विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतित्थकप्प का सार ३०७
सुदर्शना ने वैराग्य प्राप्त होकर अश्वावबोध तीर्थ मे श्री मुनिसुव्रत
स्वामी को वदनार्थ अभिग्रह किया। विवाह और राज्य से निष्प्रयो-
जन हो दृढप्रतिज्ञ राजकुमारी अपनी सखियो व १६ राजपुत्रो-अग-
रक्षको के साथ १८ जहाजो मे आरूढ़ होकर भृगुपुर की ओर चली।
मार्ग मे शील प्रभाव से दानवराज का हनन किया। नवकार मंत्र
का जप करते भृगुपुर पहुँच कर प्रभु के दर्शन किए। अठाईमहोत्सव-
पूर्वक अश्वदेव का आराधन किया। 'शकुनिका विहार' नामक
नया मंदिर निर्माण कराया, जो १००८ ध्वजाओ से विभूषित था।
सुदर्शना महादेवी ने वारह वर्ष तक तीर्थभक्ति करके अनशनपूर्वक
१६ विद्यादेवियो के पास हजारो देवो और बाण व्यंतरो की
स्वामिनी, जवूद्वीप प्रमाण धवलगृह मे उत्पन्न हुई।
अपना पूर्वभव स्मरण कर स्नानपूर्वक भद्रसाल, नदन वन,
पद्मद्रह से पद्मकमल और गोशीर्ष चन्दनादि ले जाकर अठाई
महोत्सव किया फिर नंदीश्वरादि मे चैत्यवन्दना कर भगवान्
महावीर को वंदन किया, नाटक किया। शक्रेन्द्र के प्रश्न पर प्रभु
ने कहा—यह शकुनिका है, तीसरे भव मे सिद्ध होगी।
आर्य सुहस्तिसूरि के शिष्य संप्रति राजा ने इसका उद्धार
कराया। कालिकाचार्य ने चातुर्मास कर उपसर्ग को दूर किया।
सिद्धसेन सूरि प्रतिबोधित विक्रम राजा ने जीर्णोद्धार कराया।
कालिकाचार्य के समय बनवायो हुई गोशीर्ष चन्दनमय सुदर्शना-
प्रतिमा को सिद्धसेन ने प्रतिष्ठापित की। यहाँ भद्रगुप्ताचार्य के
पास वज्रस्वामी ने दशपूर्व पूर्ण किये। आकाशगामिनी विद्या
(महापरिज्ञा अध्ययन से) उद्धृत की। जृंभक देवो ने महिमा की।
भगवान् ने गौतम स्वामी के पूछने पर कहा कि मेरे निर्वाण से
४८४ (वि० स० १४) मे आर्य खपुटाचार्य मिथ्यादृष्टि देवों द्वारा की
हुई रजवृष्टि बंद करेगे।