विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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के समय अपने गाँव जाकर ही भोजन करता, क्योकि उसे जिनेश्वर
भगवान की पूजा करने पर ही भोजन करने का नियम था । एक
वार पल्लीनिवासी भीलो ने उसे कहा—आपको प्रतिदिन जाने-
आने मे वडी कठिनाई होती है तो यही भोजन व निवास क्यो
नही कर लेते, क्योकि हम सब आपके सेवक तुल्य हैं। सेठ ने
कहा—देवपूजा किये विना मैं भोजन नही करता इसीलिए घर
जाता हू ! और वहाँ पूजा करके भोजन करता हू ! भीलों ने
प्रसन्नतापूर्वक कहा—यहाँ भी एक देव हैं। उन्होने उसे उस सात
खण्डो को वरावर मिलाई हुई प्रतिमा वतलाई । सेठ सरल था,
उसने शुद्ध आरस पाषाण की अखण्ड प्रतिमा मान कर भक्तिपूर्वक
वन्दन किया और पुष्पादि से पूजा करके स्तोत्रो से स्तुति कर
प्रतिदिन वही भोजन करने लगा ।
एक दिन भील लोगो ने उससे कुछ माँगा जिसे न देने पर
उन लोगो ने क्रुद्ध होकर जिन-प्रतिमा को खण्डित रूप मे पुन
करके कही छिपा दिया । पूजा के समय प्रतिमा को न पा कर सेठ
वडा खिन्न हुआ और उस दिन उसने भोजन नही किया, इस
प्रकार उसके तीन उपवास हो गए । भीलो ने उसे भोजन न करने
का कारण पूछा । सेठ ने कहा—तुम लोग मेरा निश्चय नही
जानते ? मैं देव-पूजा किए विना भोजन नही करता चाहे प्राण
चले जाँय। भीलो ने कहा—आप हमे गुड दे तो हम वह देवप्रतिमा
आपको वतावे । सेठ की स्वीकृति पर प्रसन्न होकर भीलो ने
उसके सामने ही सातों टुकडो को व्यवस्थित लगा कर यथावत्
दर्शन कराए । सत्वशील पुण्यात्मा सेठ के चित्त मे अत्यन्त खेद
हुआ और उसने अभिग्रह ले लिया कि जब तक यह विम्ब अखण्ड
न हो जाय, सर्वथा भोजन नही करूँगा । अधिष्ठायक देव ने उसे
स्वप्न में कहा—चन्दन के विलेपन द्वारा सातो खण्डो को मिलाने
से वे अखण्ड हो जाएँगे । प्रात.काल सेठ ने वैसा ही किया । इस