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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 396

सुहस्तीसूरि को प्रतिष्ठाहेतु प्रार्थना की गई। भगवान् महावीर के
३०० वर्ष बाद वैशाख सुदि पूर्णिमा के दिन शुभलग्न मे पच पूर्व-
घर आचार्य जज्जिगसूरि के निर्देश देकर ५०० श्रमणो के साथ
वाराणसी से भेजा। चक्री नाहड भी साचोर आया। अनेक राजा
लोग साथ में आये। मार्ग मे अभयदान, अमारि उद्घोषणाएं
होती रही। जज्जगाचार्य श्रमण सघ सहित वैशाख सुदि १० को
दुगासय गाँव पहुँचे। सघ के आदेश से भ० ऋषभदेव प्रतिमा प्रति-
ष्ठित की और साचोर पधार गये। रुख नामक एक क्षुल्लक शिष्य
ने कूप प्रदेश में छाणे से वासक्षेप किया।
वीतराग प्रतिष्ठा के लिए क्षेत्र विशुद्धि की गई। श्वेत सदस
वस्त्र पर वासक्षेप, पुष्प धूपादि से तीन वार सूरि-मन्त्र अधिवासित
किया। गंगापति जल द्वारा इन्द्र-विद्या से अधिसिञ्चित कर जिनेन्द्र
का १०८ अभिषेक पूर्वक न्हवण किया। रौप्य-रत्नमय चार पूर्ण
कलशो पर चन्दन लेप और पुष्पमाला सहित एव घटिका, रत्न-
मालिका, गुच्छक, मगलदीपक आदि किए, अनेक गुड घृतपूर्ण,
इक्षुदण्ड, एक अक्षत पूर्ण घट, वस्तु रत्न-सुवर्ण-कुसुम-गधादि से
युक्त विधि विधान पूर्वक करके चैत्यवन्दनादि से आराधना की।
वैशाखी पूर्णिमा को विशाखा नक्षत्र योग मे ९ घडी ४५ पल ३५
अक्षर प्रमाण शुभ मुहूर्त मे प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई। जज्जिगसूरि ने
शक्रेन्द्र को प्रत्यक्ष किया। उसने वैश्रमण को निर्देश कर सौधर्मा-
वतंसकविमान के उत्तर पश्चिम भाग मे सहस्राणु, महाचण्ड, पूर्ण-
भद्र, मणिभद्र, चिन्तामणि प्रभृति परिवृत ब्रह्मशान्ति को आदेश
दिया। वह प्रगट प्रभावी महाबली है। नाहड़ नरेन्द्र की विनती से
यह प्रतिष्ठा दोनो चैत्यो की सुमुहूर्त मे हुई। देवेन्द्र असुरेन्द्र विद्या-
धरादि वहाँ वन्दन करते हैं। प्रथम मुहूर्त मे प्रथम प्रतिमा व
दूसरे मे सुवर्णमय प्रतिमा प्रतिष्ठित हुई। सौधर्मकल्पवासी कुवेर
यक्ष का अतुल बली ब्रह्मशान्ति महायक्ष है।