विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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विद्यासिद्ध भैरवानंद जालन्धर मे महा भैरवी विद्या से सम्य-
ग्दृष्टि श्रावको को वाणव्यंतर का उपसर्ग कराता था। बारह वर्ष
बीत गए तब चतुर्विध सघ सह आर्य सिद्ध (सेन) श्रीमाल पुर से
आकर अष्टान्हिका महिमा पूर्वक शांति उद्घोषित कर द्वार खोले।
छ मास से विद्यासिद्ध भैरवानंद को आदेशपूर्वक लाकर छोडा
वाणव्यंतर का भी निग्रह किया, फिर साचोर तीर्थ प्रभावगाली
रहा।
फिर •• नामक मुद्गर लेकर (स०) १३५० मे चैत्य मे आया
जिसे प्रभु ने निर्दाड़ित किया। वि० स० ८६० मे यक्ष ने तीन दिन
कील दिया, भयपूर्वक नमस्कार करके चला गया। दुष्ट चित्त जोग-
राय चावडा ने दहन काल मे बलहीन होकर विनय भाव से
साचोर मडन वीर प्रभु को विनय भाव से नमस्कार किया।
काशी के अधिपति महिंद्रसिंह बेताल के बल से फिर भारत मे
भ्रमण करने लगा। वह मालव और गुजरात का भग करके सांचोर
आकर उद्धार किया। यक्षराज ने अट्टहास पूर्वक अनायास
ही कुहाल को असफल कर तीर्थ विरोधी, गुजरात भग कर (शिव)
लिंगादि को गाडो मे भर कर लाने वाले को साचोर के निकट
आने पर अधा कर के करुण पुकार करा के यक्षराज ने छोडा।
अनेक प्रकार का छल प्रपंच करने वाले राजा को हजारो देवो
से परिवृत वीर ने विस्मित कर दिया, क्योकि लोकोत्तर जिन चैत्य
को विध्वंस करने के लिए (आये हुओ को) अग्नि और धुँआ
व्याप्त दिखा दिया था।
कीर्ति नगरी का स्वामी उपबल जो सूर्य भक्त था और दुष्ट
चित्त से गगन चक्र भग्न हेतु आया था, गर्जते हुए सिंह युगल
दिखा कर भगते हुए को वीर प्रभु का चरण अर्चक बना दिया।
कोल्हापुर के महा लक्ष्मी गण के सोम राजा तत्पुत्र नरसिंह