सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 391, कुल 442 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 391

३०८ विविध तीर्थ-कल्प
सं० ८४५ मे वल्लभी भंग कर आते हुए अनार्यों को सुदर्शना
निवारण करेगी ।
सं० ८४० मे मल्लवादी आचार्य मिथ्यात्वी देवो का उपद्रव दूर
कर एक हजार आचार्यों सहित प्रभावना करेंगे । प्रतिष्ठानपुर का
राजा गालिवाहन उद्धार करावेगा । एवं कृष्ण, नरवाहन, शिला-
दित्य चारो राजा महोत्सव करेगे । कालकाचार्य और पादलिप्ता-
चार्य के समय सुदर्शना प्रत्यक्ष होकर नृत्यादि करेगी । इस प्रकार
११ लाख ८५ हजार ९८० वर्ष अनेक राजा सार्थवाहादि से पूजित
व्यतीत होगे ।
अंवड़, पाटलिपुत्र के दत्त कनक रत्न विभूषित करेंगे । दमघोष
जितशत्रु, सुदर्शनादि से उद्धार होगा । बारह लाख पाँच हजार से
अधिक वर्ष पूजित रहने वाले इस तीर्थ की दो हजार वर्ष बाद
नर्मदा जल कल्लोल और घोरांधकार का मिथ्यादृष्टि देवियो का
उपद्रव अश्वदेव दूर करेगा । भगवान् के अठारह हजार वर्ष बाद
मुनिसुव्रत प्रतिमा को सुदर्शना स्वस्थान ले जाकर पूजेगी । वह
आयु पूर्ण कर घातकी खंड की विजयकेतु राजा होगी फिर सर्वार्थ-
सिद्धि जाकर सर्वानुभूति तीर्थंकर (के समय मुक्त) होगी !
इस तीर्थ की बड़ी महिमा है । कल्याणक पर्वादि मे पूजा का
असंख्यगुण फल है । इस प्रकार अश्वावबोध तीर्थ के १३२ उद्धार
वज्रस्वामी ने बतलाया । पाँच हजार के परिवार से पांडुराजा
और हरिवंश के कोटि-सहस्र सिद्ध हुए ।
चंदेरी-चन्द्रप्रभास
उस काल में चन्द्रप्रभ स्वामी अनेकश चन्देरी नगरी मे समो-
सरे । ज्वालामालिनी देवी ने वहाँ सिंहकीर्ति राजा को अपने चैत्य
की प्रतिमा दी, जिसे वहाँ स्थापित की । वह चन्द्रकान्त मणि की
मणिभूषण नामक निरालंब प्रतिमा है । प्रभास यक्ष नित्य नाटक