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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 397

३१४ विविध तीर्थ-कल्प
श्रीपद्मनाम तीर्थङ्कर के समय भी फिर प्रभु वीर पूजनीय होगे ।
शक्रादेश से यह तीर्थ अभंग हुआ । 'महापरिज्ञा विद्या' ने गगन तल
से जाते वीर जिनालय उद्धार किया ।
उज्जयिनी मे गर्दभिल्ल द्वारा सरस्वती महत्तरा को ग्रहण करने
पर कालकाचार्य ने शको की सहायता से उसका विनाश किया ।
उसका पुत्र विक्रम हुआ, सत्यपुर मे योगीन्द्र मोहित राजा को
नवकार मन्त्र से स्वर्ण पुरुष प्राप्त हुआ । उज्जयिनी मे राज्य
करते हुए भी विक्रम वैशाखी पूर्णिमा को सांचोर आकर वीर प्रभु
के वन्दन कर भक्तिपूर्वक उत्सव मनाता था । वहाँ भी वह विद्या
सिद्ध विख्यात हुआ ।
परचक्र के द्वारा सं० ५४१ (८४५) मे वल्लभी नगरी का
भंग हुआ । वल्लभी मे ३५७ मे शिलादित्य हुआ है । अनार्य देश
के बगदादपुर के खलीफा राजा ने लाखो की सेना के साथ आकर
युद्ध किया, सन्निवेश नष्ट कर दिए । मूलस्थान से विज्जनाह,
चक्कपाणि सूलपाणि, सारगपाणि आदि ने दक्षिण दिगि की ओर
जाकर खदेड दिया, असुराधिपति भाग छूटा । वल्लभी मे आश्विन
पूर्णिमा से छ मास रहा । रत्न-माणिक्य रथ समुद्र मे प्रविष्ट हो
गए । स्वर्ण रथ श्रीमाल नगर चला गया । सम्यग्दृष्टि देव, जिने-
श्वर प्रतिमादि भी गए । विमलगिरि तीर्थ से सम्यग्दृष्टि देवों ने
निकाल दिया । चंदेरी भग्न हो गया । गिरनार के निकट कालमेह
के पास मेघनाद ने निकाल दिया । गूर्जर देश स्थित · स्वर्णप्रतिमा
दैवशक्ति से पाताल मे प्रविष्ट हो गई । अतुल बल पराक्रम से
वर्द्धमान प्रतिमा को हटाने के लिए खलीफा राजा ने प्रयत्न किया ।
अवधिज्ञान से ब्रह्मशान्ति ने ज्ञात कर प्रताडित किया, जिससे
लवणभूमि मे गिरे शेष नष्ट हो गए । उलखपुर अधिपति खुरा-
सानी दश लाख घोडे प्राप्त कर तक्षशिला का भंग किया । महावीर