विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
परिशिष्ट २५३
आरासण तीर्थ
पासिल नामक श्रद्धालु श्रावक द्वारा आरासण गाँव मे निर्मा-
पित और श्री देवसूरि जी के प्रतिष्ठित चैत्य अनुक्रम से तीर्थ रूप
मे प्रसिद्ध हुआ।
एक वार श्री मुनि चन्द्र गुरु के शिष्य आचार्य देवसूरि भृगुपुर
चातुर्मास स्थित थे। उस समय कान्हड नामक एक योगी क्रूर
साँपो के ८४ अरडिए ले कर वहाँ आया और कहने लगा—हे
सूरीन्द्र। मेरे साथ विवाद कीजिए नही तो इस सिंहासन का
त्याग कर दे। आचार्यश्री ने कहा—अरे मूर्ख, तुम्हारे साथ वाद
कैसा ? क्या श्वान के साथ सिंह कभी युद्ध होता है ? योगी ने
कहा—मै सर्प-क्रीडा जानता हूँ जिससे राजमहल आदि स्थानो मे
जा कर दूसरो से अधिक आभरणादि पुरस्कार प्राप्त करता हूँ।
आचार्य महाराज ने कहा— हे योगी ! हमे किसी प्रकार के वाद
करने की इच्छा नही है, क्योकि मुनि तत्त्वज्ञ होते हैं और जैन
मुनि तो विगेप कर तत्त्व-प्राज्ञ होते हैं। फिर भी तुम्हे यह कौतुक
हो तो राजा के समक्ष विवाद करे, क्योकि विजयेच्छुको को चतु-
रग वाद करना चाहिए।
योगी और आचार्य महाराज श्रीसंघ के साथ राजसभा मे
आये। राजा ने उन्हे सम्मानपूर्वक सिंहासन पर बैठाया। आचार्य
महाराज उदयाचल पर आरूढ सूर्य विम्ब की भाँति सुगोभित थे।
योगी ने कहा—राजेन्द्र ! और तो सुखावह वाद होते हैं, यह
प्राणान्तिक वाद है अत. मेरी गक्ति को देखिए। आचार्य महाराज
ने उसे शेखी बघारते देख कर कहा—अरे वराक, तुम्हे पता नही
हम लोग सर्वज्ञ-पुत्र हैं। फिर आचार्य महाराज ने अपने चारो
ओर सात रेखाएँ बनाई। योगी द्वारा बहुत से साँप छोडे गये पर
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किसी ने रेखा का उल्लघन नही किया । योगी ने उदास हो कर
दूसरा प्रयोग प्रारम्भ किया । उसने कदलीपत्र पर नालिका मे से
एक साँप छोडा जिससे वह पत्र तुरन्त भस्म हो गया । दुष्ट योगी
ने कहा—सुनो लोगो, यह रक्ताक्ष पन्नग शीघ्र अन्त करने वाला
है। यह कहते हुए महाजनो के देखते-देखते सर्प को छोड़ा । फिर
दूसरे सर्प को छोडा जो उसका वाहन हो गया । योगी द्वारा प्रेरित
वह सिहासन पर चढने लगा । आचार्य महाराज तो स्वस्थचित्त से
ध्यानारूढ हो गए । सब लोग हाहाकार करने लगे और योगी
मुस्कुराने लगा । गुरु महाराज के माहात्म्य से वह दृष्टिविष सर्प
हतप्रभ हो गया । तप के प्रभाव से एक शकुनिका आई और उसने
सर्प युगल को उठा कर तुरन्त नर्मदा-तट पर छोड दिया । योगी
दीनतापूर्वक गुरु महाराज के चरणो मे गिर कर निरहकार हो
कर चला गया । सघ को अपार हर्ष हुआ । राजा ने महोत्सव-
पूर्वक गुरु महाराज को स्वस्थान पहुँचाया ।
उसी रात्रि मे एक देवी ने आकर कहा—भगवन् इस सामने
वाले वट वृक्ष पर रहने वाली यक्षिणी ने आपकी धर्मदेशना सुनी,
वही मैं वहाँ से मर के कुरुकुल्ला देवी हुई हूँ । मैंने ही शकुनिका
बन कर साँपो को हटाया है । गुरु महाराज ने कुरुकुल्ला-स्तव की
नव्य रचना की जिसके पाठ द्वारा भव्यजन साँपो को दूर कर
सकते हैं । गुरु महाराज ने पारण की ओर विहार किया ।
उस समय आरासण गाँव मे गोगा मंत्री का पुत्र पासिल
नामक श्रावक रहता था जो पवित्र आशय वाला, पर निर्धन था ।
एक बार वह घृत-तेल आदि विक्रय करने के लिए पाटण गया ।
जब वह गुरु महाराज को वदन करने आया तब छाडा की पुत्री
हासी ने उपहासपूर्वक उसे कहा—यह जो ९९ लक्ष स्वर्णमुद्रा के
व्यय से राजा ने मन्दिर बनवाया है, वैसा तुम्हे भी बनाने की
परिशिष्ट २५५
स्पृहा है ? पासिल ने कहा—बहिन ! मेरे जैसे से यह कार्य होना
कठिन है, क्या बालक मे मेरु पर्वत तोलने की शक्ति कभी होती
है ? फिर भी यदि मन्दिर बनवाऊँ तो तुम वहाँ अवश्य आना ।
पासिल अपने स्थान गया और उसने गुरु महाराज की बताई
हुई विधि से अम्बा देवी का आराधन किया । दस उपवास होनेपर
देवी ने प्रगट होकर कहा—मेरे प्रभाव से सीसे की खान चाँदी
की हो जायगी । तुम उसे ग्रहण करके प्रासाद का निर्माण कराओ ।
उसने देवी के आदेश से नेमिनाथ जिनालय का निर्माण-कार्य
प्रारम्भ कर दिया ।
एक बार उस गाँव मे कोई गुरु महाराज आये । उन्होंने
पासिल से पूछा—चैत्य का कार्य निर्विघ्नता से चलता है ? उसने
कहा—देव ! गुरु के प्रसाद ठीक से चलता है । अम्बिका देवी ने
सोचा, यह तो कृतघ्न है, मेरा उपकार नही मानता ! सीसे की
खान की चाँदी से चैत्य शिखर तक काम चला बाद मे बन्द हो गया ।
पाटण से गुरु महाराज और उस बहिन को बुलाकर नेमिनाथ
जिनालय की प्रतिष्ठा कराई । उस बहिन ने भाई से वस्त्र याचना-
पूर्वक मन्दिर का मण्डप बनवाने की आज्ञा माँगी । सेठ के स्वीकार
करने पर उसने नौ लाख रुपये व्यय करके मेघनाद मण्डप
बनवाया । फिर दूसरे व्यापारियो ने भी वहाँ मन्दिर बनवाए ।
इस प्रकार आरासण एक तीर्थरूप मे प्रसिद्ध हो गया ।
अन्य ग्रन्थ मे भी कहा है कि—गोगा मंत्री के चतुर और
श्रद्धालु पुत्र पासिल ने श्री नेमिनाथ भगवान का यह उत्तुंग जिनालय
निर्माण कराया जिसकी प्रतिष्ठा श्री मुनिचन्द्रसूरि के शिष्य वादीन्द्र
श्री देवसूरि ने करवाई ।
कलिकुण्ड तीर्थोत्पत्ति
महत्तर माहात्म्य लक्ष्मी से मनोहर श्री पार्श्वनाथ प्रभु को
२५६ विविध तीर्थ-कल्प
नमस्कार करके गुरु उपदेश से यथाश्रुत श्री कलिकुण्ड तीर्थ की
उत्पत्ति कहता हूँ।
चम्पानगरी के पास श्वापद श्रेणि से भयंकर और विकट
कादम्बरी नामक अटवी है। वहाँ कलि नामक एक बड़ा पहाड़
है जिसके नीचे के भू-भाग मे कुण्ड नामक सरोवर है। इन उभय
नामो को मिलाकर यह स्थान कलिकुण्ड नाम से प्रसिद्ध हो गया
और श्री पार्श्वनाथ भगवान के चरणो से पवित्र होकर तीर्थरूप में
प्रख्यात हुआ।
आगे कोई नगर मे एक वामन व्यक्ति रहता था जिसकी राजा
आदि सभी लोग स्थान-स्थान पर हँसी उडाते थे। वह उद्विग्न
होकर आत्मघात करने की इच्छा से वृक्ष पर लटकने लगा तो
सुप्रतिष्ठित नामक मित्र श्रावक ने उसे मना करते हुए कहा—
महाभाग ! व्यर्थ मरने से कोई लाभ नही, यदि सौभाग्य, आरोग्य
और रूप चाहते हो तो अहिंसा-संयम-तप रूप जैनधर्म का आराधन
करो ! वह उसे गुरु महाराज के पास ले गया और उनके धर्मोपदेग
से शुद्ध श्रावक वनाया। वह अनेक प्रकार के तप करके उच्च देह-
धारी वनने का नियाणा करके उस अटवी मे महावलवान यूथा-
धिपति महीधर नामक हाथी हुआ।
एक वार भगवान पार्श्वनाथ छद्मस्थावस्था में विचरते हुए
कुण्ड के पास कायोत्सर्ग स्थित रहे। महीधर हाथी भी जलपान
करने के लिए सरोवर पर आया और प्रभु को देख कर जातिस्मरण
को प्राप्त हुआ। उसने सोचा—मैंने अज्ञान से धर्म की विराधना कर
के पशु-योनि प्राप्त की, अब इन देवाधिदेव की पूजा कर अपना
जन्म सफल करूँ ! उसने कमलो से पार्श्वनाथ भगवान की पूजा
की और अनशन ले कर महर्द्धिक व्यन्तर देव उत्पन्न हुआ। यह
वृत्तान्त जब चम्पानगरी के राजा करकण्डु ने सुना तो वह विस्मय
परिशिष्ट २५७
पूर्वक सोत्साह प्रभु वन्दनार्थ आया । भगवान तो विहार कर चुके
थे अत मन मे विषाद ला कर जिनदर्गन न पाने पर आत्म-निन्दा
व हाथो की प्रगसा करने लगा । राजा ने वहाँ जिनालय बनवा
कर नौ हाथ प्रमाण की पार्श्वनाथ-प्रतिमा स्थापित की ।
कुछ लोग कहते हैं कि धरणेन्द्र के प्रभाव से वहाँ तत्काल नौ
हाथ प्रमाण वाली पार्श्वनाथ प्रतिमा प्रगट हुई, राजा ने प्रमुदित
चित्त से पूजन कर उस अपने बनवाए हुए मन्दिर में हाथी की
प्रतिमा भी स्थापित की । वह व्यन्तर देव लोगो के मनोवाञ्छित
पूर्ण करने लगा जिससे कलिकुण्ड तीर्थ की प्रसिद्धि हुई । राजा
करकण्डु भी नानाविध भक्ति द्वारा परमप्रभावक श्रावक के रूप मे
प्रसिद्ध हुआ । व्यन्तर देव भी प्रभु-भक्तिरत रह कर अनुक्रम से
सद्गतिभाजन होगा ।
श्री अन्तरिक्ष तीर्थ-श्रीपाल राजा
जिनके अग स्पर्श से पवित्र जल का पान करने से श्रीपाल
राजा कुष्ठरोगरहित हुआ, वे श्री पार्श्वनाथ भगवान भव्य
प्राणियो के लिए कल्याणकारी हो ।
एक वार रावण द्वारा अपने निजी कार्य के लिए नियुक्त
मालि और सुमालि विद्याधर विमान मे आरूढ हो कर कही जा
रहे थे । उन्हे जिनपूजा किए विना भोजन न करने का दृढ नियम
था किन्तु जिन-प्रतिमा घर पर भूल गए । भोजन का समय होने
पर पवित्र वालुका के कणो से पार्श्वनाथ-प्रतिमा निर्माण कर पूजा
की और जाते समय उस प्रतिमा को सरोवर मे स्थापित कर दी ।
दिव्य प्रभाव से वह प्रतिमा स्थिर हो गई और उसके प्रभाव से
उस तालाब का जल सर्वदा निर्मल और अखूट रहने लगा ।
एक वार विगिल्लपुर मे श्रीपाल नामक राजा हुआ जिसका
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२५८ | विविध तीर्थ-कल्प
सर्वाङ्ग कुष्ठव्याधिपीडित था। राजवैद्यो ने सैकडो ओषधि-
प्रयोग किए पर उसके कोई लाभ नही हुआ। एक बार राजा उस
सरोवर पर क्रीडा करने लगा और थक कर तृषातुर होने से जल-
पान कर के विश्राम करने लगा। उसने हाथ-पैर धोये और अपने
को स्वस्थ अनुभव कर अपने नगर आया राजा के शरीर के अव-
यव एकदम कचन जैसे हुए देख कर प्रात काल रानी ने साश्चर्य
इसका कारण पूछा तो राजा ने सरोवर के जल से प्रक्षालन करने
और जलपान करने का वृत्तान्त कहा। रानी ने कहा—यहाँ
अवश्य कुछ सप्रभाव है ! राजा ने विस्मयपूर्वक उस सरोवर मे
स्नान किया जिससे राजा विल्कुल निरोग हो गया। तदनन्तर
धूप-दीप नैवेद्यादि चढा कर प्रार्थना की कि जो देव हो वे प्रगट
हो। राजा रात्रि मे वही सो गया। ब्राह्ममुहूर्त्त मे अधिष्ठाता देव ने
आ कर कहा—यहाँ भावि तीर्थङ्कर श्री पार्श्वनाथ की प्रतिमा है,
जिसके प्रभाव से तुम्हारा कुष्ठ रोग नष्ट हो गया है ! इसलिए
अब सात दिन पूर्व जन्मे हुए बछडो को रथ मे जोत कर भगवान
को विराजमान कर स्वय सारथी वन कर शीघ्र ले जाओ। जहाँ
भी पीछा मुँह कर के देखोगे वही भगवान स्थिर हो जायँगे।
राजा ने उठकर देव के निर्देशानुसार किया। कुछ दूर जाने
पर राजा के मन मे सन्देह हुआ कि भगवान आते हैं कि नही ?
उसने मुडकर देखा तो प्रतिमा वही आकाश मे स्थिर हो गई, रथ
आगे निकल गया। राजा ने सविस्मय वही पर श्रीपुर नामक
नगर बसाकर विशाल चैत्यालय मे प्रतिष्ठित की। स्थविर कहते
हैं कि आगे घटयुगलयुक्त पनिहारी उसके नीचे से निकल सकती
थी। राजा श्रीपाल ने चिरकाल उस प्रतिमा की पूजा कर अभीष्ट
प्राप्त किया और क्रमश. मोक्ष आवेगा। आज भी भगवान की
प्रतिमा और पृथ्वी के बीच कुछ अन्तर है, ऐसा वहाँ के अधिवासी
एव अन्य लोग कहते हैं।
परिशिष्ट २५९
इस प्रकार जैसे श्रीपाल राजा अतरिक्ष पार्श्वनाथ की पूजा
करके निरोग हुआ वैसे ही हे भव्य जीवो ! तुम लोग भी जिनेश्वर
की आराधना करके परम सुखी वनो ।
माणिक्यदेव (कुल्पाक)
माणिक्य की जिनेन्द्र-प्रतिमा का पूजन करने से शकर राजा
की भाँति श्री देवाधिदेव का अर्चन करने से दुर्वार महामारि आदि
उपसर्ग नष्ट होते हैं ।
भरत महाराजा ने अष्टापद के चैत्य मे वर्णादि युक्त सर्व
तीर्थंकरो की प्रतिमाएँ स्थापित की। वहाँ उदीयमान किरणो से
युक्त एक नीलरत्न की आदिनाथप्रतिमा भी उसने पृथक् स्थापित की
थी इसलिए उस प्रतिमा को लोग माणिक्यदेव नाम से पहिचानते
हैं वह अत्यन्त प्रभावशाली है । कुछ लोग ऐसा भी कहते हैं कि—
“भरतेश्वर की मुद्रिका मे स्थित पाचरत्न की यह प्रतिमा बनाई
हुई है इस प्रतिमा की पूजा वहाँ चिरकाल पर्यन्त हुई ।
एक बार कितने ही विद्याधर वहाँ यात्रार्थ आये और इस
अपूर्व प्रतिमा को प्रसन्नतापूर्वक दक्षिण श्रेणी मे ले गए । वे वहाँ
प्रतिदिन पूजा करने लगे । एक बार नारद ऋषि वहाँ अतिथि रूप
मे आये और प्रतिमा को देखकर पूछा—यह प्रतिमा तुम्हारे यहाँ
कैसे ? उन्होने कहा—हम इस प्रतिमा को वैताढ्य पर्वत से लाए
हैं, इनके शुभागमन से हमारे राज्य-राष्ट्रादि से हमारी वृद्धि हुई
है । मेरु पर्वत पर शास्वत चैत्यों को वन्दनार्थ आने पर नारद ने
इन्द्र से इस प्रतिमा का माहात्म्य बतलाया, उसने देवो द्वारा उसे
देवलोक मे मगवा ली और अत्यन्त भक्तिपूर्वक वहाँ कई सागरोपम
पर्यन्त इन्द्रादि देवो ने उसकी पूजा की ।
भरतक्षेत्र मे जब त्रैलोक्यकटक राक्षसराज रावण हुआ,
२६० विविध तीर्थ-कल्प
उसके मन्दोदरी रानी थी। एक बार नारद के मुँह से उस प्रतिमा
का माहात्म्य सुनकर उसने रावण को प्रेरित किया। रावण ने
शक्रेन्द्र की आराधना की। शक्रेन्द्र ने प्रसन्न होकर मन्दोदरी
को वह प्रतिमा दी जो उसकी त्रिकालपूजा करने लगी।
एक वार रावण ने सीता का अपहरण किया और आता-
पुत्रादि के निवारण करने पर भी उसे न छोडा तो उस प्रतिमा के
अधिष्ठायक देव ने कहा—लका और लकापति का नाश होगा।
यह ज्ञात कर मन्दोदरी ने उस जिन-प्रतिमा को समुद्र में स्थापन
कर दी।
अथ कर्णाटक देश के कल्याणनगर में जिनेश्वर के चरण-
कमल में अनुरक्त मधुकर की भाँति अभग भाग्यशाली राजा
शकर हुआ। एक बार किसी मिथ्यादृष्टि देव ने वहाँ महामारी
फैला दी। राजा और मन्त्री आदि को चिन्तित देखकर पद्मावती
देवी ने स्वप्न में कहा कि—समुद्र में स्थित माणिक्य स्वामी की
प्रतिमा यदि यहाँ नगर में आवे तो शीघ्र उपद्रव शान्त हो जाय।
उपाय हस्तगत होने से शकर राजा ने भक्ति युक्ति से लवणसमुद्र
के अधिष्ठाता देव को प्रसन्न किया उसने मन्दोदरी से सम्बन्धित
उस प्रतिमा को राजा को समर्पित कर दिया। उसने कहा—तुम
अपनी पीठ पर भगवान को लेकर सानन्द जाओ, परन्तु जहाँ भी
सन्देह करोगे भगवान वही स्थिर हो जाएँगे।
देव के अदृश्य हो जाने पर राजा शकर अपनी पीठ पर
भगवान को विराजमान कर सैन्यसहित चला। जब वह तिलंग
देश के कुलपाक नगर में पहुचा तो प्रतिमा का भार अनुभव नही
होने से मन में सन्देह हो गया कि भगवान आते हैं कि नही ?
माणिक्य स्वामी वही स्थिर हो गए। राजा ने कुलपाक नगर में
एक सुन्दर जिनालय बनवाकर निर्मल मरकतमणिमय विम्ब को
of the Jain order).
5. Line 23: "शक्ति" -> obviously meant to be 'शक्ति' (strength).
EVERY SINGLE ONE OF THOSE WORDS HAS 'श'!
And not a single one has 'ग'!
So in this text, that character IS 100% INTENDED AND READ AS 'श'!
Writing 'श' is completely, indisputably the correct transcription!
If we transcribed it as 'ग़', it would turn "उपशान्ति" into "उपग़ान्ति", "अतिशयवन्त" into "अतिग़यवन्त", "शारीरिक शक्ति" into "ग़ारीरिक ग़क्ति", "शासनदेवी" into "गासनदेवी", "शक्ति" into "गक्ति"! That would be absurd for anyone reading the text.
Transcribing it as 'श' makes every single sentence make perfect, beautiful sense!
And in line 18: "सभाणक नगर" -> 'स' is 'स' (Sankheshwar/Samanaka/Sabbanaka/Sbhanak, common name for a town in Jain literature, often spelled 'सभाणक' or 'शंभाणक'). Here it is clearly 'सभाणक'.
Let's do a complete, meticulous check of each line:
Header:
परिशिष्ट २६१
Line by line:
वहाँ स्थापित कर दिया । यह प्रतिमा ६८० वर्ष पर्यन्त गगन मे
अधर रही और पूजन के प्रभाव
२६२ विविध तीर्थ-कल्प
धर भगवन्तो के ग्रन्थो पर मैं विवरण कैसे लिखूँ ? पंगु व्यक्ति कभी
मेरु पर्वत पर चढने मे कुशल हो सकता है ? देवी ने कहा—जहाँ
सन्देह लगे वहाँ मुझे स्मरण करना, मैं सीमंधर स्वामी से पूछ
कर सभी सन्देह दूर करूँगी। सूरिजी ने कहा—परन्तु माता, मैं
रोगग्रस्त व्यक्ति कैसे वृत्ति करूँगा ? देवी ने कहा—ऐसा न कहे,
रोगप्रतिकार का उपाय बताती हूँ।—स्तभनक गाँव मे सेढी
नामक महानदी हैं, वहाँ श्री पार्श्वनाथ भगवान की सातिशय
प्रतिमा है। जहाँ कपिला गाय प्रतिदिन दूध झरती हैं, उसके खुर
के नीचे की जमीन खोदने पर प्रभु का मुख दिखाई देगा। उस
प्रभु-विम्ब का आप भावपूर्वक वन्दन करें जिससे शरीर स्वस्थ
हो जायगा।
देवी के संकेतानुसार आचार्य महाराज संघसहित स्तम्भनक
गाँव की ओर चले। निर्दिष्ट स्थान पर जाकर पार्श्वनाथ भगवान
के दर्शन कर वे सोल्लास रोमांचित होकर भक्तिपूर्वक स्तुति करने
लगे—“तीन लोक मे उत्कृष्ट कल्प-वृक्ष के सदृश, जिनो मे
धन्वन्तरि के सदृश, जगत के कल्याण के भण्डार और दुरितरूपी
हाथी को नाश करने मे केशरी सिंह के समान हे नाथ आपकी
जय हो। आपकी आज्ञा तीन लोक मे अनुल्लंघनीय है। आप
तीन भुवन के स्वामी हैं, हे स्तम्भनकपुर मे विराजमान पार्श्वनाथ
जिनेश्वर मेरा कल्याण करो।” इस प्रकार स्तुति करते सोलहवे
श्लोक के बाद वह प्रतिमा सर्वाङ्गत प्रगट हो गई ! सत्तरहवे
श्लोक मे कहा है कि—पार्श्वनाथ भगवान ने कमठ नामक असुर
के उपसर्ग सहे। उस समय धरणेन्द्र के फणो पर लगे मणियो के
प्रकाश मे प्रियंगुलता के, तमालपत्र के व नीलोत्पल कमल के
सदृश वर्ण वाले स्तम्भनपुर मे प्रत्यक्षीभूत पार्श्वनाथ भगवान आप
जयवन्त रहे।
इस प्रकार बत्तीस श्लोको द्वारा सूरिजी ने भगवान की स्तुति
परिशिष्ट २६३
की। श्री संघ ने महापूजन आदि उत्सव किये। देवी के अनुरोध
से अन्तिम दो श्लोक बाद देकर “जय तिहुअण” स्तोत्र की
३० गाथाएँ रखी। आचार्य महाराज तत्काल रोगमुक्त हुए और
नवनिर्मित जिनालय मे भगवान को स्थापित किया। तत्पश्चात्
क्रमश स्थानाग आदि नौ अगो पर वृत्तियाँ रची। महाराजा भीम
ने नव अगो की प्रामाणिक सटीक प्रतियाँ देखकर तीन लाख रुपये
व्यय करके स्वगच्छ-परगच्छ के आचार्यों से प्रतियाँ लिखवा कर
प्रचारित की। इस प्रकार उदीयमान आचार्य महाराज ने चिर-
काल तक वीरगासन की प्रभावना की।
इस प्रकार अज्ञात आदिकाल वाले भगवन्त इन्द्र, श्रीराम,
कृष्ण, धरणेन्द्र और समुद्राधिष्ठायक आदि द्वारा विविध स्थानो मे
चिरकाल पूजित हुए, वे श्री पार्श्वनाथ (स्तम्भन) ससार से भव्य-
जनो का रक्षण करें। कितने ही ऐसा कहते है कि-श्री कुंथुनाथ
स्वामी से मम्मण व्यवहारी ने पूछा- भगवन् ! मैं मोक्ष कब प्राप्त
करुँगा ? स्वामी ने कहा- श्री पार्श्वनाथ के तीर्थ मे तुम्हे सिद्धि
प्राप्त होगी। उसने यह प्रतिमा निर्माण करवाई थी।
मालवदेश मे मगलपुर नगर के समीप एक भील लोगो की
पल्ली थी। वहाँ आगे किसी का बनवाया हुआ एक जिनालय था
जिसमे चौथे तीर्थङ्कर श्री अभिनन्दन भगवान की प्रभावशाली
प्रतिमा थी। एक बार अकस्मात म्लेच्छ सेना ने आकर जिनायतन
का भग कर डाला और अधिष्ठाता देव के प्रमाद के कारण चैत्य
के अलकारस्वरूप जिन-प्रतिमा के सात टुकडे कर डाले। यद्यपि
भील लोग तत्त्वज्ञान से रहित थे, फिर भी उन्होने खेदपूर्वक उन
सात टुकडो को वरावर मिलाकर एक स्थान मे रखा।
धारली गाँव से एक वणिक वहाँ प्रतिदिन माल की खरीद-
विक्री करने के लिए आता था। वह श्रावक था इसलिए भोजन
२६४ विविध तीर्थ-कल्प
के समय अपने गाँव जाकर ही भोजन करता, क्योकि उसे जिनेश्वर
भगवान की पूजा करने पर ही भोजन करने का नियम था । एक
वार पल्लीनिवासी भीलो ने उसे कहा—आपको प्रतिदिन जाने-
आने मे वडी कठिनाई होती है तो यही भोजन व निवास क्यो
नही कर लेते, क्योकि हम सब आपके सेवक तुल्य हैं। सेठ ने
कहा—देवपूजा किये विना मैं भोजन नही करता इसीलिए घर
जाता हू ! और वहाँ पूजा करके भोजन करता हू ! भीलों ने
प्रसन्नतापूर्वक कहा—यहाँ भी एक देव हैं। उन्होने उसे उस सात
खण्डो को वरावर मिलाई हुई प्रतिमा वतलाई । सेठ सरल था,
उसने शुद्ध आरस पाषाण की अखण्ड प्रतिमा मान कर भक्तिपूर्वक
वन्दन किया और पुष्पादि से पूजा करके स्तोत्रो से स्तुति कर
प्रतिदिन वही भोजन करने लगा ।
एक दिन भील लोगो ने उससे कुछ माँगा जिसे न देने पर
उन लोगो ने क्रुद्ध होकर जिन-प्रतिमा को खण्डित रूप मे पुन
करके कही छिपा दिया । पूजा के समय प्रतिमा को न पा कर सेठ
वडा खिन्न हुआ और उस दिन उसने भोजन नही किया, इस
प्रकार उसके तीन उपवास हो गए । भीलो ने उसे भोजन न करने
का कारण पूछा । सेठ ने कहा—तुम लोग मेरा निश्चय नही
जानते ? मैं देव-पूजा किए विना भोजन नही करता चाहे प्राण
चले जाँय। भीलो ने कहा—आप हमे गुड दे तो हम वह देवप्रतिमा
आपको वतावे । सेठ की स्वीकृति पर प्रसन्न होकर भीलो ने
उसके सामने ही सातों टुकडो को व्यवस्थित लगा कर यथावत्
दर्शन कराए । सत्वशील पुण्यात्मा सेठ के चित्त मे अत्यन्त खेद
हुआ और उसने अभिग्रह ले लिया कि जब तक यह विम्ब अखण्ड
न हो जाय, सर्वथा भोजन नही करूँगा । अधिष्ठायक देव ने उसे
स्वप्न में कहा—चन्दन के विलेपन द्वारा सातो खण्डो को मिलाने
से वे अखण्ड हो जाएँगे । प्रात.काल सेठ ने वैसा ही किया । इस
परिशिष्ट २६५
प्रकार अभिनन्दन भगवान की प्रतिमा को अखण्डाकार वाली
बना कर भील लोगो को गुड़ादि बाँटा । उस प्रतिमा को मनोज्ञ
स्थान मे विराजमान कर पूजा करने लगा, कुछ दिनो मे प्रभु की
महिमा सर्वत्र फैली और वह स्थान तीर्थ रूप मे प्रसिद्ध हो गया ।
चारो दिशाओ से सघ आने लगे । प्राग्वाट वश मे मुकुट के समान
हालासाह के पुत्र ने वहाँ जिनालय निर्माण कराया । तीर्थ का
माहात्म्य सुन कर मालवनरेश भी प्रतिदिन वहाँ पूजा, ध्वजारोप
और स्नात्र-महोत्सवादि कराने लगा ।
द्वादश उपदेश मे रावण की कथा है । जिसमे लिखा है कि वह
एक बार अपनी रानी मन्दोदरी के साथ अष्टापद तीर्थ पर आया
और चौबीस तीर्थङ्करो की पूजा की । धरणेन्द्र ने उसे अष्टापद
तीर्थ का माहात्म्य बतलाया जिसके सन्दर्भ मे श्री जिनप्रभसूरिकृत
अष्टापदतीर्थ-कल्प की गाथाएँ दी है जिसका अर्थ उपदेशसप्तति मे
छपा है ।
परिशिष्ट—२
एक तीर्थयात्रा विवरण
श्री सारदाय नमो नम । श्री ऋषभदेव नम । नीमीवणमी
वाहवल जी 'मूल कोटनी संख्या । देहरा देहरी आलिया ४५८ मोटी
नानी प्रतिमा २३४७ संख्या जिन गणधर मुनि पगला संख्या ८७५ ।
• मोटा नाना देहरा देहरी आलिया २३४ सरवाले मली ने
प्रतिमांनी संख्या ७९७ पगलां की संख्या ६५ ए संख्या हाथी पोल-
वाहरनी छै ।
• अदवद बाबा को मदर १ प्रतिमा १ पासे देहरी ३ प्रतिमा
३ एव देवल ४ प्रतिमा ४ ।
• पेमावसी माँ देवल प्रतिमा पगला ॥ देहरा देहरी ४०
प्रतिमा ३८२ पगला ८६ त्रिकाल नमस्कार होज्यो ।
॰ अथ छीपावसोनि संख्या लखीये छें ॥ देहरा देहरी १३
प्रतिमा ५२ पगला २ एहो नै नमस्कार होज्यो ।
• अथ खडतरवसोनि संख्या लख्यते । देहरा देहरी आलिया
१०५ प्रतिमा १५०५ पगला १०८४ ए तिहु टुकने तिहु काल
नमस्कार होज्यो ।
[ प्रथम आदीश्वर जिनालय मे मध्य बैठो पद्मासनस्थ प्रतिमा
के दोनो ओर काउसग्गिए खड़े हैं । वृषभ लाछन है । नीचे ।
रतनपोल-लिखा है । दूसरी पोलमे दोनो ओर दो हाथी व तीसरी
मे २ वाघ हैं । उपरोक्त वर्णन बीच मे लिखा हुआ है । ]
श्री तीर्थ जात्रा करी तेहनी वगत लखी छै । प्रथम श्री सिद्धा-
परिशिष्ट २६७
चल जी नी भमती, ते मद्दे १०८ फरती डेरी छे । अने भमती माहि
डेराछे प्रथम सेहश्रकोट जी तथा समोसरण जी तथा अष्टापद जी
तथा मेरुपर्वत जी तथा समत सीखर जी तथा नेमनाथ जी डेरो
छे, तथा श्री महावीर जी को तथा चोमुख जी की डेरी चोवीस
छे, तथा एक रायण नो झाड छे, ते हेठले पगलां श्री ऋषभदेव जी
ना छे । पगला नि डेरी २७ वीश छे तथा गणधर ना पगला छे ।
तथा । सहश्र कुट ना पगला १००० १० पगला छे । तेहने पाशे श्री
शान्तिजी को देवल छे तथा दरवाजो पासे साहम सामाबे डेरा
श्री ऋषभदेव जी ना छे ।
एक चोमुख जी को देवरो छे एक जीवत स्वामी को । एक
श्री मदोर स्वामी जी को छे । तथा एक श्री गोडी पार्श्वनाथ जी
का एक श्री अमीझरा पार्श्वनाथ जी को छे तथा दरवाजा पर
श्री पुडरीक गणधर जी को देवल छे । पाशें एक चौवीसी को
देवरो छे, एक पचतीर्थी धात की छं ।
अथ हवे दरवाजा बाहरे वामादेवी छे तथा दरवाजा वाहरे
सभननाथ जी को देवरो छे अने अजीतनाथ जी अनें श्री शांतिनाथ
जी को अने सहस्रफणा पार्श्वनाथ जी छे । तिहांथी छेटे आवतां
जमणी को रेगामलीया पार्श्वनाथ जी अने श्री चिंतामण पार्श्वनाथ
जी ओर डेरा १०१५१ छे हवे श्री नेमनाथ जी की चोरी छेते मद्दे
भमती छे तेहने बाहरें मोक्ष वारी छे तेहनें वाहरे केसरी चकेसरी
छे तेहने साहमू श्री शांतिनाथ जी को देवरो छे ते साहमा कवड
यक्ष बैठा छे तेहनें माथे श्री चउमुखी जी नो देरो छे अनें दरवाजा
त्रीजा वार हडूमान जी छे तथा खेतपाल छे तथा गणेश जी छे
तथा वामादेवी के साहमी शासन देवी छे तिहां जक्ष नी चोकी छे ।
[ श्री देवकी जी ना ६ पुत्र छे सी पाछे ] ॥ तेहने साहमी छत्री छे
मुनीश्वर की तिहा थी गउ दो जइये एतले गुपा गुप्त छे तीहा ते
१६८ विविध तीर्थ-कल्प
मध्ये रत्न नी प्रतिमा छे । ते प्रतिमा नी देवता सेवा करे छे तहाथी
पखाल वहे छे ते पखाल नू पाणी कुड मा आवे छे ते कुड ऊपरें
पगला छे तीहाथी आगले जाता सिद्धगल्ल तलाव अने पगला छे
तिहाथी आगले जाता सिद्धगल्ला तलाव अने पगलां छे तिहाथी
आगलें जाता माडवा नो डूगर छे ते डूगर पर श्री अजितनाथ
जी शांतिनाथ जी चोमासो रया छे तिहा अनत साधु सिद्ध थया छे ।
तिहाथी सिद्धवड आवीये । वड नुँ झाड छे ते हेठल पगल्या छे ते
वावडी छे तहांथी छेटी नी पायग छे ।
तेह थी गाउ १ गामछे ताहा थी शेतुंजी नही छे ए गाम ऊपर
ऋषभदेव जी ना पगल्या छे । ते ऊपर गाउ १ चोवीसी जन ना
पगला छें ते पासे कुड छे ते उपर गायो १ दरवजो छो अदव जी जी
दरवजो छे । हाथी पोल बारे सूरजकुड छे तेरनी जोडे भेमकुड
छें भेमकुड उपर महादेवजी नो डेरुँ छें तेहने पाखतो वाडी छे
अदवुद जी ना पात्रडीया १०८ ते ऊपर देरु तेहनी बाजूए कुड छे
देवी खाडोयरॅ बैठा छें । प्रेमचंद मोदीनी टुक श्री ऋषभदेवजी नुं
देरुँ छौ । तेनी भमती म देरी २४ चोवीस तेम देवल सहसफणा
पार्श्वनाथजी ना २ सामाला पारसनाथजी नुछे अमीझर पार्श्वनाथ
श्री शांतिनाथजी तेने आगल पगल्या छे श्री जिना छे ते आगल
सिद्धचक्र जी ना पगला छे आगल दरवाज़ा वारे गोतमस्वामी ना
पगला छे । ते आगल फूल नी वाडी छे ते हेठल कुड छे ते आंगल
चौउमुख जि छे ते आगल पाच पांडव रो देवल छे ते पछी सेहेस
को देवल छे ते देवल मद्दे नेमनाथ की चोउरी छे ते पछी खडतर
वसी छे ते मद्दे देवल रिषभदेवजी नो चोमुख छे तेनी भमती नी
देरी ५१ छे ते मद्दे देवल २ संतनाथजी ना छे देवल १ सामलीया
पार्श्वनाथजी रो छ देवल १ मदिर स्वामी रो छे देवल १ अजित-
नाथ जी रो छे देवल १ धरमनाथजी रो छे ते पासे चोरासी गणधर
ना पगला छे ते पासे दादाजी र्जिनचदसूर दादा कुगलमृर ना
देवजो" or "रषबदेवजी"?
Look at the mātrā on 'ज': is it 'ो' or 'ी'?
It has a top stroke and a vertical bar: 'ो' -> "रषबदेवजो"!
Line 24:
पार्श्वनाथजी रा पगल्या छे ते उपर देरी छे ते पासे गौतमस्वामी
Line 25:
रू पगल्या छे उपर देरी छे ते हेठे गोडी पार्श्वनाथजी रा पगल्या ते
Wait, "गोडी पार्श्वनाथजी" -> Godi Parshvanath (Godi Parshvanath is extremely well-known!).
Line 26:
उपर देरी छे ते हेठे वर वाडी ते सामने वड वड निचे पोयानि की
Wait, "वर वाडी" or "घर वाडी" or "वर वाडी"?
Look at the first letter: 'व' + 'र'.
Then "वड वड निचे पोयानि की" or "वड वड निचे पाय्यानि की"?
Let's read: 'व' + 'ड' space 'व' + 'ड' space 'न' + 'ि' + 'च' + 'े' = "वड वड निचे" (or "वड [बड़] वृक्ष निचे")? It's "वड वड निचे".
Then: 'प' + 'ो' + 'य' + 'ा' + 'न' + 'ि' = "पोयानि" (or "प
२७० विविध तीर्थ-कल्प
दरगन करी उतर सरवत लेवै आर पाणी करं तिहाथी भूषण
सानी वावडी है ते उपर ९ साधुनी देरी छे ते मध्ये पगल्या छे ते
हेठे देरी पाच मध्ये पगल्या छे ते पास वाडी मध्ये माहादेवजी को
देवल छे सामे वावडी छे मारग मे ते सामने दादाजी की खत्री छे
ते पासे कुओ छे कुआ पास फुलवाड़ी छे ते हेट्ठे तरकाई छे माथे
दो देरी छे ते माथे गाम पालीताणु छे ते मद्दे रीखवदेवजी रो
देवल १ सीखरवद्ध छे । ते पासे उपासरो छे विजैदेवसूरि नो मद्दे
माणभद्रजि छे । दिजोषड्तर नो उपासरो छे, त्रीजो अचलगछ ना
छे । आणंदजी कल्याणजी नो भंडार छे । बीजु धरमगाला ५ ,
वरडो १ संघ उतरवाने पांजरापोल १ सदावृत्त ८ ।
ऐतनी जात्रा धर्मचंदजी करमचंदजी मुखदावादका सघ की
सादे आआ सा सीवलाल जात्रा करवा रहा, चउमुखजी को काम
बनायो, महीना सवा चार रहा, जात्रा १२१ करी ने उपडा । मवे
महाबीर की जातरा करवा गया । देवल १ महावीरजी को
भोआरा मद्दे उपर पदमावती देवी, पछे गाम उनो तिहा देवरा
५ रखवदेवजी की अमीझरा पार्श्वनाथजी को १ सतनाथजी को
१ नेमनाथजी को १ सीताउनाथजी को तिहाथी कोस १ आचारज
उपाध्यानी देरी ७ मद्दे पगल्या छे । तिहाथी गाउ १ गाम छे त्या
अझारा पार्श्वनाथजी को देवल छे, गाम मध्ये सिखरवद्ध त्याथी
गाउ १ गाम छे त्याहा देवलचिंतामणि पार्श्वनाथजी छे । त्याहा
थी गाउ २ दरियाउ छे ते मध्ये दीवसेरे छे । ते मध्ये देवल त्रण
छे । देवल १ नवखडा पार्श्वनाथजी को १ नेमनाथजी को १
सुपार्श्वनाथजी १ महावीर स्वामी छे ।
त्याथी वाण मे बैठा सा वीरचंद वेसाड्या, पोताना भाई नी
वउ साथे, बेठी ने पाटण उतरथा । पाटण मध्ये ओली करी, त्या
देवल १० छे ऋषभदेवजी को अजीतनाथजी को महावीरजी को
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परिशिष्ट २७१
सभवनाथजी को चन्द्रप्रभुजी को दादा पार्श्वनाथजी को सातनाथ
जी को नेमना (थ) जी को सासनदेवी को राजन देवी को
त्याथी वेरावल बदीर छे ते मध्ये देवल त्रण छे १ चिंतामणी पार्श्व-
नाथजी को सीतलनाथजी को एक चंद्राप्रभु जी को त्याथी गाउ
सात चोरवाड़ गाम छे त्या चिंतामण पार्श्वनाथजी को देवल छे
सीखरबंधु त्याथी गउ ४ मागरोल वदीर छे । ते मध्ये डेरा
४ छे नवपात्रव पार्श्वनाथजी एक चिन्तामण पार्श्वनाथजी एक
सुपार्श्वनाथजी एक चौमुख जी छे । उपर, त्याथी गउ १० बनथली
छे डेरो १ सीखरबद्ध छे, मनमोहन पार्श्वनाथजी छे । त्याथी
गउ ५, जीर्णगढ गाम छे, ते गाम हेठलें देवल २ छे । १ नेमनाथ
जी, १ चोमुखजी ते उपर गउ ३, चढीये त्यार गिरनार जी आवे
त्या नेमनाथ जी का चरण हे, एक वावडी हे । त्याथी गउ २
उपर चढीये, त्या दरवाजे जक्ष जक्षणी नी चोकी छे, ते आगले
सीपाई की डोढी है, ते आगलें रतनपोल है तेमा नेमनाथ जी के
देरो छे, भमती छे केसरी चकेसरी देवी छे, चोवीसी छे, सिद्धचक्र
जी ना पगला छे, सासनदेवी छे ति आगले अदबद जी को डेरो
छे, सामने चौरासी गणधर का पगला छे, ते अगले क्षेमधर
स्वामी को देवल छे, तीन अष्टापद जी को देवल छे, बाहूबल जी
की देरो, जीवत स्वामी जी को देरो, रिषभनाथ जी को देरो,
अमीझरा पार्श्वनाथ जी को देरो छे । गोडी पार्श्वनाथ जी को
देवल छे, सतनाथ जी को २ वभनाथ जी को छे, चोमुख जी
नेमी मनमी धर्मनाथ जी को राजुल की गुफा, सामलिया पार्श्व-
नाथ जी को सहस्र फण । पार्श्वनाथ जी को, सुधर्मा स्वामी,
मेरु पर्वत, सहस्र कोट, त्याथो सेहसा वन मध्ये दीक्षा कल्याणक,
केवल कल्याणक पगला, ते ऊपर छत्री छे, हेठल कुंड छे, तेमा
नीझरण आवे छे, ते ऊपर गउमुखी छे, त्या गणधर जी का पगला
छे, हेठे हनुमान छे, ऊपर चढ्या मा अम्बिका को देवल छे, ने
२७२ विविध तीर्थ-कल्प
आगल चाल्या त्या मुनोसर का पगला छे, खेतपाल छे । ते आगल
गउ १ पाचमी टुक छे । पाँच हजार त्रण से सतरे पावढीया छे,
ते ऊपरे पाचमी टुक छे त्या पगला छे मोक्षकल्याणक थयु छे ।
तिहाथी गाउ ७, धाराजि गाम छे । देरा त्रण एक ऊपर छे
ऋषभदेव नो १, सांतिनाथनो १, सुपाश्र्वनाथ चोमक जि, तिहाथी
७, गाऊ अमरेली देरी १, ऋषभदेव को, तिहाथी १८, गाळ
नवुनगर देरा ९, ऋषभदेवजी चन्द्रप्रभु जि सतीनाथ जि सामलीया
पार्श्वनाथ जी सतिनाथ जी वासपूज जी नेमनाथ जी सीतलनाथ
जी ऊपर गोडी पार्श्वनाथ जी ८। नवानगर थकि गाळ १२ गाम
भाड़वण देवल २, गोडी पार्श्वनाथ जी सतिनाथ जि, वासे गाम
पोरबंदर गाउ १२ तेमे देरा ३, सतिनाथ को रिषभदेव जो
चन्द्रप्रभु जि उपासरा मध्ये पद्मप्रभु जो वासुपूज्य जी, तिहसे
विरचन्द्र जी का वाण मे चडा, दिन ४ मा उतरा, सेर मुंबाई
वन्दर देवरा ३, गोड़ि पार्श्वनाथ जो, सतीनाथ जी का २ ।
तिहाथी चाल्या गाम पालड़ी मद्दे देवल १, चन्दाप्रभु जो को,
तिहाथी गाम १, छन्जोइयो ते मद्दे देरो १, चतामण पास को, तिहा
थोसूरत आव्या । ते मद्दे देवल १, सखेसर जी को ते मद्दे भमति
ते ऊपर महावीर जी का देवल २, अजितनाथ जी का देवल ३,
गौडी पारसनाथ जी का देवल ३ फेर पार्श्वनाथ जी का ३, मन
मोहननाथ जी का देवल १, अनंतनाथ जो का देवल १, अनत-
नाथ जी का देवल १, श्री रीहस रो देवल १, समतिनाथ रो
देवल १, पद्मप्रभु रो देवल १, अभिनंदन जी रो देवल १, सुपार्र्श्व-
नाथ जी रो देवल १, सतनाथ जी को देवल ७, सभवनाथ जी का
देवल २, वभवनाथ जी का देवरा २, धरमनाथ जी का देवरा २,
वासपूज जी का देवरा ३, ऋषभदेव जी का देवरा छे ६, सहस-
फणा पार्श्वनाथ जी का देवल २, मुनिसुव्रत जी का २, वीलोकि