सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 392, कुल 442 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 392

तित्थकप्प का सार ३०९
पूजा आदि करता था। दश चक्रवर्ती, प्रतिवासुदेव, कृष्ण बलराम
आदि नरेन्द्रो ने इसको पूजा की। इनकी आराधना से कुन्ती के
पाँच पुत्र—पांडव हुए जिन्होने चैत्योद्धार कराया। 'सदाशिव'
कहलाये। शिवरात्रि प्रतिष्ठादिवस है। चौरासी हजार वर्ष बाद
सिद्धार्थ नरेन्द्र ने उद्धार कराया। कालसदीव व पेढालपुत्र सुव्रत
ने नित्य आराधना की। त्रैलोक्य स्वामिनी विद्या सिद्ध हुई।
भगवान् के निर्वाण के ६०० (वि० १३०) वर्ष बाद चंदेरी मे
वज्रसेन के शिष्य चन्दार्य शि० समन्तभद्र ने प्रतिष्ठा की। मिथ्या-
दृष्टियो का प्रभाव फैलने पर अतिशय से ईश्वर लिंग की प्रसिद्धि
अधिक हुई। सिंहमण्डलाधिप ने द्वार स्थापित कर सिंहासन पर
नागराज आरक्षक स्थापन किये। वसुमित्राचार्य अनशन करके
काल प्राप्त हुए। इसके बाद ग्राम्य जनों से पूजित सोमलिंग कह-
लाए। बोटिकदृष्टि वालो ने सीता विहार ग्रहण किया। शालिवाहन
को प्रतिबोध देकर पादलिप्ताचार्य ने गिरनार पर रहे दो क्षुल्लको
को नागार्जुन प्रभावित चंदेरी भेजकर बाद मे जीता। दुष्मानुभाव
से १४०० वर्ष बाद भस्मग्रह उतरने पर दत्त राजा के समय
सम्यग्दृष्टि जन के अधीन हो दस हजार वर्ष श्रमण संघ वदित रह
कर फिर रैवतगिरि शिखर पर पूजे जाएंगे, बीस हजार वर्ष
त्रिभुवन स्वामिनी मनुष्योत्तर पर्वत पर पूजेगी।
भगवान् महावीर के ज्येष्ठ भ्राता नन्दिवर्द्धन ने पित्तलमय
२२ प्रतिमाएं बनवाई। ५८१ वर्ष पश्चात् अंबादेवी ने उठाकर
चंदेरी के सिद्धमठ मे रखी। मिथ्यादृष्टि देवो ने चंद्रप्रभ प्रतिमा
को अक्षुब्ध भाव से पूजा। 'ज्वालामालिनी' आदि देवियाँ पूजन
करती हैं। विक्रम से ३७५ वर्ष अनार्यों ने तथा १०८१-१३८४-
१४२९ यावत् दस हजार वर्ष और फिर उज्ज्वल शिखर पर पूजी
जायगी। यह चतुर्दशां-पाँचवें चंदेरी अध्ययन का हुआ।