विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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१४३२ मे मालवा का राजा पलायन करेगा । १५१८ मे अश्वपति
का भग होगा । १५७० मे उस सर्व देशो के विध्वसक को यक्षराज
ब्रह्मशांति निर्द्धाडित करेगा । इतर सर्वतीर्थों का प्रत्यनीक विरोधी
और प्रमाण न करने वाला होने पर भी भ० महावीर को पूजेगा ।
१६१९ या १९१६ मे पाटलीपुत्र नगर मे मगधराज की
चांडाल कुली रानी के यहा चैत्र वदि ८ को कल्की का जन्म होगा ।
उसी दिन मथुरा मे मधुमदन (मधु-सूदन) कृष्ण का भग होगा ।
द्वारिका मे ईश्वर लिग और श्रमणो के भात-पाणी का अपवित्रत्व
यक्ष-देवादि के प्रत्यनीक द्वारा होगा । विमल गिरि, रैवत-गिरनार,
सांचोर और मगधतीर्थ सम्यक् दृष्टि देवो के प्रभाव से अभग रहेगे
और पूजित अर्चित होगे ।
कल्कि अपने पापानुबन्धी पुण्य के उदय से आर्य-अनार्यो को
साध करके पाटलिपुत्र मे ३६ वर्ष एकछत्र राज्य करेगा । वह
सभी दर्शनो का विरोधी, उत्पीडक और लोभी-सग्रहशील होगा ।
अर्हत्-प्रवचन की निष्कारण शत्रुता से शक्रेन्द्र की सभा मे कुण्डल
चलित होगे । सर्वायु ८४ वर्ष चैत्र सुदी ८ को भस्म राशि पर्यन्त
रहेगा । गाय रूप मे भीति करेगी ।
राजा डमर दलित नाममात्र के गाव रहेगे । फिर वह घूमता
हुआ नद के निधान स्तूपो को खुदवा कर प्राप्त करेगा । साधुओ से
भिक्षा का भाग मागने आदि पापो की वृद्धि के कारण प्रतिपदा-
चार्य के काउसग्ग द्वारा शक्रेन्द्र आकर कल्कि को दण्डित करेगा ।
उसका सम्यग्दृष्टि पुत्र दत्त राजा होकर .जिनशासन की प्रभावना
करेगा । प्रतिदिन नया जिनचैत्य बनवावेगा । सर्वतीर्थों मे प्रभाव-
शाली वर्द्धमान साचोर तीर्थ होगा । बहुत से मिथ्यादृष्टि भी धर्म
के महत्त्व को समझेगे, जिनेश्वर व साधुओ के भक्त होकर पूजा
करेगे ।