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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 345, कुल 442 में से

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२६२ विविध तीर्थ-कल्प

धर भगवन्तो के ग्रन्थो पर मैं विवरण कैसे लिखूँ ? पंगु व्यक्ति कभी
मेरु पर्वत पर चढने मे कुशल हो सकता है ? देवी ने कहा—जहाँ
सन्देह लगे वहाँ मुझे स्मरण करना, मैं सीमंधर स्वामी से पूछ
कर सभी सन्देह दूर करूँगी। सूरिजी ने कहा—परन्तु माता, मैं
रोगग्रस्त व्यक्ति कैसे वृत्ति करूँगा ? देवी ने कहा—ऐसा न कहे,
रोगप्रतिकार का उपाय बताती हूँ।—स्तभनक गाँव मे सेढी
नामक महानदी हैं, वहाँ श्री पार्श्वनाथ भगवान की सातिशय
प्रतिमा है। जहाँ कपिला गाय प्रतिदिन दूध झरती हैं, उसके खुर
के नीचे की जमीन खोदने पर प्रभु का मुख दिखाई देगा। उस
प्रभु-विम्ब का आप भावपूर्वक वन्दन करें जिससे शरीर स्वस्थ
हो जायगा।
देवी के संकेतानुसार आचार्य महाराज संघसहित स्तम्भनक
गाँव की ओर चले। निर्दिष्ट स्थान पर जाकर पार्श्वनाथ भगवान
के दर्शन कर वे सोल्लास रोमांचित होकर भक्तिपूर्वक स्तुति करने
लगे—“तीन लोक मे उत्कृष्ट कल्प-वृक्ष के सदृश, जिनो मे
धन्वन्तरि के सदृश, जगत के कल्याण के भण्डार और दुरितरूपी
हाथी को नाश करने मे केशरी सिंह के समान हे नाथ आपकी
जय हो। आपकी आज्ञा तीन लोक मे अनुल्लंघनीय है। आप
तीन भुवन के स्वामी हैं, हे स्तम्भनकपुर मे विराजमान पार्श्वनाथ
जिनेश्वर मेरा कल्याण करो।” इस प्रकार स्तुति करते सोलहवे
श्लोक के बाद वह प्रतिमा सर्वाङ्गत प्रगट हो गई ! सत्तरहवे
श्लोक मे कहा है कि—पार्श्वनाथ भगवान ने कमठ नामक असुर
के उपसर्ग सहे। उस समय धरणेन्द्र के फणो पर लगे मणियो के
प्रकाश मे प्रियंगुलता के, तमालपत्र के व नीलोत्पल कमल के
सदृश वर्ण वाले स्तम्भनपुर मे प्रत्यक्षीभूत पार्श्वनाथ भगवान आप
जयवन्त रहे।
इस प्रकार बत्तीस श्लोको द्वारा सूरिजी ने भगवान की स्तुति