनार्य तीर्थ हो जाने पर भी मिथ्या
दृष्टि इसे वन्दन-नमस्कार कर के जाएगे । सम्यग्दृष्टि यक्ष के
द्वारा उत्कृष्ट पूजा होगी । तीर्थेश्वर सोमनाण (?) के निर्वाण के
वाद तीर्थ विच्छेद हो जायगा । अनार्यो की पूजा होगी । मुव्रत
तीर्थंकर अमम तीर्थंकर के समय सुख पूर्वक पूजित होगे । किन्तु
इन सब से वर्द्धमान स्वामी का प्रभुत्व विशेष होगा ।