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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

लेकर दिव्यपुष्पवृष्टि पर्यन्त श्री हरिश्चन्द्र राजा का सत्व-
कसौटी रूप चरित्र इसी नगरी के अन्दर मनुष्यो को विस्मय
करने वाला घटित हुआ ।
और जो काशी-माहात्म्य में प्रथम गुणस्थानियो द्वारा कहा है
कि— वाराणसी में कलि का प्रवेश नही होता और यहाँ मरने
वाले कीट-पतग-भ्रमर आदि तथा चतुर्विघ हत्या करने वाले अनेक
पापी मनुष्य भी शिव को प्राप्त करते हैं । ऐसी युक्तिहीन बातो
पर हमारे लिए श्रद्धा करना मानना दु शक्य है, फिर कल्प मे कहने
के लिए तो उपेक्षणीय ही है ।
इस नगरी में परिव्राजको, जटाधरो, योगियो तथा ब्राह्म-
णादि चारो ही वर्ण मे धातुवादि, रसवाद, खन्यवाद, मन्त्रविशारद,
शब्दानुगासन-तर्क-अलकार-ज्योतिषचूडामणि निमित्तशास्त्र-साहि-
त्यादि विद्यानिपुण ऐसे अनेक पुरुष हैं जो रसिक मन वालो को
प्रसन्न करते हैं । यहाँ सकल कला परिकलन कौतूहल वाले चारो
दिशाओ के देशान्तरवासी लोग दिखाई पडते हैं ।
वर्त्तमान मे वाराणसी चार भागो मे बँटी हुई देखी जाती है
जैसे—देव वाराणसी, जहाँ विश्वनाथ का मन्दिर है जिसमे आज
भी जैन चतुर्विंशति तीर्थङ्कर पाषाणमय पट्ट पूजा मे रखा हुआ
विद्यमान है । दूसरी राजधानी वाराणसी है जहाँ आज कल यवन
लोग रहते हैं । तीसरी मदन वाराणसी और चौथी विजय वारा-
णसी है । लौकिक तीर्थ तो इतने अधिक हैं कि उनकी सख्या भी
कौन कर सकता है ? अन्तर्वन में दन्तखात तालाब के निकट श्री
पार्श्वनाथ का चैत्य अनेक प्रतिमाओ से विभूषित है । यहाँ
तालाबो में निर्मल परिमल से भरे हुए नाना जाति के सुगन्धित
कमल भ्रमरसमूहसयुक्त है । और इस नगरी में निर्भय विचरने
वाले वानर और मृगधूर्त लोग एकत्र हैं । यहाँ से तीन कोश पर

वाराणसीनगरी-कल्प १६९
धर्मेक्षा नामका सन्निवेश है जहाँ अपने ऊँचे शिखरो से गगन को
चूमने वाला गौतम बुद्ध का आयतन है। यहाँ से ढाई योजन आगे
चन्द्रावती नगरी है, जहाँ पर अखिल भुवनजनो को तुष्ट करने
वाले चन्द्रप्रभ भगवान के गर्भावतारादि चार कल्याणक हुए हैं।
दो भगवान के जन्म और गंगोदक से गौरववती काशी
नगरी किसके द्वारा प्रकाशित नही है ? अर्थात् सभी ने इसका
वर्णन किया है। इस अनल्प समृद्धि वाली वाराणसी का कल्प
श्रीमान् जिनप्रभसूरि मुनीन्द्र ने बनाया है।
श्री वाराणसी नगरी का कल्प समाप्त हुआ। इसकी ग्रन्थसंख्या
११३ व २३ अक्षर ऊपर है।
३१. महावीर-गणधर-कल्प
श्री वीर प्रभु के ब्राह्मण-वंशोत्पन्न ग्यारह गणधरो को
नमस्कार करके शास्त्रो के अनुसार उनका कल्प सक्षेप से कहता
हूँ। उनके (१) नाम, (२) स्थान, (३) पिता, (४) माता, (५) जन्म-
नक्षत्र, (६) गोत्रादि, (७) गृहपर्याय, (८) सशय, (९) व्रतदिवस,
(१०) नगर, (११) देश, (१२) काल, (१३) व्रतपरिवार, (१४)
छद्मस्थ, (१५) केवलित्व वर्षसंख्या, (१६) रूप, (१७) लब्धि
(१८) आयुष्य, (१९) मोक्ष स्थान, (२०) तप आदि द्वार वर्णन
करता हूँ।
(१) गणधरो के नाम—१ इन्द्रभूति, (२) अग्निभूति, (३)

१७० विविध तीर्थ-कल्प
वायुभूति, (४) व्यक्त, (५) सुधर्मा स्वामी, (६) मण्डित, (७) मोरिय-
पुत्र, (८) अकम्पित, (९) अचलभ्राता, (१०) मेतार्य और (११)
प्रभास ।
(२) स्थान—इन्द्रभूति आदि तीन सहोदर मगधदेश के गोव्वर
गाँव मे उत्पन्न हुए । व्यक्त और सुधर्मा स्वामी कोल्लाग सन्निवेश
मे, मण्डित और मोरियपुत्र दोनो मोरिय सन्निवेश मे, अकम्पित
मिथिला मे, अचलभ्राता कोगला मे, मेतार्य वत्सदेश के तुगिय
सन्निवेश मे और प्रभास स्वामी राजगृह मे उत्पन्न हुए ।
(३) पिता—तीन सहोदरो के पिता वसुभूति, व्यक्त का
धनमित्र, आर्य सुधर्मा का धम्मिल, मण्डित का धनदेव, मोरिअ-
पुत्र का मोरिय, अकम्पित के पिता देव, अचल भ्राता के वसुदत्त,
मेतार्य के दत्त, और प्रभास स्वामी के पिता का नाम बल था ।
(४) माता—तीन भ्राताओ की जननी पृथ्वि, व्यक्त की
वीरुणी, सुधर्म धी भद्दिला, मण्डित की विजयादेवा एवं मोरिअ-
पुत्र की भी वही—क्योकि धन देव के परलोक गत होने से मोरिअ
ने उसे सगृहीत किया क्योकि उस देश मे ऐसा होना र्निविरोध
था । अकम्पित की जयन्ती, अचलभ्राता की नंदा, मेतार्य की
वरुणदेवा और प्रभास की माता अतिभद्र थी ।
(५) नक्षत्र.—इन्द्रभूति का ज्येष्ठा, अग्निभूति का कृत्तिका,
वायुभूति का स्वाति, व्यक्त का श्रवणा, सुधर्मा स्वामी का उत्तरा-
फाल्गुनी, पण्डित का मघा, मोरिअपुत्र का मृगगिरा, अकम्पित
का उत्तराषाढा, अचलभ्राता का मृगशिरा, मेतार्य का अश्विनी,
प्रभास का पुष्य नक्षत्र था ।
(६) गोत्र—तीनो भाई गौतम गोत्रीय, व्यक्त भारद्वाज-
गोत्रीय, सुधर्मा स्वामी अग्निवेश्यायन गोत्रीय, मण्डित वाशिष्ठ
गोत्रीय, मोरिअपुत्र काश्यपगोत्रीय, अकम्पित गौतमगोत्रीय,

श्रीमहावीर-गणधर-कल्प १७१

अचलभ्राता हारीतगोत्रीय, मेतार्य और प्रभास स्वामी कौडिन्य-
गोत्रज थे।
(७) गृहस्थ पर्याय —इन्द्रभूति का ५० वर्ष, अग्निभूति का
४६ वर्ष, वायुभूति का ४२ वर्ष, व्यक्त का ५० वर्ष, मण्डित का
५३ वर्ष, मोरियपुत्र का ६५ वर्ष, अकम्पित का ४८ वर्ष, अचल-
भ्राता का ४६ वर्ष, मेतार्य का ३६ वर्ष और प्रभास स्वामी का
१६ वर्ष था।
(८) सशय—इन्द्रभूति का 'जीव' विषयक सशय भगवान
महावीर ने मिटाया। अग्नि भूति का 'कर्म' विपयक, वायुभूति
का जीव-शरीर विषयक, व्यक्त का पच महाभूत विषयक, सुधर्मा
स्वामी का जैसा यह भव वैसा ही परभव, मण्डित का बन्ध-मोक्ष-
विषयक, मोरियपुत्र का देवसम्बन्धी, अकपित का नरक.सबधी,
अचलभ्राता का पुण्य-पापसम्बन्धी, मेतार्य का परलोकविषयक,
एव प्रभास स्वामी का निर्वाणविषयक सन्देह भगवान ने
मिटाया था।
(९-१०-११-१२) द्वार —ग्यारह गणधरो का दीक्षादिवस
एकादशी है। उन यज्ञवाटिका मे उपस्थितो ने समवशरण मे
देवो का आगमन देख कर वैशाख शुक्ल ११ के दिन, मध्यम पावा
नगरी मे, महसेन वनोद्यान मे पूर्वाह्न देश और पूर्वाह्न काल मे
भगवान् महावीर स्वामी के पास दीक्षा ग्रहण की थी।
(१३) व्रत परिवार—इन्द्रभूति आदि पाँच सौ छात्रो के साथ
दीक्षित हुए। मण्डित व मोरियपुत्र साढे तीन सौ एवं अकम्पितादि
चारो गणधर तीन-तीन सौ छात्रो के साथ प्रत्येक दीक्षित हुए थे।
(१४) छद्मस्थ पर्याय—इन्द्रभूति का तीस वर्ष, अग्निभूति का
बारह वर्ष, आयुभूति का दश वर्ष, व्यक्त का बारह वर्ष, सुधर्मा
स्वामी का वयालीस वर्ष, मण्डित और मोरियपुत्र का चौदह वर्ष,

१७२ विविध तीर्थ-कल्प
अकम्पित का नौ वर्ष, अचलभ्राता का बारह वर्ष, मेतार्य का दस
वर्ष और प्रभात का साठ वर्ष छद्मस्थकाल है।
(१५) केवलित्व—इन्द्रभूति गणधर बारह वर्ष, अग्निभूति
सोलह वर्ष, वायुभूति और व्यक्त अठारह-अठारह वर्ष, आर्य
सुधर्मा स्वामी आठ वर्ष, मण्डित और मोरियपुत्र सोलह सोलह
वर्ष, अचलभ्राता चौदह वर्ष, मेतार्य और प्रभास गणधर प्रत्येक
सोलह-सोलह वर्ष केवलीपर्याय मे विचरे थे।
(१६) रूप—ग्यारहों गणधर वज्र ऋषभ नाराच संघयण वाले
सम चतुरस्र संस्थान, स्वर्णाभ देह वर्ण वाले एवं तीर्थङ्करों की भाँति
रूप सम्पदा वाले थे। तीर्थङ्कर के लिए कहा है कि—समस्त देवों
का सौन्दर्य यदि अगुष्ठ प्रमाण मे विकुर्वण किया जाय तो भी वे
जिनेश्वर के पदाङ्गुष्ठ के वरावर शोभा नही देते। इन वाक्यो के
अनुसार तीर्थङ्करों का रूप अद्वितीय होता है। उनसे किञ्चन न्यून
गणधरो का, उनसे कुछ हीन आहारक शरीर वालो का, उनसे
न्यून अनुत्तर देवो का, उनसे हीन नौ ग्रैवेयक पर्यवसान देवो का,
उनसे हीन क्रमश अच्युत देवलोक से लगा कर सौधर्म देवलोक
के देवो का रूप होता है। उनसे भी हीन भुवनपति, उनसे हीन
ज्योतिषी देव और उनसे हीन व्यन्तर देवो का रूप होता है।
उनसे भी हीन चक्रवर्त्ती, उनसे हीन अर्ध चक्री वामुदेवो का उनसे
हीन बलदेवो का एवं उनसे हीन अवशिष्ट लोगो का रूप होता
है। इस प्रकार के विशिष्ट रूपधारी गणधर होते हैं।
श्रुतज्ञान की दृष्टि से गृहस्थावास मे वे चतुर्दश विद्या के
पारगत, श्रामण्य मे द्वादश अग गणि पिटक के पारगामी और
सभी द्वादशाङ्गो के प्रणेता होते हैं।
(१७) लब्धि—सभी गणधर सर्वलब्धिसम्पन्न होते हैं। अतः
बुद्धिलब्धि (१८ प्रकार) केवलज्ञान, अवधिज्ञान, मन पर्यवज्ञान,

श्रीमहावीर-गणधर-कल्प १७३
बीजवुद्धि, कोष्टबुद्धि, पदानुसारित्व, सभिन्न सोइत्व, दूरासायण
सामर्थ्य, दूरस्पर्शसामर्थ्य, दूरदर्शनसामर्थ्य, दूरश्रवणसामर्थ्य,
दशपूर्वित्व, चतुर्दशपूर्वित्व, अष्टाङ्ग महानिमित्त कौशल्य, पण्णा-
सवण्णत, प्रत्येकवुद्धत्व, वादित्व ।
क्रियाविषयक लब्धियाँ दो प्रकार की होती है—
१ चारण लब्धि, २ आकाशगामित्व लब्धि ।
विकुर्वित लब्धि अनेक प्रकार की होती है—
अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, पत्ती, प्रकामित्व, इसित्त,
वसित्त, अप्रतिघात, अन्तर्द्धान, कामरूपित्व इत्यादि ।
तपातिशय लब्धि सात प्रकार की होती है । यथा—
उग्रतपत्व, दित्त तपत्व, महातपत्व, घोर तपत्व, घोर परा-
क्रमत्व, घोर ब्रह्मचारित्व, अघोर ब्रह्मचारित्व ।
वललब्धि तीन प्रकार की होती है—
१ मनोबलित्व, २ वचनबलित्व, ३ कायबलित्व ।
औषधिलब्धि आठ प्रकार की होती है—
१ आमोसहि लब्धि, २ खेलोसहि लब्धि, ३ जल्लोसहि
लब्धि, ४ मलोषधि लब्धि, ५ विप्पोसहि लब्धि, ६ सर्वोषधि
लब्धि, ७ आसग अविसत्व, ८ दृष्टि अविषत्व ।
रसलब्धि छ प्रकार की होती है, यथा— ́
१ वचन विषत्व, २ दृष्टि विषत्व, ३ क्षीराश्रवित्व, ४ मधु
आश्रवित्व, ५ रूपि आश्रवित्व, ६ अमृताश्रवित्व ।
क्षेत्रलब्धि दो प्रकार की होती है—
१ अक्षीण महान सत्व, २ अक्षोण महालयत्त्व ।
सभी गणधर इन लब्धियो से सम्पन्न होते हैं ।
(१८) सर्वायु—इन्द्रभूति की वाणवे वर्ष, अग्निभूति की चौह-
त्तर वर्ष, वायुभूति की सत्तर वर्ष, व्यक्त की अस्सी वर्ष, आर्य

१७४ विविध तीर्थ-कल्प
सुधर्मा स्वामी की सौ वर्ष, मण्डित की त्रेयासी वर्ष, मोरियपुत्र की
पचानवे वर्ष, अकम्पित की अठहत्तर वर्ष, अचलभ्राता की बहत्तर
वर्ष, मेतार्य की बासठ वर्ष और प्रभास स्वामी की सर्वायु चालीस
वर्ष की थी।
(१९)-(२०) मोक्ष स्थान व तप—सभी गणधरो का निर्वाण
मासभक्तोपवास व पादोपगमन पूर्वक राजगृह नगर के वैभार
गिरि पर्वत पर हुआ। प्रथम और पचम गणधर के अतिरिक्त नौ
गणधर भगवान् महावीर की विद्यमानता मे ही मोक्ष प्राप्त हुए।
इन्द्रभूति और सुधर्मा स्वामी भगवान के निर्वाणोपरान्त मोक्ष गए।
यह गणधर-कल्प जो प्रतिदिन प्रातः काल प्रसन्न चित्त से
पढता है उसके करतल मे सभी कल्याणपरम्पराएं निवास
करती हैं।
संवत् १३८९ विक्रमीय के ज्येष्ठ शुक्ल पचमी बुधवार के दिन
श्री जिनप्रभसूरिकृत गणधर-कल्प चिरकाल तक जयवन्त रहे।
श्री महावीर-गणधर कल्प समाप्त हुआ। इसकी ग्रन्थसख्या
६८ है।
•
४०. कोकावसति पार्श्वनाथ-कल्प
पद्मावती-नागराज धरणेन्द्र द्वारा ससेवित पार्श्वनाथ भगवान
को नमस्कार करके कोकावसति पार्श्वनाथ का थोडा सा वृत्तान्त
कहता हूँ।
श्री प्रश्नवाहणकुल संभूत हर्षपुरीये गच्छालंकार भूषित श्री

कोकावसतिपार्श्वनाथ-कल्प १७५
अभयदेव सूरि हर्ष पुर से एक बार ग्रामानुग्राम विचरते हुए श्री
अणहिल्लवाड पाटण मे आये । बाह्य प्रदेश मे वे सपरिवार रहे ।
एक दिन महाराजा श्री जयसिंहदेव गजारूढ होकर राजवाटिका
मे आया और सूरिजी को मल-मलिन वस्त्र-देहयुक्त देखा । राजा
ने हाथी से उतर कर नमस्कार करते हुए उन्हे दुष्कर क्रियागील
देखकर 'मलधारि' नाम दिया । राजा उन्हे अभ्यर्थना करके
नगर मे ले गया और घृतवसही के निकट उपाश्रय दिया जहाँ
सूरि महाराज रहे ।
कालक्रम से उनके पट्ट पर अनेक ग्रंथ निर्माण द्वारा विख्यात
कीर्त्ति वाले श्री हेमचन्द्रसूरि (मलधारि) हुए । वे प्रतिदिन चौमासी
चौदस से घृतवसही मे जाकर व्याख्यान करते । एक दिन घृत-
वसति के किसी गोष्ठी के पितृ-कार्य से उस चैत्य मे बलि-
विस्तरादि करना प्रारंभ किया । जब श्रीहेमचन्द्र सूरिजी व्याख्यान
करने के लिए वहाँ पधारे तो गोष्ठी लोगो ने प्रतिषेध करते हुए
कहा—आज यहाँ व्याख्यान न करे क्योकि बलि-मंडनादि से
अवकाश नही है । सूरि जी ने कहा—आज थोडा सा व्याख्यान
करेंगे जिससे चौमासे के व्याख्यान मे विच्छेद न हो । पर गोष्ठी
लोगो के न मानने पर आचार्य महाराज उदास मन से उपाश्रय
लौट आये ।
गुरु महाराज को दु खित चित्त ज्ञात कर सौवर्णिक मोखदेव-
नायग नामक श्रावक ने और किसी दिन पराये चैत्य मे ऐसा
अपमान न हो इसलिए नव्य चैत्य निर्माणार्थ घृतवसति के निकट
भूमि माँगी, पर कही भी नही मिली । तब कोका नामक सेठ मे
भूमि मागी । घृतवसति के गोष्टिको ने मना कर दिया और तिगुना
मूल्य देने को प्रस्तुत हो गए । सूरि महाराज सघसहित कोका के
घर पधारे । उसने आदरपूर्वक कहा—मैने यथोचित मूल्य मे
भूमि दी, पर मेरे नाम से चैत्य बनवाना । सूरि महाराज और

१७६ विविध तीर्थ-कल्प
श्रावको ने उसके प्रस्ताव को मान लिया और घृतवसति के
निकट "कोकावसति" नामक चैत्य बनवाया। उसमे श्री पार्श्व-
नाथ भगवान स्थापित किए, त्रिकाल पूजा होने लगी।
कालक्रम से श्री भीमदेव के शासनकाल मे पाटण का भग
करते मालवा के सुलतान ने पार्श्वनाथ प्रतिमा भी भंग कर दी।
सौवर्णिक नायग के वशज सेठ रामदेव-आसधर ने उद्धार करना
प्रारभ किया। आरासन से तीन फलक आये, पर वे निर्दोष नही
थे। अत उनके तीन बिम्ब घड़ाने पर भी गुरु महाराज एवं
श्रावको को सन्तोष नही हुआ। तब सेठ रामदेव ने अभिग्रह लिया
कि जब तक पार्श्वनाथ प्रतिमा न हो, भोजन नही करूँगा। गुरु
महाराज भी उपवास कर रहे थे। आठवें उपवास मे रामदेव को
देव का आदेश हुआ कि जहाँ अक्षत पुष्प युक्त गहुली दिखाई दे,
उसके नीचे यही चैत्य के निकट इतने हाथ नीचे पाषाणफलक
विद्यमान हं। भूमि खोदकर फलक प्राप्त किया और पार्श्वनाथ
भगवान का अनुपम रूप वाला विम्ब बनवाया। विक्रम संवत्
१२६६ वर्ष मे श्री देवानंद सूरि जी ने प्रतिष्ठित कर भगवान को
चैत्य मे स्थापित किया। कोका पार्श्वनाथ नाम प्रसिद्ध हुआ।
सेठ रामदेव के तिहुणा और जाजा नाम के पुत्र हुए। तिहुण
का पुत्र मल्ल हुआ। उसके देल्हण और जइतसीह नामक पुत्र हैं
जो प्रतिदिन भगवान पार्श्वनाथ की पूजा करते है।
एक दिन श्री सखेश्वर पार्श्वनाथ भगवान (के अधिष्ठायक)
ने देल्हण को स्वप्न दिया कि प्रभात मे चार घडी पर्यन्त कोका
पार्श्वनाथ प्रतिमा का, मैं सानिध्य करूँगा। उस चार घडी
के समय एक प्रतिमा की पूजा करते हमारी पूजा हो जायगी।
उसी प्रकार लोगो द्वारा पूज्य मान श्री कोकावसति पार्श्व-
नाथ भी श्री सखेश्वर पार्श्वनाथ की भाँति परचे पूरते है।

श्री कोटिशिलातीर्थ-कल्प १७७
सखेश्वर पार्श्वनाथ सम्बन्धी पूजा-यात्रा-अभिग्रहादि लोगो के यही
पूर्ण होते हैं।
इस प्रकार सन्निहित प्रातिहार्य श्री कोकावसति पार्श्वनाथ
की तेतीस पर्वांगुल प्रमाण प्रतिमा मलधारि गच्छ प्रतिबद्ध है।
अणहिलपत्तणमण्डन श्री कोकावसति पार्श्वनाथ का यह सक्षिप्त
कल्प लोगो का क्लेश नष्ट करे।
श्री कोकावसति पार्श्वनाथ-कल्प समाप्त हुआ। इसकी ग्रन्थ-
श्लोक सख्या ४० है।
४१. श्रीकोटिशिलातीर्थ-कल्प
जिनेश्वर भगवान को नमस्कार करके पूर्व पुरुष-सिंहो के
वाक्यो का सहारा लेकर श्री कोटिशिलातीर्थ का कल्प श्री जिन-
प्रभसूरि प्रकाशित करते हैं।
इस भरतक्षेत्र मे मगधदेश मे कोटिशिला तीर्थ है, जो आज
भी चारण, सुर-असुर और यक्षो के द्वारा पूजा जाता है। भरतार्द्ध-
वासिनी अधिष्ठिता देवता द्वारा भी सतत (पूजा होती है), वह एक
योजन पृथुल और एक योजन ऊँचा है।
सभी तीन खण्ड पृथ्वी के स्वामी वासुदेव देवो, मनुष्यो और
विद्याधरो के प्रत्यक्ष मे उसे उपाड कर (उठा कर) अपने बाहुबल
की परीक्षा करते हैं।
१२

१७८ विविध तीर्थ-कल्प

प्रथम वासुदेव ने उसका छत्र किया, दूसरे ने मस्तक तक,
तीसरे ने ग्रीवापर्यन्त, चौथे ने छाती तक, पाँचवे ने उदर पर्यन्त,
छट्ठे ने कटि प्रदेश तक, सातवे वासुदेव ने जघा तक -ऊँचा
उठाया। आठवे ने जानुपर्यन्त और नौवे कृष्ण वासुदेव ने उसे
अपनी वायो भुजा से उठा कर भूमि से चार अगुल ऊँचा किया।
अवसर्पिणी काल के प्रभाव से क्रमश मनुष्य का वलादि कम
होता जाता है। तीर्थङ्करो का वल सब का एक जैसा होता है।
जिस कोटिगिला को करोड वलवान् सुभटो द्वारा उठाना
अशक्य है, उसे अकेला वासुदेव उठा लेता है।
शान्तिनाथ भगवान के प्रथम गणधर चक्रायुध विधिपूर्वक
अनशन करके कोटिशिला पर मुक्त हुए।
गान्तिनाथ भगवान के तीर्थ मे सख्याबद्ध मुनियो की कोटि
यही सिद्ध हुई एव श्री कुन्थुनाथ भगवान के तीर्थ मे भी। श्री
अरनाथ जिनेश्वर के तीर्थ मे भी बारह श्रमणो की कोटि और
मल्लि जिनेश्वर के तीर्थ मे छ, कोटि ऋषि सिद्ध हुए। मुनि
सुव्रतनाथ जिनेश्वर के तीर्थ मे तीन कोटि सिद्ध हुए। नमिनाथ -
भगवान के तीर्थ मे एक कोटि अणगार सिद्ध हुए।
वहाँ अन्य भी अनेक महर्षि गाश्वत पद को प्राप्त हुए।
इसीसे भूमण्डल मे कोटिगिलातीर्थ विख्यात हुआ।
पूर्वाचार्यो ने इससे विशेष भी कुछ कहा है, जैसे-
दशार्ण पर्वत के समीप योजन पृथुलयाम वाली कोटिगिला
है। छ तीर्थङ्करो के गासन मे वहाँ से अनेको कोटि मुनि सिद्ध
हुए।
गान्तिनाथ स्वामी के प्रथम गणधर चक्रायुध अनेक साधुओ
के परिवार सहित यहाँ से बत्तीस युगो तक सख्यात कोटि मुनि
सिद्ध हुए। कुन्थुनाथ भगवान के अठाइस युगो तक सख्यात मुनि

वस्तुपाल-तेजपालमन्त्रि-कल्प १७९
कोटि सिद्ध हुए । अरनाथ भगवान के ३४ युगो तक बारह कोटि
मुनि सिद्ध हुए । मल्लिनाथ भगवान के बीस युगो तक छ कोटि
मुनि सिद्ध हुए और मुनि सुव्रत भगवान के शासन मे तीन कोटि
मुनि व नमिनाथ प्रभु के शासन मे एक कोटि मुनि सिद्ध हुए ।
इसलिए इसका नाम कोटिशिला है ।
शिर पर, ग्रीवा तक, छाती तक, उदर तक, कोटिपर्यन्त और
जघाओं तक तथा जानुपर्यन्त एव चार अगुल तक वासुदेव उसे
उठाते हैं ।
यह कोटिशिला तीर्थ त्रिभुवनजनो को सुख देनेवाला देवता
व खेचरो से पूजित है । वह भव्यजनो का कल्याण करे ।
कोटिशिलातीर्थ का कल्प समाप्त हुआ । इसमे ग्रन्थ-श्लोक
सख्या २४ अक्षर ६ हैं ।
•
४२. वस्तुपाल-तेजपालमन्त्रि-कल्प
श्री वस्तुपाल और तेजपाल दोनो भ्राता प्रसिद्ध मन्त्रीश्वर हुए
हैं, उनकी कीर्त्तन-सख्या कहता हूँ ।
पहले गुर्जर-धरामण्डन मण्डली महानगरी मे श्री वस्तुपाल
तेजपाल आदि निवास करते थे । एक बार श्रीपत्तन निवासी
प्राग्वाटजातीय ठक्कुर श्री चण्डप के पुत्र ठक्कुर श्री चण्डप्रसाद
के पुत्र मन्त्री श्री सोमकुलावतश ठक्कुर श्री आसराज के नन्दन,
कुमारदेवी के कुक्षी रूपी सरोवर के दो राजहस श्री वस्तुपाल-

१८० विविध तीर्थ-कल्प

तेजपाल श्री शत्रुञ्जय गिरनार आदि तीर्थों की यात्रा के लिए
चले । हडाला गाँव आ कर जब अपने वैभव का विचार किया तो
वह सर्वस्व तीन लाख हुआ । फिर सौराष्ट्र में दुख का आकलन
कर एक लाख पृथ्वी मे गाडने के लिए रात्रि मे एक बड़े पीपल के
नीचे खड्डा खुदवाया । उसे खोदते हुए किसी का पुराना स्वर्ण
पूर्ण गोलक कलश निकला । उसे ले कर वस्तुपाल ने तेजपाल की
स्त्री अनुपमा देवी को मान्य होने से पूछा—इस निधि को कहाँ
रखे ? उसने कहा—गिरिशिखर पर ही इसे ऊँचा स्थापित करना
चाहिए जिससे प्रस्तुत निधि की भाँति वह अन्य के अधिकार मे न
आ सके । यह सुन कर वस्तुपाल ने उस द्रव्य को श्री शत्रुञ्जय
गिरनार मे व्यय किया । यात्रा कर के लौटते समय वे धवलक्कपुर
आये ।
इसी बीच महणदेवी नामक कन्नौजपति की पुत्री पिता से
कंचुलिक खर्च मे गुजरात की पृथ्वी पा कर उसका आधिपत्य भोग
कर मृत्यु के उपरान्त वही देश की अधिष्ठात्री देवी हुई । उसने
एक दिन राजा वीरधवल को स्वप्न मे कहा कि वस्तुपाल-तेज-
पाल को राज्यचिन्तक नियुक्त करके सुख से राज्य करो ! वैसा
करने से तुम्हारे राज्य-राष्ट्र की वृद्धि होगी । यह आदेश देते हुए
अपने को प्रकट कर देवी अन्तर्धान हो गई । प्रातः काल उठ कर
राजा ने वस्तुपाल-तेजपाल को बुलाया और सम्मानपूर्वक बड़े को
स्तम्भतीर्थ व धवलक्क के राज्यो का आधिपत्य एव तेजपाल को
सर्व राज्य की व्यापार मुद्रा दी । तब वे दोनो षट् दर्शन को दान,
नाना प्रकार के धर्म स्थान बनवाने आदि सैकडो सुकृत्यो द्वारा
अपना समय बिताने लगे ।
जैसे कि उन्होने सवा लाख जिन-प्रतिमाएँ बनवाईं । अठारह
करोड छियानवे लाख द्रव्य श्री शत्रुञ्जय तीर्थ पर व्यय किया ।
बारह करोड अस्सी लाख श्री उज्ज्वयन्त पर, बारह करोड त्रेपन

वस्तुपाल-तेजपालमन्त्रि-कल्प १८१
लाख आबू पर लूणगवसही मे खर्च किये। नौ सौ चौरासी पौषध-
गालाएँ वनवाई। पाँच सौ दाँत के सिंहासन, पाँच सौ जादर के
समवशरण, सात सौ सतरह ब्रह्मगाला, सात सौ दानगालाएँ,
तपस्वी-कापालिक मठो मे सर्वत्र भोजन-दान किया। तीन हजार
दो माहेश्वरायतन, तेरह सौ चार शिखरवद्ध जिनालय, तेईस सौ
जिनालयो का उद्धार, अठारह करोड़ स्वर्ण के व्यय से तीन स्थानो
मे सरस्वती-भण्डार भरवाये। पाँच सौ ब्राह्मण प्रतिदिन वेद-पाठ
करते थे। वर्ष मे तीन वार सघ पूजा, पन्द्रह सौ श्रमण घर मे
नित्य वहोरते थे। एक हजार से अधिक तटिक-कार्पटिक प्रतिदिन
भोजन करते थे। सघपति वन कर तेरह तीर्थयात्राएँ की। प्रथम
यात्रा मे चार हजार पाँच सौ गाडे—सेज वाले (शय्यापालक),
सात सौ सुखासन, अठारह सौ वाहिनी, उन्नीस सौ श्रीकरी,
इक्कीस सौ श्वेताम्वरो व ग्यारह सौ दिगम्वरो के, साढे चार सौ
जैन गायक, तेतीस सौ वन्दीजन, चौरासी तालाव बँधाये। चार
सौ चौसठ वावडी (वापी) तीस-वत्तीस पाषाणमय दुर्ग, चौवीस
दन्तमय जैन रथ, दो हजार शाक (सागवान काष्ठ) घटित (रथ
वनवाये)। वस्तुपाल मत्री के ‘सरस्वती कण्ठाभरण’ आदि चौवीस
विरुद थे। उसने चौसठ मस्जिदे करवाई। दक्षिण मे श्रीपर्वत
तक, पश्चिम मे प्रभास तक, उत्तर मे केदार तक और पूर्व मे
वाराणसी तक उनके कीर्त्तिकलाप व्यास है। सब मिला कर तीन
सौ करोड़ चौदह लाख अठारह हजार आठ सौ मे तीन लौष्टिक
कम द्रव्य हुआ। त्रेसठ वार सग्राम मे उसने जय-पत्र प्राप्त किया।
इस प्रकार अठारह वर्ष उनका व्यापार-कार्यकाल चला।
इस प्रकार अनेक पुण्यकृत्य करते हुए कितने ही काल पर
राजा वीरधवल काल प्राप्त हुआ। तब उसके पट्ट पर उसके पुत्र
वीसलदेव को मन्त्रिश्रेष्ठो ने राज्याभिषिक्त किया। वह समर्थ होता

१८२ विविध तीर्थ-कल्प
हुआ क्रमश घमण्डी हो गया । उसने दूसरा सचिव वनाकर मन्त्री
तेजपाल को हटा दिया । यह देखकर राजपुरोहित सोमेश्वर
महाकवि ने राजा को उद्देश्य करके व्यङ्गात्मक नव्य काव्य पढा—
हे चञ्चल समीर ! महीने भर सुन्दर पाटल पुष्पो के परिमल
को वहन करती अपनी महान् शक्ति का तूने क्या प्रयोग किया हैं ?
देख तो सही—अन्धकार को दूर हटाने वाले सूर्य और चन्द्रमा
का दूर से ही तिरस्कार करके पादस्पर्श सहन करने वाली धूलि
को उनके स्थान पर स्थापित कर दिया । इत्यादि ।
उन पुरुष-रत्नो का शेष वृत्तान्त और आदि से उत्पत्ति का
स्वरूप तो लोक-प्रसिद्धि से ही जान लेना चाहिए ।
गायकवर्य सूढा के द्वारा जान करके दोनो मन्त्रिमुख्यो के
कीर्त्ति-कलापो की यह सख्या बतलायी है ।
जहाँ अर्हन्त भगवान विराजमान हो, वह तीर्थ कहलाता है
और उन दोनो मन्त्रियो के चित्त मे अर्हन्त अहर्निश बसते थे ।
इसलिए उन तीर्थरूप पुरुषश्रेष्ठो के कीर्त्तन से भी क्या कल्पकृति
व्याप्त नही है ? अर्थात् है । ऐसा विचार कर उन दोनो मन्त्री-
नायको का यह सक्षिप्त कल्प श्री जिनप्रभसूरि ने हृदय से
वनाया है ।
महामात्य श्री वस्तुपाल तेजपाल के कीर्त्तन-सख्या का यह
कल्प ग्रन्थाग्र० ५३ और अक्षर ६ अधिक है ।

४३. ढिंपुरीतीर्थ-कल्प
श्री चेल्लण पार्श्वनाथ और श्री वीर प्रभु का ध्यान करके
श्री ढिंपुरी तीर्थ का कल्प यथाश्रुत कहता हूँ। पारेत जनपद मे
महानदी चर्मण्वती के तट पर नाना प्रकार के गहरे जंगलो मे
गहन ढिंपुरी नगरी है।
इसी भारतवर्ष मे विमलयशा नामक राजा हुआ। उसके रानी
सुमंगला देवी के साथ विषय-सुख अनुभव करते क्रमश सन्तान-
युगल जन्मे। उनमे पुत्र का नाम पुष्पचूल और पुत्री पुष्पचूला
थी। उद्दण्ड, अनर्थकारी होने से लोगो ने पुष्पचूल का नाम वङ्कचूल
कर दिया। महाजनो के उपालम्भ से रुष्ट होकर राजा ने वङ्कचूल
को नगर से निकाल दिया। अपने परिजन और स्नेह वश बहिन
के साथ जाते हुए वह भीषण अटवी के मार्ग मे पड गया। वहाँ
भूख प्यास से व्याकुल अवस्था मे उसे भीलो ने देखा और अपनी
पल्ली मे ले गए। उन्होने उसे अपने पूर्ण पल्लीपति के पद पर
स्थापित कर दिया। वह ग्राम, नगर और पथिको के सार्थ को लूट
खसोट कर राज्य-पालन करने लगा।
एक वार सुस्थिताचार्य आबूसे अष्टापद यात्रा के हेतु जाते हुए
अपने शिष्यादि परिवार के साथ सिंहगुफा नामक इसी पल्ली मे
पहुचे। वर्षाकाल आया, भूमि जीवाकुल हो गई। सूरिजी ने साधुओ
के साथ आलोचना करके वकचूल से वसति माँग कर वही रह
गए। उसने पहले से ही व्यवस्था कर ली कि हमारी सीमा मे
धर्म-कथा न कहे क्योकि आपकी कथाओ मे अहिंसादि धर्म है
और उससे हम लोगो का निर्वाह नही होता। गुरु महाराज

१८४ विविध तीर्थ-कल्प

उसका कथन स्वीकार कर उपाश्रय मे ठहर गए। उसने सभी
प्रधान पुरुषो को बुलाकर कहा—मैं राजपुत्र हूँ, मेरे पास
ब्राह्मणादि आवेगे अत आप लोग पल्ली मे जीव-वध एव मास-
मदिरा का प्रसग उपस्थित न करें जिससे साधुओ को भी आहार-
पानी कल्प्य हो जायगा। उन्होने चार महीने ऐसा ही किया।
विहार का समय आया। सूरिजी ने वङ्कचूल को—"श्रमणो
और पक्षियो का वास अनियत होता है" वाक्यो द्वारा सूचित
किया। वह गुरु महाराज के साथ चला। अपनी सीमा पर पहुचा
कर विनति की—हम परायी सीमा मे प्रवेश नही करते ! सूरिजी
ने कहा—हम सीमान्तर मे आ गए, अब कुछ उपदेश देंगे।
वङ्कचूल ने कहा—मेरे से निर्वाह हो सके, ऐसा उपदेश दीजिए।
सूरिजी ने उसे चार नियम दिलाए—१ अज्ञात फल न खाना,
२ सात-आठ पाँव पीछे हट कर आघात करना, ३ पट्टरानी से
गमन नही करना, ४ कौए का मास भक्षण न करना। वह नियम
स्वीकार कर गुरु महाराज को नमस्कार कर अपने घर आ गया।
एक बार वह सार्थ पर डाका डालने के लिए गया। शकुन
न होने के कारण सार्थ नही आया, वङ्कचूल का पाथेय समाप्त
हो गया। ठाकुर लोग क्षुधा-पीडित हुए। उन्होने फला हुआ
किम्पाक वृक्ष देखा, उसके फल ग्रहण किए। वङ्कचूल ने उस फल
का नाम न जानने से उन्हे नही खाया, दूसरे सब लोगो ने खाया।
वे लोग किम्पाक फल से मर गए। वङ्कचूल ने सोचा—अहो !
नियम पालन का यह फल है। उसके बाद वह पल्ली मे अकेला
आया। रात्रि मे अपने घर मे प्रविष्ट होकर दीपक के प्रकाश मे
पुष्पचूला को पुरुष वेश मे अपनी पत्नी के साथ सोये हुए देखा।
उन पर क्रुद्ध होकर कहा—दोनो को खड्ग से मारूँगा। ऐसा
सोचकर नियम याद आ जाने से सात-आठ पाँव पीछे हट कर

ढिंपुरीतीर्थ-कल्प १८४
आघात करने के उद्दे श्य से पीछे हटा और खड्ग के खटके से जग
कर बहिन ने "वङ्कचूल जीते रहो" गव्द कहे। उसने लज्जित
होकर पूछा- यह ऐसा क्यो ? बहिन ने नट का सारा वृत्तान्त
बतलाया।
कालक्रम से वङ्कचूल के राज्य-शासन करते उस पल्ली मे
उन्ही आचार्य महाराज के धर्मऋषि धर्मदत्त नाम के दो मुनि
वर्षावास रहे। उनमे से एक के तीन मासक्षमण और दूसरे के
चार मासक्षमण तप था। वङ्कचूल आचार्य महाराज के उपदेश के
के शुभ फल अनुभव कर चुका था, अतः उसने—कृपा कर कुछ
उपदेश दीजिये—कहा। उन्होने क्लेश का नाश करनेवाला चैत्य
निर्माण कराने का उपदेश दिया। वङ्कचूल ने 'शराविका' पर्वत
समीपवर्ती उसी पल्ली मे चर्मणवती नदी के तट पर ऊँचे शिखर
वाला सुन्दर जिनालय बनवाया। उसमे श्री महावीर स्वामी की
प्रतिमा स्थापित की। वह तीर्थ के रूप मे प्रसिद्ध हो गया, चारो
दिशाओ से सघ आने लगे।
कालान्तर मे कोई व्यापारी अपनी पत्नी के साथ सर्वऋद्धि
सहित वहाँ की यात्रा के लिए चला। क्रमशः रन्ति नदी पर
आया। नौका मे बैठे हुए दम्पति ने चैत्य का शिखर देखा और
सोने के कटोरे मे कुकुम, चन्दन, कर्पूर आदि डालकर शीघ्रता से
जल मे प्रक्षेप करते हुए व्यापारी की पत्नी के हाथ से प्रमादवश
छूट कर नदी तल मे जा डूबा। वणिक ने कहा—यह करोडो के
मूल्य वाला रत्नजटित कटोरा राजा द्वारा ग्रहणक मे दिया हुआ
था, अब राजा से कैसे छुटकारा होगा ? उसने दीर्घ विचार करके
यह बात वङ्कचूल से कही ताकि यह राजकीय वस्तु मिल जाय
ऐसा प्रयत्न करे। वङ्कचूल ने उसकी खोज के लिए धीवर को
आदेश दिया, वह नदी मे प्रविष्ट होकर तल तक गया। उसने

१८६ विविध तीर्थ-कल्प
सोने के रथ मे स्थित जीवन्त स्वामी श्री पार्श्वनाथ भगवान की
प्रतिमा देखी और उस प्रतिमा के हृदय पर उस कटोरे को भी
देखा। धीवर ने कहा—ये दम्पति धन्य हैं जिनका घिसा हुआ ,
चन्दन विलेपन भगवान के हृदय पर स्थित है। धीवर ने उसे
लाकर व्यापारी को दिया, उसने भी उसे प्रचुर द्रव्य दिया।
नाविक ने विम्व का स्वरूप कहा तो श्रद्धालु वङ्कचूल ने उसे ही
प्रवेग कराके भगवत् प्रतिमा को निकलवा और स्वर्णरथ को वही
छोड दिया। भगवान ने स्वप्न मे आगे ही सूचित कर दिया था—
जहाँ डाली हुई पुष्पमाला जाकर ठहरे वहाँ प्रतिमा की शोध
करना। तदनुसार विम्व लाकर वङ्कचूल राजा को समर्पित कर
दिया। उसने श्री महावीर स्वामी विम्ब-जिनालय के बहिर्मण्डप मे
स्थापित किया और जबतक इसके लिए नया मन्दिर न बने तब
तक यही विराजमान रहे। मन्दिर तैयार होने पर उसमे स्थापित
करने के लिए राजकीय पुरुपो ने विम्व को उत्थापन करना प्रारम्भ
किया पर देवताधिष्ठान से वह विम्व नही उठा और आज तक भी
वैसे ही स्थित है।
धीवर ने पल्लीपति वङ्कचूल राजा से निवेदन किया—मैंने
नदी मे प्रविष्ट होने पर दूसरी प्रतिमा भी देखी थी, उसे बाहर
लाने का प्रयत्न करना चाहिए, पूजा होने पर ही ऐसा होता है!
तब पल्लीपति ने अपनी सभा मे पूछा—कोई इन प्रतिमाओ का
सविधान जानते हो? किसने इन्हे नदी मे रखा? यह सुन कर
पुरातत्त्वविद स्थविर ने कहा—देव! एक नगर मे पहले एक राजा
था जो परचक्र के आने पर उसके साथ युद्ध करने के लिए सैन्य
सजा कर गया। उसकी पटरानी ने अपने सर्वस्व विम्बद्वय को सोने
के रथ मे रख कर जल-दुर्ग समझ कर कोटिंबक मे डाल कर
चर्मणवती मे रख दिए। चिरकाल युद्धरत अवस्था मे किसी खल
व्यक्ति ने बात फैला दी कि राजा को शत्रु ने नष्ट कर दिया।

रानी ने यह सुन कर उस कोर्टिवक को जल के तल मे रख दिया
और स्वय मरण स्वीकार कर लिया। वह राजा जब शत्रु को
हरा कर अपने नगर मे आया और रानी के वृत्तान्त को सुन
कर ससार से विरक्त होकर भागवती दीक्षा स्वीकार कर ली।
उसमे से एक विम्व को देव वाहर लाये, वह तो पूज्यमान है,
दूसरा भी निकाला जाय ऐसा उपक्रम करना चाहिए। यह सुन
कर परमर्हन्त चूडामणि बकचूल ने उसी धीवर को विम्व निकलने
के लिए नदी मे प्रवेश कराया। उसने उस प्रतिमा को कटि प्रदेश
पर्यन्त जल-तल मे और अवशिष्ट वाह्य रहे हुए देख कर उसे
वाहर निकालने के अनेक उपाय किये पर बाहर न निकलने से
दैवी प्रभाव ज्ञात कर उसने अपने स्वामी को उसका स्वरूप निवे-
दन किया। आज भी वह वैसा ही है। सुना जाता है कि आज
भी किसी वृद्ध धीवर ने नौका स्तम्भित होने पर उसका कारण
खोजते उस स्वर्णमय रथ की एक कीलिका प्राप्त की। उसे
स्वर्णमय देख कर लोभवश सोचा—मैं इस सारे रथ को क्रमश
ग्रहण कर के धनवान हो जाऊँगा ! इससे उसे रातभर नीद नही
आई। किसी अदृश्य पुरुष ने कहा—यदि इसे वही रखोगे तो सुखी
रहोगे, अन्यथा मैं तुम्हे शीघ्र ही मार दूगा , उसने भय के मारे
उस युग-कीलिकादि को वही छोड दिया। देवाधिष्ठित पदार्थों के
प्रति कौन-सी वात सम्भव नही होती ?
सुना जाता है कि वर्त्तमान काल मे कोई म्लेच्छ हाथ में
पत्थर ले कर श्री पार्श्वनाथ प्रतिमा को तोडने के लिए उपस्थित
हुआ। उसकी भुजाएँ स्तम्भित हो गई। बहुत कुछ पूजा-विधि
करने से वह ठीक हुआ। श्री वीरप्रभु की प्रतिमा वडी है और श्री
पार्श्वनाथ प्रतिमा उसकी अपेक्षा छोटी है अतः श्री महावीर
प्रतिमा के सामने यह वालरूप देव है। इस प्रकार 'मेद' लोग