विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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की। श्री संघ ने महापूजन आदि उत्सव किये। देवी के अनुरोध
से अन्तिम दो श्लोक बाद देकर “जय तिहुअण” स्तोत्र की
३० गाथाएँ रखी। आचार्य महाराज तत्काल रोगमुक्त हुए और
नवनिर्मित जिनालय मे भगवान को स्थापित किया। तत्पश्चात्
क्रमश स्थानाग आदि नौ अगो पर वृत्तियाँ रची। महाराजा भीम
ने नव अगो की प्रामाणिक सटीक प्रतियाँ देखकर तीन लाख रुपये
व्यय करके स्वगच्छ-परगच्छ के आचार्यों से प्रतियाँ लिखवा कर
प्रचारित की। इस प्रकार उदीयमान आचार्य महाराज ने चिर-
काल तक वीरगासन की प्रभावना की।
इस प्रकार अज्ञात आदिकाल वाले भगवन्त इन्द्र, श्रीराम,
कृष्ण, धरणेन्द्र और समुद्राधिष्ठायक आदि द्वारा विविध स्थानो मे
चिरकाल पूजित हुए, वे श्री पार्श्वनाथ (स्तम्भन) ससार से भव्य-
जनो का रक्षण करें। कितने ही ऐसा कहते है कि-श्री कुंथुनाथ
स्वामी से मम्मण व्यवहारी ने पूछा- भगवन् ! मैं मोक्ष कब प्राप्त
करुँगा ? स्वामी ने कहा- श्री पार्श्वनाथ के तीर्थ मे तुम्हे सिद्धि
प्राप्त होगी। उसने यह प्रतिमा निर्माण करवाई थी।
मालवदेश मे मगलपुर नगर के समीप एक भील लोगो की
पल्ली थी। वहाँ आगे किसी का बनवाया हुआ एक जिनालय था
जिसमे चौथे तीर्थङ्कर श्री अभिनन्दन भगवान की प्रभावशाली
प्रतिमा थी। एक बार अकस्मात म्लेच्छ सेना ने आकर जिनायतन
का भग कर डाला और अधिष्ठाता देव के प्रमाद के कारण चैत्य
के अलकारस्वरूप जिन-प्रतिमा के सात टुकडे कर डाले। यद्यपि
भील लोग तत्त्वज्ञान से रहित थे, फिर भी उन्होने खेदपूर्वक उन
सात टुकडो को वरावर मिलाकर एक स्थान मे रखा।
धारली गाँव से एक वणिक वहाँ प्रतिदिन माल की खरीद-
विक्री करने के लिए आता था। वह श्रावक था इसलिए भोजन