विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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प्रकार अभिनन्दन भगवान की प्रतिमा को अखण्डाकार वाली
बना कर भील लोगो को गुड़ादि बाँटा । उस प्रतिमा को मनोज्ञ
स्थान मे विराजमान कर पूजा करने लगा, कुछ दिनो मे प्रभु की
महिमा सर्वत्र फैली और वह स्थान तीर्थ रूप मे प्रसिद्ध हो गया ।
चारो दिशाओ से सघ आने लगे । प्राग्वाट वश मे मुकुट के समान
हालासाह के पुत्र ने वहाँ जिनालय निर्माण कराया । तीर्थ का
माहात्म्य सुन कर मालवनरेश भी प्रतिदिन वहाँ पूजा, ध्वजारोप
और स्नात्र-महोत्सवादि कराने लगा ।
द्वादश उपदेश मे रावण की कथा है । जिसमे लिखा है कि वह
एक बार अपनी रानी मन्दोदरी के साथ अष्टापद तीर्थ पर आया
और चौबीस तीर्थङ्करो की पूजा की । धरणेन्द्र ने उसे अष्टापद
तीर्थ का माहात्म्य बतलाया जिसके सन्दर्भ मे श्री जिनप्रभसूरिकृत
अष्टापदतीर्थ-कल्प की गाथाएँ दी है जिसका अर्थ उपदेशसप्तति मे
छपा है ।